शुरू से ही जाति एक ऐसी नवरीति थी जिसका योग्यता और काम पर आधारित पारंपरिक अवधारणा के विभिन्न प्रकार के कर्तव्यों में कोई स्थान नहीं था.हालांकि समाज को इस बुराई से मुक्त कराने के लिए कई प्रयास किए गए हैं, बावजूद इसके आज भी केंद्र सरकार के प्रशासनिक तंत्र में इसके अवशेष बचे हुए हैं. 15 अगस्त 1947 के दिन स्वतंत्रता प्राप्त करने के साथ ही भारत में सत्तारूढ़ सरकार की प्रणाली में भी व्यापक परिवर्तन होना चाहिए था, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यूनियन जैक का झंडा नीचे उतरने के साथ शासन का कार्यभार ग्रहण करने वाले इस बुनियादी अंश को अमल में लाना भूल गए.अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र के रहनुमा के रूप में उनकी छवि के बावजूद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सुनिश्चित किया कि स्वतंत्रता के बाद भी ब्रिटिश शासनकाल के कानूनी व प्रशासनिक संरचना को इस देश में बरकरार रखा जाए और उन पर गंभीरता से अमल किया जाए.ऐसे ढांचे जिन्हें लंबे समय पहले ही खारिज कर दिया जाना चाहिए था, उन्हें संरक्षित किया गया. शाही समय से विरासत में मिली भारतीय सिविल सेवा (इंडियन सिविल सर्विसेज) को भारतीय प्रशासनिक सेवा (इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज) का नाम दिया गया और इस विशेष सेवा के लिए चयन पद्धति व चयनित प्रत्याशियों को प्रशिक्षण देने का ढंग औपनिवेशिक काल के दौरान प्रचलित अभ्यास से मेल खाता है.
 
जिस समय तक परीक्षाओं और साक्षात्कारों से होकर गुजरने वालों को विभिन्न सेवाओं में स्थापित किया जाता है, उस समय तक जातीय व्यवस्था का गठन हो जाता है जिसमें भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सांख्यिकी के चयनित अधिकारी प्रशासनिक संरचना की उच्च्तम जाति बन जाते हैं, जबकि अन्य ‘निचले स्तरों’ का गठन करते हैं और राज्य प्रशासनिक सेवाओं के शीर्ष पदों पर ‘पिछड़े वर्गों’ के उम्मीदवारों को नियुक्त किया जाता है.‘भारतीय’ और ‘राज्य’ के बीच इस तरह का अंतर क्यों? अभी भी औपनिवेशिक नजरिए में डूबे लोगों को छोड़कर, कर्नाटक प्रशासनिक प्रणाली का सदस्य यथेष्ट रूप से ‘भारतीय’ है.सेवाओं की बहुतायत के बजाय ‘राष्ट्रीय लोक सेवा’ के नाम से केवल एकल सेवा होनी चाहिए, जिससे ‘सेवक’ कारक को महत्व दिया जाना सुनिश्चित किया जा सके जैसा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उचित रूप से ध्यान दिलाया था.यह ब्रिटिश शासनकाल से सेवाओं में प्रचलित प्रभावी जातीय व्यवस्था का अंत कर देगा.राष्ट्रीय लोक सेवा से उत्तीर्ण प्रवेशकों को रक्षा, गृह, वित्त, विदेश, खातों व रेलवे की विभिन्न धाराओं में नियुक्त किया जा सकता है और पर्यावरण विभाग को वन विभाग में सम्मिलित करने के लिए वन विभाग का भी उचित रूप से विस्तार किया जा सकता है.ऐसी धाराओं में कठोर प्रशिक्षण दिया जा सकता है ताकि प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर विभिन्न पदों पर नियुक्त अधिकारियों को उनके संबंधित क्षेत्रों का पर्याप्त ज्ञान हो.यह बेहद हास्यापद है कि अभी भी रक्षा व गृह विभागों की देखरेख अनेक विषयों की जानकारी रखने वालों सामान्यज्ञों द्वारा की जा रही है.इस तथ्य की मदद से संभवत: इस देश में इन मंत्रालयों के घटिया प्रदर्शन को समझा जा सकता है जो स्वतंत्रता प्राप्त करने के सात दशक बाद भी बुनियादी रक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विदेशी देशों पर निर्भर है.
 
औपनिवेशिक प्रशासनिक जातीय व्यवस्था के एक भाग में प्रमुख अधिकारियों और उनके मंत्री अधिपतियों के लिए निजी सहायकों (पीए) की भर्ती शामिल है.ऐसे व्यक्तियों की प्रशासिनक सीढ़ी पर उन्नति करने की संभावनाएं लगभग शून्य के बराबर होती हैं जबकि यह प्रशासनिक सिद्धांत है कि निम्नस्तर पर नियुक्त व्यक्ति को भी शीर्ष स्तर तक पहुंचने का उचित मौका दिया जाना चाहिए.क्यों न वार्षिक भर्ती को राष्ट्रीय लोक सेवा (नेशनल पब्लिक सर्विसेज) में विस्तारित किया जाए और युवा एनपीएस अधिकारियों को निजी सहायकों के रूप में नियुक्त किया जाए? इससे कार्य की गुणवत्ता और प्रेरणा काफी अधिक रहेगी.आयु सीमा एक अन्य कालभ्रम है.आखिर आयु की सीमा होनी ही क्यों चाहिए? अगर ऐसे मापदंड की आवश्यकता है ही तो बेहतर यही होगा कि सभी के लिए 40 वर्ष की आयु सीमा निर्धारित की जाए. एनपीसी के प्रत्येक स्तर पर कुल पदों के 25 फीसदी पदों में नागरिक समाज का गौण प्रवेश होना चाहिए ताकि सरकार को प्रशासनिक व्यवस्था से बाहरी अनुभव व प्रतिभा उपलब्ध करवाई जा सके.‘कैडर’ व्यवस्था जैसी विसंगतियों से व्यक्तियों में उसी दिन से असंतोष की भावना उत्पन्न होने लगती है जिस दिन उन्हें कैडर निर्दिष्ट किया जाता है.जहां तक राज्य व केंद्र अकादमियों का सवाल है, दोनों के लिए एकसमान मानक होने चाहिए क्योंकि राज्य में सेवाएं प्रदान करना राष्ट्र के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना केंद्र में सेवाएं प्रदान करना.अंत में, सार्वजनिक सेवा को ‘सेवा’ के रूप में सम्मान करने की प्रधानमंत्रर नरेंद्र मोदी की चेतावनी को कार्यान्वित करने की आवश्यकता है ताकि देश को औपनिवेशिक प्राशासिक संरचना और उसकी अनुचर जातीय व्यवस्था से मुक्त किया जा सके.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)