न्यायविदों की अंतरराष्ट्रीय परिषद ने मुंबई विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह भवन में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया. संगोष्ठी में कई प्रख्यात न्यायधीशों, राजनेताओं, वकीलों, कानून के शिक्षकों, विद्यार्थियों और प्रेस के सदस्यों ने भाग लिया. यह हर मायने में एक बहुत ही प्रभावशाली सभा थी. बांग्लादेश के माननीय मुख्य न्यायाधीश, आदरणीय सुरेंद्र कुमार सिन्हा, भारत से बाहर के हमारे सबसे प्रतिष्ठित अतिथि थे. उन्होंने अपनी बेहद स्पष्ट और यादगार प्रस्तुति द्वारा इस विषय पर चर्चा की शुरुआत की. मेरा मानना है कि उस प्रस्तुति के मुख्य भागों को दोहराना महत्वपूर्ण है. 

मुख्य न्यायाधीश सिन्हा ने उचित रूप से ध्यान दिलाया कि जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा आतंकी गतिविधियों की निंदा सर्वसम्मत और स्पष्ट रही है, उनका मुकाबला अथवा उन्हें नियंत्रित करने के लिए अभी तक किए गए प्रयासों को प्रभावित देशों के दृष्टिकोणों में अंतर और उनकी निर्बल क्षमता के कारण क्षति पहुंची है. यह कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि आतंकवाद के भयावह अपराध पूरी मानवता को शिकार बनाने का इरादा रखते हैं. न्यायाधीश सिन्हा ने दिन-प्रतिदिन दुनिया भर में देखे जाने वाले चित्रात्मक एवं रौंगटे खड़े करने वाले दो अलग-अलग दृष्टांत प्रस्तुत किए.

सबसे पहले, जार्डन के पायलटों को जिंदा जलाने, मिस्र के ईसाई कार्यकर्ताओं की सामूहिक हत्या, दुर्लभ प्राचीन वस्तुओं का विनाश, सिर कलम करने, अंग-विच्छेदन, पत्थर से मार-मार कर हत्या करने व सूली पर चढ़ाने जैसे आतंकवादियों के क्रूरतापूर्ण कृत्य. उनका दूसरा दृष्टांत था जो कुछ भी उनके अपने देश में 17 अगस्त, 2005 को घटित हुआ. बांग्लादेश के 64 में से 63 जिलों में दोपहर से पहले आधे घंटे से भी कम समय के भीतर, 300 अलग-अलग स्थानों पर 500 बम विस्फोट हुए. जमात-उल-मुजाहिद्दीन नाम के आतंकी संगठन ने इस जघन्य बमकांड की जिम्मेदारी ली थी. 

बांग्लादेश की जांच एजेंसियों व न्यापालिका, दोनों को समान रूप से श्रेय जाता है कि दोषियों को मार्च 2006 तक गिरफ्तार कर लिया गया था और 2007 तक मुकद्दमे की सुनवाई पूरी कर ली गई थी. अपराधियों को दोषी पाया गया, सजा सुनाई गई और उसी वर्ष प्राणदंड दे दिया गया. माननीय मुख्य न्यायाधीश ने यह घोषित करके वहां मौजूद प्रतिनिधियों का दिल जीत लिया कि ऐसे आतंकवादियों व आतंकी गतिविधियों के लिए उनके देश, बांग्लादेश के पास पूर्ण असहनशीलता है. हमें यह सुनकर बेहद प्रसन्नता हुई कि बांग्लादेश आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध को समर्थन देता है और भविष्य में भी देता रहेगा. 

उन्होंने ऐसे मानव समूहों के लिए स्पष्ट रूप से घृणा जाहिर की जिनके बीच ऐसे अपराध पनपते हैं, और जहां रक्त और मानवीय जीवन की कीमत डबल रोटी से भी सस्ती है. जबकि यह सत्य है कि आतंकवाद का अभ्यास किसी विशेष धर्म, क्षेत्र अथवा समुदाय तक ही सीमित नहीं है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भारत की शांति और सुरक्षा को उन लोगों से खतरा है जो ‘शुद्ध’ इस्लाम के अनुयायी होने का दावा करते हैं, जिनका यह मानना है कि अन्य किसी भी धर्म अथवा विश्वास को नष्ट कर देना चाहिए और यह कि इस्लाम को दुनिया पर राज करना चाहिए.

मैं अफसोस के साथ केवल इतना कह सकता हूं कि ऐसी धारणा को केवल इस्लाम के प्रति तिरस्कार, और पैगम्बर के प्रति भयंकर अपमान के रूप में चिन्हित किया जा सकता है. ऐसे अपराधी ईश्वर या किसी दैवीय शक्ति की नहीं अपितु झूठे शिक्षकों, मुल्लाओं व मौलानाओं की देन हैं जो ऐसे शैतानी शिक्षण के साथ युवाओं के मन को दूषित कर रहे हैं. 

मैं सभी मुस्लिम बुद्धिजीवियों को हजरत मोहम्मद साहिब द्वारा जेहाद को दो भागों में विभाजित किए जाने के बारे में याद दिलाना चाहूंगा. उन्होंने शारीरिक संघर्ष को जेहाद कबीर व अंतरात्मा में मौजूद शैतान के साथ संघर्ष को जेहाद अकबरी के रूप में वर्णित किया था. उन्होंने कहा था कि इस्लाम के लिए कम सार्थक, शारीरिक संघर्ष यानि कि जेहाद कबीर अब समाप्त हो चुका है और अधिक महत्वपूर्ण, अंदरूनी व नैतिक संघर्ष यानि कि जेहाद अकबरी  की शुरुआत हो चुकी है. लेकिन दुर्भाग्य से, सभी आतंकी संगठनों ने हजरत साहिब के इस कथन को अपने अनुयायिओं से छिपा कर रखा है. 

वह अपने कुटिल अपराधों को अंजाम देने के लिए अनुयायिओं को दुनिया पर राज करने का झूठा सपना दिखाते हैं और उन्हें अपना दास बना कर रखते हैं. मुस्लिम जगत में तीव्र गति से बढ़ती हुई हिंसक घटनाओं को देखते हुए, ये स्पष्ट है कि यह संघर्ष अभी खत्म नहीं होने वाला. समय के साथ, यह तेजी से नियंत्रण के बाहर होता प्रतीत हो रहा है और किसी को भी मालूम नहीं है कि इसे किस प्रकार खत्म किया जा सकता है. भारत को गर्व महसूस करना चाहिए कि विजय, रक्त और कट्टरता के अपने ऐतिहासिक अंश को भुगतने के बाद, उसने एक ऐसा धर्मनिरपेक्ष देश होना चुना जिसकी धर्मनिरपेक्षता उसके संविधान की बुनियादी विशेषता है. भारत की धर्मनिरपेक्षता, कारण एवं तर्क द्वारा पूर्णत: निर्देशित, किंतु प्रेम व करूणा द्वारा पूर्णत प्रेरित जीवन का अधिदेश देती है.

धर्मनिरपेक्षवाद, शिक्षा एवं वैज्ञानिक भावना पर आधारित है. मैने पहले भी लिखा है और फिर दोहराने की इच्छा रखता हूं कि प्रत्येक   शास्त्र के दो भाग होते हैं पहला अस्थायी, जो उसके मूल के संदर्भ एवं स्थान में तर्कसंगत रूप से स्थित है, और दूसरा भाग जो अनन्त, अमर और सार्वभौमिक रूप से माववता पर लागू है. मैं एक बार फिर दोहराता हूं कि मैं इस्लाम के पैगम्बर साहिब का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं क्योंकि वही एकमात्र ऐसे पैगम्बर हैं जिन्होंने अपने अनुयायिओं को साफ-साफ बतलाया था कि ‘जब आप ज्ञान की खोज में चलते हैं, तो आप ईश्वर की खोज में चलते हैं, विलान की स्याही एक शहीद के रक्त से अधिक पवित्र है.’ जब तक उनके अनुयायी, उनके पैगम्बर के शिक्षण की अनुपालना करते रहे, वे सभ्य दुनिया के रहनुमा थे। जब उन्होंने उनके शिक्षण को त्याग दिया, सभी पुस्तकें जला डालीं और केवल कुरान को पढ़ने लगे और वो भी उसकी संपूर्णता में नहीं, वे उनके गुलाम बन गए जो कभी उनसे शिक्षित थे. मुसलमानों को पूर्वकालीन वैभव वाले इस्लाम को आवश्यक रूप से वापस बुलाना चाहिए क्योंकि उसका मौजूदा वहाबी संस्करण को गंभीर रूप से पुनर्जागरण की आवश्यकता है. 
    (यह लेखक के निजी विचार हैं)
राम जेठमलानी वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सदस्य हैं.