माखन लाल फोतेदार की पुस्तक ‘द चिनार लीव्स’ के प्रकाशन के बाद कांग्रेस के भीतर प्रियंका गांधी को भविष्य में पार्टी के नेतृत्व की कमान सौंपने को लेकर फिर से बहस छिड़ गई है. फोतेदार ने पुस्तक में लिखा है कि इंदिरा गांधी देश को 21वीं सदी में आगे ले जाने के लिए अपनी पोती प्रियंका गांधी को राजनीतिक आवरण ग्रहण करते हुए देखना चाहती थीं. हत्या से केवल चार दिन पहले श्रीनगर की यात्रा करते हुए शायद इंदिरा गांधी को अपनी मृत्यु का अंदाजा हो गया था और उन्होंने प्रियंका के सबसे स्वीकार्य नेता के रूप में उभरने की कल्पना की थी, क्योंकि लोग प्रियंका में इंदिरा गांधी की छवि को प्रतिबिंबित होते हुए देखेंगे. इंदिरा गांधी ने कहा था कि प्रियंका के राजनीतिक केंद्र मंच पर उतरने के बाद भारतीय जनता उन्हें बेहिचक समर्थन देगी. अन्य शब्दों में कहें तो इंदिरा गांधी प्रियंका को उनकी राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी के रूप में देखती थीं और अपनी पोती को पोते (राहुल गांधी) पर स्पष्ट वरीयता का संकेत दिया करती थीं. गौरतलब है कि राहुल गांधी से निकट भविष्य में कांग्रेस के नेतृत्व की कमान अपने हाथों में लेने की उम्मीद की जा रही है. 
 
2014 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जो दुर्दशा हुई है, उसके बाद यह कल्पना करना कठिन है कि गांधी परिवार का कोई भी वंशज देश की इस सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का रक्षक  बन कर उभरेगा. लोकसभा चुनाव के बाद विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस का प्रभाव लगातार कम होता जा रहा है. पार्टी हलकों में पहले से ही व्यापक पैमाने पर ऐसी बातें हो रही हैं कि कांग्रेस का नेतृत्व एक गैर-गांधी द्वारा किया जाना चाहिए. हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए इसकी संभावनाएं लगभग नगण्य हैं. लेकिन, कांग्रेस का भाग्य अगर इस तरह ही दुर्बल होता चला गया तो पार्टी प्रमुख के रूप में एक गैर-गांधी का चयन संभव भी हो सकता है. कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने भी कुछ समय पहले कहा था कि राजीव गांधी को भी अपनी पुत्री में बहुत संभावनाएं नजर आती थीं और किसी दिन प्रियंका को राजनीति में प्रवेश कराने के लिए उत्सुक दिखाई पड़ते थे. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के राजनीतिक सचिव के रूप में कार्य कर चुके फोतेदार ने स्वयं इंदिरा गांधी द्वारा लिखवाए गए लेख के माध्यम से सोनिया गांधी को पूर्व प्रधानमंत्री की इच्छा से अवगत कराया था, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष ने पहले से ही अपने पुत्र राहुल गांधी को बढ़ावा देने का निश्चय कर लिया था. लेकिन, पार्टी के अगले नेता के रूप में राहुल को पेश करने के प्रयासों को अपेक्षाकृत सफलता मुख्य रूप से इसलिए हाथ नहीं लगी है क्योंकि सोनिया गांधी के करीबियों ने राहुल गांधी की पदोन्नति को यह कहकर रोकने का प्रयास किया है कि उनके हाथों में पार्टी की कमान सौंपने का यह उचित समय नहीं है, हालांकि उनके इस तर्क में दम नहीं है और असल कारण कुछ और ही है. वास्तव में सोनिया गांधी की अंतरंग मंडली को डर है कि एकबार जब राहुल गांधी ने पार्टी का प्रभार ले लिया तो पार्टी में उनकी राजनीतिक पारी प्रभावी ढंग से खत्म हो जाएगी. उनके पास राजनीतिक वनवास का सामना करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं रह जाएगा. 
 
जहां तक कांग्रेस के सामान्य कार्यकर्ताओं का सवाल है, प्रियंका को राहुल की तुलना में अधिक आकर्षक व करिश्माई व्यक्तित्व का स्वामी माना जाता है और उनके लिए कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के मन में अपार समर्थन और स्नेह है. अत्यधिक कठोर बयान देने का उनका स्वभाव और जिस आत्मविश्वास के साथ वह प्रतिद्वंदियों का सामना करती हैं, उनके यह गुण किसी भी ऐसे राजनीतिज्ञ के लिए बुनियादी रूप से आवश्यक हैं जो राजनीति में अपना एक अलग मुकाम हासिल करना चाहता है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी व अन्य प्रतिद्वंदी दलों द्वारा उनके पति राबर्ट वाड्रा को विभिन्न प्रकार की अनियमितताओं के लिए लगातार निशाना बनाए जाने के कारण कांग्रेस के लिए प्रियंका को आगे लाना चिंता का विषय है. यह और बात है कि राबर्ट वाड्रा के खिलाफ कोई भी आरोप अभी तक सिद्ध नहीं हो सका है. यह भी अब एक ज्ञात तथ्य हो चुका है कि गांधी परिवार के सदस्यों में इस बात पर सर्वसम्मति बन चुकी है कि राहुल गांधी सक्रिय राजनीति में रहेंगे और सोनिया गांधी सुनिश्चित करेंगी कि उनके जीवनकाल के दौरान राहुल गांधी अगले कांग्रेस अध्यक्ष बनें. कांग्रेस पार्टी ने हाल ही में सोनिया के कार्यकाल को एक वर्ष आगे बढ़ा दिया था जिससे इन अटकलों को हवा मिली कि सोनिया नहीं चाहतीं कि बिहार व उसके बाद तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम व केरल में होने वाले विधानसभा चुनावों की संभावित हार का ठीकरा राहुल के सर पर फोड़ा जाए. वह चाहेंगी कि इन चुनावों के संपन्न होने के बाद ही राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष के पद पर स्थापित किया जाए जिससे राहुल नए सिरे से एक नई शुरुआत कर सकें. 
 
जहां तक राहुल का सवाल है, भले ही वह राजनीतिक हलकों में उपहास का पात्र बनते रहे हों लेकिन वह खुद को एक नए अवतार में पेश करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं. यह उनका दुर्भाग्य है कि इस देश में कांग्रेस विरोधी लहर थमने का नाम नहीं ले रही है और आलाकमान के फैसलों से साधारण कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में असंतोष की भावना पनप रही है. जैसा कि बिहार में पार्टी रणनीति से मालूम पड़ता है कि कांग्रेस पार्टी साधारण जनसमुदाय से बिल्कुल कट गई है और शीर्ष के दो नेताओं को घेरे हुए उनके चापलूसों द्वारा राजनीतिक घटनाक्रमों पर उन्हें गुमराह किया जाना जारी है. इसका परिणाम यह निकला है कि अधिकांश कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने चुप्पी साध ली है और राजनीतिक आंदोलनों में भाग लेने से झिझक रहे हैं. केन्द्र में यूपीए के 10 वर्षीय शासन के दौरान उनके साथ हुए अनुचित व्यवहार के लिए माफी मांगने के लिए शीर्ष नेतृत्व के पास आवश्यक विनम्रता का अभाव है. सोनिया गांधी को समझना होगा कि कांग्रेस की मौजूदा दुर्दशा के लिए राहुल गांधी नहीं बल्कि स्वयं सोनिया और उनके सलाहकार सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं)