इस वक्त एक राजनीतिक दल के लोग और सत्ता सिंहासन पर विराजमान नेतागण साहित्यकारों पर दोषारोपण करने में जुटे हुए हैं.इसका कारण सिर्फ एक है कि उन साहित्यकारों ने देश में हो रहे सांप्रदायिक और जातीय हमलों का विरोध किया है.उनके विरोधात्मक स्वर को दबाने के लिए कुछ सियासी लोग यह सवाल उठाने में जुट गए हैं कि जब पहले इस तरह के दंगे-फसाद हुए तब वे चुप क्यों बैठे थे? वह इस वक्त ही क्यों इतने आक्रोषित हो गए हैं? उनके आक्रोष को अनावश्यक बताते हुए साहित्यकार बिरादरी को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है.यह विरोध करने वालों से हम सिर्फ यही जानना चाहते हैं कि क्या कोई किसी को एक बार पीट दे तो उसे यह अधिकार मिल जाता है कि वह सदैव पिटता रहे और दूसरा पीटता रहे.
 
सवाल यह भी है कि एक बार कोई गलती हो जाए तो क्या दोबारा भी उसे होने दिया जाना चाहिए या फिर उसका विरोध किया जाना चाहिए? हर किसी विचारवान व्यक्ति का यही जवाब होगा नहीं, अब नहीं.अब अगर गलत होगा तो हम बोलेंगे.अच्छी बात है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग राष्ट्रहित में बोल रहा है और त्याग की भावना दर्शा रहा है.केंद्र के एक मंत्री का इस बीच बयान आया कि साहित्यकार अपने पुरस्कार वापस करके स्वांग रच रहे हैं.दुख हुआ कि देश का एक योग्य मंत्री इस तरह की बात करता है जबकि उसे गलती स्वीकार करके उस पर क्षमा याचना करनी चाहिए थी.हम सभी को इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि जब भी कोई बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ है तो उसके पीछे बुद्धिजीवी लोग ही रहे हैं.धनवान और उच्च पदों पर बैठे लोगों ने सिर्फ अपने स्वार्थ सिद्ध किए हैं.बुद्धिजीवी वर्ग में साहित्यकारों का स्थान सदैव आगे रहा है क्योंकि उनके साहित्य ने ही क्रांति को जन्म दिया है.फ्रांस की क्रांति के जनक भी साहित्यकार ही थे.भारत की आजादी में भी साहित्यकारों ने ही अपनी रचनाओं और लेख के जरिए लोगों को न सिर्फ जोड़ा बल्कि नई दिशा दी थी.अब भी साहित्यकार उसी दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं.उन्होंने अपने निजी हितों के लिए कुछ नहीं मांगा है बल्कि वह राष्ट्रप्रेम और सद्भाव के माहौल को बनाने के लिए कृत संकल्प होने की बात कर रहे हैं.दुख तो तब होता है जब उच्च पदों पर बैठे लोग उनका उपहास उड़ाते हैं.मीडिया के जरिए उनको ही कठघरे में खड़ा किया जाता है.यह सत्य है कि साहित्यकार सीमा पर या देश के भीतर के दुश्मनों से युद्ध करने नहीं जाता बल्कि वह लोगों के अंदर एक युद्ध उत्पन्न करता है, कमोबेश यही हो रहा है.इस वक्त साहित्यकार उन सोई हुई आत्माओं और मुर्दा हो चुकी व्यवस्था को जगाने की कोशिश कर रहे हैं जिसे कुछ लोगों ने बलात कब्जे में ले लिया है.हम नहीं चाहते कि किसी पर उंगली उठे मगर यह जरूर चाहते हैं कि सौहार्द का माहौल कायम हो.हमारा देश प्रेम और सत्कार के लिए जाना जाता रहा है न कि आपस में लड़कर मर जाने के लिए.
 
अल्पसंख्यकों पर जिस तरह से पिछले डेढ़ साल में लगातार हमले हो रहे हैं और इसका विरोध करने वालों को डर कर जीना पड़ रहा है, यह तो तालिबानी फरमान की तरह लगता है.हमें याद है कि साहित्यकार जब कोई सवाल उठाते थे तो बगैर किसी लाग-लपेट के बड़ी-बड़ी हस्तियां उसे गंभीरता से लेती और उनका समाधान खोजती थीं, मगर अब इसके उलट हो रहा है.कुछ बेहतर करने और आमजन को इंसाफ दिलाने की बात तो दूर की कौड़ी साबित हो रही है.न सरकार की संजीदगी है और न ही कुछ पार्टियों के लोगों की.लोग आंखों पर चश्मा चढ़ाए हुए हैं, कुछ भाजपा का तो कुछ कांग्रेस और वामपंथियों का.समाजवादी भी कहने भर को रह गए हैं, क्योंकि उनकी परिभाषा में परिवार की उन्नति ही समाजवाद है.इसी तरह भगवा की राजनीति करके सत्ता तक पहुंची, भाजपा में भी अपनी विचारधारा के अलावा किसी का कोई मोल नहीं है. अगर अखबार में लिखना है तो भाजपाइयों के मुताबिक लिखो नहीं तो आप दोगले हो.किताब लिखनी है तो उन कुछ लोगों के खिलाफ ही लिखो जो कांग्रेस के खिलाफ बयां करती हो.अगर कोई इन्हें सच दिखाने की कोशिश करे तो उसको दंड मिलना तय है.ऐसा करते वक्त हम यह भूल जाते हैं कि कभी हम भी सामान्य नागरिक हो जाएंगे या हमारा भी अस्तित्व नहीं बचेगा.
 
हमारा मानना है कि सरकार और सियासी दल को आमजन ने इतनी ताकत सिर्फ इसलिए दी है कि वे उनका और समाज का विकास करें.देश में शांति और सौहार्द का माहौल बने मगर ऐसा  हो नहीं रहा है.विकास की बातें बेमानी हो रही हैं.अगर ऐसा है तो हमें क्या करना चाहिए, के सवाल का जवाब साहित्यकारों ने दिया है.उन्होंने हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया बल्कि अपने शब्दों के सृजन के जरिए आमजन को जोड़ने की कोशिश की है.उन्होंने आमजन को झकझोरा क्योंकि उन्हें पता है कि लोकतंत्र में आमजन बेहद अहम हैं.शिकायत सिर्फ यही है कि हम उन साहित्याकारों के जरिए कुछ सीखने को तैयार नहीं हैं, जो सच बोलते हैं मगर उन नेताओं और छुटभैय्यों के पीछे-पीछे घूमते हैं जो हमें झूठ और विद्वेष सिखाते हैं.साहित्याकारों के इस कदम से निश्चित रूप से एक संदेश गया है, यह संदेश देश में ही नहीं बल्कि विश्व स्तर पर भी गया है कि भारत में लगातार कुछ गलत हो रहा है. हमारे देश और प्रदेश के नीति-नियंताओं को यह   स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि देश की समृद्धि तब है जब यहां के नागरिक समृद्ध हों.ऐसा तभी संभव है जब हम अपने स्वार्थों के लिए किसी पर यह न थोपें कि दूसरा व्यक्ति ऐसा करे या वैसा करे.हमारी पुलिस को तत्काल कड़े कदम उठााने पड़ेंगे.प्रशासन की जिम्मेदारी में यह निहित है कि हर व्यक्ति को वह बिजली पानी उपलब्ध कराएगा.यह तभी संभव है जब सुख-शांति कायम होगी.अगर ऐसा नहीं होता है तो देश का न विकास हो सकता है और न ही समृद्धि आ सकती है.आज जरूरत है उन विचारों की जो हमें आगे बढ़ाएं और आपस में जोड़ें, न कि पीछे धकेलें और दोस्त घटाएं.हम सभी को इन साहित्यकारों की भावनाओं को समझना होगा नहीं तो तस्लीमा नसरीन और हमारे साहित्यकारों के बीच क्या फर्क रह जाएगा.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं)