लोकतंत्र और मीडिया के बीच का रिश्ता निश्चित रूप से लोकतंत्र का सबसे प्रचंड तथ्य है. यह दोनों शक्ति के समानांतर स्तंभों का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन यह दोनों वास्तव में कभी भी एक-दूसरे से ज्यादा दूर नहीं रहते. परस्पर-प्रशंसा से लेकर संदेह, अविश्वास, द्वेषवाद और कभी-कभार तो शत्रुता तक, इनकी मनोदशा परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है. कभी उनके हितों में टकराव होता है तो कभी व्यक्तित्व के हावी रहने के कारण तर्कहीन अहंकार निर्णय के साथ हस्तक्षेप करता है. यहां गतिशीलता में सदैव आवश्यकता का अंतर्निहित पाठ्य छुपा होता है और यह आवश्यकता निजी अथवा संस्थागत हो सकती है. इसलिए, इसे एक ऐसा संवेदनशील व महत्वपूर्ण रिश्ता होना चाहिए जिसे पूरी सावधानी के साथ संभालना चाहिए. अक्सर देखा गया है कि यह रिश्ता लापववाही का शिकार बन जाता है. 
 
एक लोकतांत्रिक सरकार के पास एक विकल्प के रूप में सेंसरशिप नहीं होती. इसमें ‘अगर’ और ‘मगर’ के लिए कोई जगह नहीं है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक गैर-पराक्रम्य अधिकार है. ऐसे मौके आते हैं जब पत्रकारिता शायद एक पाखंडी की जुबान की तरह कायर बन सकती है और सरकारों के पास शायद कश्मीर से लेकर कोचीन तक की शिकायतों की सूची हो सकती है. लेकिन, कानून द्वारा अनुमोदित अनुमति प्रतिकार ही एकमात्र उपाय है. कानून सेंसर की क्रूर कैंची की अनुमति नहीं देता और न ही देगा. सेंसरशिप अवैध, अनैतिक और अव्यवहारिक है. लोकतंत्र में ऐसी संरचनाएं हैं जिन्होंने इसका समाधान निकाला है जिनमें प्रलोभन के मुआवजे के रूप में व्यक्तिगत पत्रकारों द्वारा सेल्फ-सेंसरशिप (आत्मनियंत्रण) सबसे प्रमुख है. जाहिर कारणों से इसे समझना मुश्किल है. मीडिया के लिए यह जोखिम है कि अगर एक बार यह प्रमाणित हो गया तो उसकी विश्वसनीयता हमेशा के लिए चली जाएगी. एक बार खोई विश्वसनीयता को पुन: प्राप्त करना बेहद कठिन है. अगर दर्शक मीडिया उत्पाद में विश्वास खो देंगे तो उस प्रकाशन अथवा चैनल के जीवन चक्र को समाप्त समझिए. मीडिया के सभी साधनों में बातचीत एक ऐसा सबसे बुनियादी साधन है जिसके जरिए मीडिया और एक राजनीतिज्ञ के बीच के सामान्य समीकरण धीरे-धीरे प्रकट होते हैं. कई बार सबसे अधिक लाभकारी बातचीत भी अप्रकाशनीय हो सकती है. राजनीतिज्ञ और पत्रकार के बीच परस्पर भरोसा ही आधारभूत बंधन है. इस भरोसे को तोड़ने वाला कोई भी पत्रकार इस पेशे के योग्य ही नहीं है. ऐसे ही, अगर सार्वजनिक जीवन में जो कोई भी अप्रकाशनीय चर्चा में जनता को गुमराह करता है तो वह मूर्ख है. यह सच है कि कोई भी सत्तारूढ़ नेता अथवा पार्टी सब कुछ नहीं बताती, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप गुमराह करें अथवा तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करें. ऐसे मामले हुए हैं जहां पत्रकारों ने उन पर किए गए भरोसे का दुरुपयोग किया है लेकिन अंत में इस का सबसे अधिक नुकसान उन्हीं पत्रकारों को होता है जिन्होंने भरोसे का दुरुपयोग किया है. 
 
प्रकाशित होने वाले साक्षात्कार सबसे नाजुक समस्या हैं. नियम स्पष्ट हैं लेकिन तब भी साक्षात्कार एक सूक्ष्म कला है. एक पत्रकार के पास प्रश्न सूची तैयार करने का ज्ञान होना चाहिए और उसके बाद किसी टालमटोल करने वाले जवाब में विरोधाभासों को पकड़ना चाहिए. यह स्वाभाविक है कि जिस व्यक्ति का साक्षात्कार लिया जा रहा है वो वही सूचना देगा जो उसके हितों के अनुकूल हैं, लेकिन जो अभी तक कहा नहीं गया है उसे सामने लाने के कई तरीके हैं. आक्रामकता उचित उत्तर नहीं है. दोषारोपणयुक्त सवालों का इस्तेमाल अचेत प्रतिक्रिया को भड़काने के लिए किया जाता है, लेकिन कोई भी अनुभवी राजनीतिज्ञ ऐसे सवालों को बहुत आसानी के साथ टाल देगा. मुझे कूटनीतिक मौन की तकनीक बहुत पसंद आई. आप जितनी कोमलता से और स्पष्ट रूप से पूछ सकते हैं प्रश्न पूछिए, आपको उत्तर मिलेगा. अगर आपको उत्तर असंतोषजनक या चयनात्मक लगता है तो शांत रहिए जैसे आप उत्तर पूरा होने की प्रतीक्षा कर रहे हों. साक्षात्कार देने वाले को मौन से बेहद असहजता महसूस होती है. वे लगभग अनिवार्य रूप से इस मौन की शून्यता को किसी चीज के साथ भरने का प्रयास करते हैं और यही चीज एक ऐसा अवलोकल या कहानी बन जाती है जो साक्षात्कार में जान डाल देती है, लेकिन यह सब उस युग में आसान था जब प्रिंट मीडिया का वर्चस्व था. मुद्रण साक्षात्कार में समय संबंधी समस्या का सामना नहीं करना पड़ता. लेकिन टेलीविजन के पास मौन के लिए पर्याप्त स्थान और समय नहीं होता. मीडिया का काम है प्रश्न पूछना, लेकिन जांच की भावना को कभी भी न्यायिक जांच की दुर्भावना के गर्त में नहीं गिरना चाहिए. स्वाभाविक रूप से राजनेता इस का बुरा मानते हैं, लेकिन उन्हें यह भी समझना चाहिए कि उनकी समस्या पत्रकार द्वारा पूछे गए सवाल में कम और ऐसे उत्तर देने की उनकी अथक उत्सुकता में अधिक निहित है जिनका पछतावा शायद उन्हें बाद में हो सकता है. जिस व्यक्ति ने साक्षात्कार में संयम खो दिया, समझिए वह साक्षात्कार की आमने-सामने की लड़ाई हार गया.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं)