आमतौर पर, यह सिंहासन ही है जो किसी भी शासक के कद को और बढ़ाता है, लेकिन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी शीर्षस्थ व्यक्तियों के ऐसे अनूठे दल से संबंध रखते हैं जहां शासक कुर्सी की प्रतिष्ठा को बढ़ाता है. गत सप्ताह, राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने प्रोटोकॉल तोड़ कर खुद वाजपेयी के निवास स्थान, 6-ए, कृष्ण मेनन मार्ग, जाकर लोकतंत्र के 90 वर्षीय बीमार अगुआ को भारत रत्न से सम्मानित किया. राष्ट्रपति के पास नियम पुस्तिका की अनदेखी करने के लिए ठोस कारण था क्योंकि वह एक ऐसी शख्सियत को सम्मानित कर रहे थे जिसने अपने छह वर्ष के शासन के दौरान भारत को सामाजिक व राजनीतिक रूप से एकजुट किया. चेहरा, चाल, चलन और चरित्र  के अपने सिद्धांत के साथ उन्होंने कई आलोचकों को गलत साबित किया. उनके भगवा संस्कारों के बावजूद वापजेयी का चेहरा सभी को स्वीकार्य था. वह केवल नेताओं के नेता ही नहीं अपितु वर्गों व आम जनता, दोनों के प्रिय भी थे.  

भारत रत्न के रूप में उनकी ताजपोशी के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों के कई नेताओं की मौजूदगी भारतीय राजनीति में वाजपेयी के अनोखे स्थान को प्रतिबिंबित करता है. वह केवल राष्ट्रीय हित में झुकते थे और अगर उनकी ईमानदारी और देशभक्ति पर कभी सवाल किया जाता तो वह किसी शेर की तरह दहाड़ते थे. वाजपेयी को प्रतिष्ठित मेडल भेंट कर प्रणब मुखर्जी न केवल एक व्यक्ति को बल्कि खुद भारत को यह महान सम्मान प्रदान कर रहे थे. वाजपेयी पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्हें उनके जीवनकाल के दौरान भारत रत्न दिया गया है. बिना किसी स्पष्टीकरण के जो लोग अब उनकी प्रशंसा में गीत गा रहे हैं वही लोग एक दशक से भी अधिक समय तक उनकी योग्यताओं को लोभी कारणों से अनदेखा करते आ रहे थे. उनका मानना था कि उनकी परवरिश ऐसी पौधशाला में हो रही थी जो भारत को सांप्रदायिक एवं जातीय आधारों पर विभाजित करने वाले विशेषज्ञों का उत्पादन कर रही थी, लेकिन यह केवल उनकी महज एक कोरी कल्पना भर थी.

एक प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी न केवल एकजुटता के अनोखे सूत्रधार थे बल्कि समकालीन भारत के सबसे पारदर्शी व सहनशील राजनीतिक नेता भी रहे हैं. उनके साथ मेरी कई मुलाकातों में से एक के दौरान, सोनिया गांधी सहित अन्य कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने को लेकर कुछ भाजपा नेताओं की नाराजगी पर मैने उनकी प्रतिक्रिया मांगी. मुझे तुरंत ही मुंहतोड़ जवाब दिया गया ‘संपादक जी, अगर हम भी वही करेंगे तो हममें और उनमें क्या फर्क रह जाएगा?’ कई मंत्रिमंडलीय सहयोगी जैसे कि जार्ज फर्नांडीज व अन्य, सदैव कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ आयोग नियुक्त करने अथवा मुकदमे दायर करने के लिए उन पर दबाव पाया करते थे, लेकिन वापजेयी द्वारा उनके जांच दलों को दिए गए निर्देश स्पष्ट थे ‘बिना ठोस सबूत के किसी के भी खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाए.’ प्रतिशोध कभी भी उनकी कमजोरी नहीं रही. वह इतने दरियादिल थे कि अपने कट्टर आलोचकों और को भी महत्वपूर्ण विभाग सौंप देते थे. वह चाटुकारिता के बजाय योग्यता को महत्व देते थे. उन्होंने 22 दलों वाली गठबंधन सरकार चलाई, लेकिन अपने उत्तराधिकारी की तरह, अलोकप्रिय फैसलों के लिए कभी भी ‘गठबंधन बाध्यताओं’ को दोष नहीं दिया. वाजपेयी के पास, अहंकार द्वारा अबाधित एक लचीला दृष्टिकोण था. 

 हालांकि उनका कइ उनकी पार्टी से बड़ा था, वापजेयी ने सदैव पार्टी संरचना का आदेश स्वीकार किया. एक बार, पार्टी की कुछ जिम्मेदारियों को संभालने के लिए एक मंत्री का चयन करने का निर्णय लिया गया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख अधिकारी वाजपेयी की पसंद के बारे में जानना चाहते थे क्योंकि वह पार्टी और सरकार के बीच सौहार्द्रपूर्ण संबंध चाहते थे, लेकिन वाजपेयी ने उन्हें बताया कि वे अपनी पसंद के किसी भी मंत्री को चुन सकते हैं. वह हमेशा पार्टी प्रमुख को पूरा सम्मान देते थे और उनके निर्णयों को स्वीकारते थे. वाजपेयी एक ऐसी संस्था बन गए जिनके ईर्द-गिर्द आम सहमति, निरंतरता और संयोजकता का वर्णन न केवल लिखा जाता था, बल्कि व्यवहार में भी लाया जाता था.

यह तीनों उनकी आस्था का लेख रहे हैं. वाजपेयी का सोचना था कि भारत जैसा विविध देश केवल इन के माध्यम से ही न केवल एकजुट रह सकता है, बल्कि एक विश्वशक्ति भी बन सकता है. अगर आज भारत दस करोड़ से भी अधिक मोबाइल फोन उपभोक्ताओं का दावा करता है, तो इसका श्रेय उनके शासनकाल के दौरान सूत्रबद्ध की गई दूरसंचार नीतियों को जाता है. यद्यपि मोबाइल दूरभाषी की नींव नरसिंह राव सरकार के दौरान रखी गई थी, यह वाजपेयी ही थे जिन्होंने मंत्रियों एवं बाबुओं को प्रेरित किया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारत की संयोजकता, विश्व की तुलना में सबसे तीव्र गति से बढ़े. उन्होंने यह भी महसूस किया कि हवाई व सड़क मार्ग से शहरों को जोड़ कर शहरी व ग्रामीण भारत, और अमीर और गरीब वर्ग के बीच बढ़ती हुई सामाजिक व आर्थिक दरार को कम किया जा सकता है.

राजग शासनकाल के दौरान रोजाना 11 किलोमीटर नई सड़क बनाई जाती थी जो एक अपराजित रिकार्ड है. वाजपेयी दुनिया के साथ संबंध बनाने को लेकर भी समान रूप से जोशिले थे, लेकिन अपनी शर्तों पर। 1998 के परमाणु परीक्षणों के नकारात्मक नतीजों को भली-भांति जानते हुए भी उन्होंने परीक्षण करने का फैसला किया क्योंकि शेष दुनिया केवल राष्ट्र की शक्ति को ही समझती है, उसके धन को नहीं. एक वर्ष से भी कम समय में, पूरी दुनिया भारत के साथ व्यापार करने को तरस रही थी. कारगिल युद्ध के बाद भी, पाकिस्तान के साथ बात करके वाजपेयी ने विदेश नीति में निरंतरता पर अमल किया.

शांतिवादी और भारत-पाक वार्ता को प्रोत्साहित करने वाले उनके भक्त बन गए, लेकिन वाजपेयी ने कभी भी विदेश प्रायोजित निर्वाचन क्षेत्र के लिए समर्थन की तलाश नहीं की. उदाहरण के तौर पर, जब सभी अंग्रेजी टीवी चैनल पाकिस्तान के साथ समझौते के लिए दबाव बना रहे थे, तब सफेद बालों वाले और सुर्ख चेहरे वाले प्रधानमंत्री ने उन्हें गलत साबित करते हुए 2001 में जनरल मुशर्रफ को आगरा से खाली हाथ वापस भेज दिया. वापजेयी का मानना था कि दो राष्ट्रों के प्रमुखों द्वारा हस्ताक्षरित कोई भी दस्तावेज तब निरर्थक हो जाता है अगर वो ऐसे प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता को नष्ट करे जिसे देश की प्रतिष्ठा सुपुर्द की गई हो. वाजपेयी अभी भी हमारे बीच मौजूद हैं, लेकिन उनके विचारों के अस्तित्व को बहुत बड़ा खतरा है. 

(यह लेखक के निजी विचार हैं.)

 प्रभु चावला वरिष्ठ पत्रकार हैं.