प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही इस अशांत समय में देश के निर्विवाद नेता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर ली हो, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि विशेष रूप से संघ परिवार और सामान्य रूप से एनडीए के भीतर कुछ तत्व प्रधानमंत्री को कमजोर अवस्था में देखना चाहते हैं. यह सभी को स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी को किसी भी प्रमुख प्रतिद्वंदी राजनीतिक दल से किसी भी गंभीर चुनौती का सामना नहीं करना पड़ रहा है और प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में कांग्रेस अपने वर्तमान नेतृत्व सहित एक प्रमुख सहायक कारक बनी हुई है. हालांकि, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ महत्वपूर्ण पदाधिकारियों ने प्रधानमंत्री को शर्मिंदा करने में कोई झिझक नहीं दिखाई है. संगीत सोम, महेश शर्मा, साक्षी महाराज व अन्यों को अपने विचारों की अभिव्यक्ति करने में संयम का प्रदर्शन करना चाहिए जो सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील घटनाओं के मद्देनजर अत्यधिक तनावपूर्ण वातावरण में सामाजिक तनाव को बढ़ाने में योगदान देते हैं. यहां तक कि अखबारों को भी विभिन्न नेताओं के विचारों के संप्रेषण में अधिक जिम्मेदराना रवैया अपनाना चाहिए.
 
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के समर्थकों ने दावा किया है कि अखबारों ने खट्टर की टिप्पणियों को सही ढंग से रिपोर्ट नहीं किया है. गौरतलब है कि कुछ दिन पहले एक प्रमुख दैनिक समाचार पत्र में खट्टर को मुसलमानों को चेतावनी देते हुए उद्धृत किया गया था कि अगर मुसलमानों को इस देश में रहना है तो उन्हें गोमांस का सेवन त्यागना ही होगा. मनोहरलाल खट्टर ने भी कहा है कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया था और वह सर्वधर्म सद्भाव में यकीन रखते हैं. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस भाजपा के सहयोगी दल शिवसेना के साथ बेहद नरमी से पेश आ रहे हैं, जिसने हाल ही में सुधींद्र कुलकर्णी के मुंह पर स्याही फेंक कर देश को शर्मसार कर दिया है. सुधींद्र कुलकर्णी एक समय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के अत्यंत करीबी सहयोगियों में शामिल थे. मुंबई में संवाददाता सम्मेलन में पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी की पुस्तक के विमोचन से पहले कसूरी की बगल में स्याही से पुते चेहरे और कपड़ों के साथ बैठे कुलकर्णी की तस्वीरों को दुनियाभर में प्रसारित किया गया. इससे पहले निडर शिवसेना ने भारतीय गजल सम्राट जगजीत सिंह को श्रद्धांजलि देने के लिए पाकिस्तानी गजल गायक गुलाम अली के संगीत कार्यक्रम को मुंबई में होने से रोक दिया था.
 
शिवसेना ने अब 8 नवंबर को नई दिल्ली में होने वाले गुलाम अली के संगीत कार्यक्रम को बाधित करने की धमकी दी है. 8 नवंबर को ही बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित किए जाने हैं और इसी दिन भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज लालकृष्ण आडवाणी का जन्मदिन भी है. बेशक, नई दिल्ली कोई मुंबई नहीं है और अगर संगीत कार्यक्रम आयोजित किया जाता है तो शिवसैनिकों की राह आसान नहीं होने वाली. देवेंद्र फड़नवीस की निंदा इसलिए की जा रही है क्योंकि उन्होंने अब तक शिवसैनिकों पर लगाम लगाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए हैं, जो गत वर्ष महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा के बाद दूसरे स्थान पर आने के बाद खुद को प्रासंगिक बनाने के लिए राजनीतिक कलाबाजी में लिप्त हो रहे हैं. नागरिक समाज के सदस्यों की बड़ी संख्या आशा करती है कि फड़नवीस न केवल सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने का प्रयास करने वाले शिवसैनिकों के खिलाफ मामला दर्ज करेंगे, बल्कि वह इस तथ्य का भी संज्ञान लेंगे कि शिवसैनिकों को उनके नेतृत्व का मौन समर्थन भी प्राप्त है जिससे शिवसेना के शीर्ष नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई आवश्यक बन जाती है.वास्तव में यह एक कठिन कार्य है लेकिन फड़नवीस अगर ऐसा कर पाते हैं तो वह खुद को इस देश के लोगों की नजरों में पापमुक्त कर लेंगे और इसके साथ ही दुनियाभर में मोदी और उनकी सरकार द्वारा असामाजिक तत्वों को शह देने व उन्हें प्रोत्साहित करने के आरोपों को भी कुंद कर सकेंगे. वास्तव में यह मोदी समर्थकों का कर्तव्य है कि वे उनकी सरकार व पार्टी में अनियंत्रित तत्वों पर समय रहते ही नकेल कसें ताकि वे भविष्य में प्रधानमंत्री की छवि को दूषित करने वाले किसी भी सुनियोजित षडयंत्र को अंजाम न देने पाएं. यह किसी से छुपा नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी में कई वरिष्ठ नेता प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता से ईर्ष्या करते हैं और उनके प्रति अपने मन में दुर्भावना रखते हैं. सत्तारूढ़ सरकार जितनी जल्दी इस हकीकत को समझेगी, इस सरकार की प्रभावशीलता के लिए उतना ही बेहतर होगा.
 
नरेंद्र मोदी के आलोचक बिहार में भाजपा की पराजय की उम्मीद कर रहे हैं ताकि उन्हें अमित शाह जैसे प्रधानमंत्री के भरोसेमंद सहयोगियों पर राजनीतिक हमला करने का मौका मिल सके. हालांकि कुछ टीवी चैनलों की राय के बावजूद शुरुआती रुझान संकेत देते हैं कि भाजपा बिहार में निर्णायक जीत दर्ज करने की राह पर अग्रसर है. इन टीवी चैनलों को एहसास नहीं है कि चूंकि बिहार के अधिकांश हिस्सों में बिजली उपलब्ध नहीं है, राज्य में प्रिंट मीडिया की व्यापक पहुंच है और इसलिए लोगों को टीवी और टीवी एंकरों व अन्य विशेषज्ञों की राय को देखने का मौका नहीं मिलता. नेताजी सुभाषचंद्र बोस के पारिवारिक सदस्यों की अपने निवास स्थान पर मेजबानी करके और इस प्रतिष्ठित स्वतंत्रता सेनानी के लापता होने संबंधी दस्तावेजों को सार्वजनिक क्षेत्र में लाने का भरोसा दिलाकर प्रधानमंत्री मोदी ने इस देश में खुद को कई लोगों का प्रिय बना लिया है. भाजपा के नजरिए से प्रधानमंत्री के इस कदम को महान राजनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि स्वतंत्रता आंदोलन में उसके कार्यकर्ताओं की वास्तव में कोई भूमिका नहीं थी और खुद को प्रासंगिक बनाने के लिए उन्हें नेहरू-विरोधी टिप्पणियों का आश्रय लेना पड़ता था. अब कांग्रेस व उसके नेताओं को नीचा दिखाने के लिए वे नेताजी के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर सकते हैं. नरेंद्र मोदी में देश के सर्वश्रेष्ठ नेता की संभावनाएं हैं लेकिन उन्हें आवश्यक रूप से समझना चाहिए कि उनकी राह में अड़चनें पैदा करने वाला विपक्ष नहीं बल्कि उनके ही कुछ सहयोगी हैं इसलिए प्रधानमंत्री मोदी को अपनी पार्टी पर अपने अधिकार का प्रयोग करना चाहिए.
 
 (ये लेखक के निजी विचार हैं.)