अगर जनमत सर्वेक्षणों द्वारा दिखाए जा रहे आंकड़े सही हैं तो बिहार विधानसभा चुनाव यकीनन बेहद नजदीकी मुकाबला होने जा रहा है और नतीजों को लेकर अभी कोई अपरिपक्व भविष्यवाणी करना अंधेरे में तीर मारने समान होगा और अगर बिहार के मतदाता वास्तव में निर्णायक जनादेश देने को लेकर अभी भी दुविधा में हैं तो ऐसा केवल एक कारण से है. इसका राज्य की जटिल जातीय राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है. बात बस इतनी है कि बिहारियों को उनकी प्रथम प्राथमिकता प्रस्तावित नहीं की गई है.

वर्ष 2005 और 2010 के विधानसभा चुनावों में बिहार ने जनता दल (युनाइटेड)-भाजपा गठबंधन को स्पष्ट बहुमत से जिताया था. नीतीश कुमार के नेतृत्व और सुशील मोदी द्वारा निपुणतापूर्वक  समर्थित गठबंधन सरकार ने निश्चित रूप से मतदाताओं को अपने प्रदर्शन से संतुष्ट किया था. आंकड़े बताते हैं कि लालू प्रसाद यादव के जंगलराज के बाद बिहार ने गठबंधन सरकार के शासनकाल के दौरान आम कल्याण और दोहरे अंकों में आर्थिक विकास की उल्लेखनीय अवधि दर्ज की. इसमें कोई शक नहीं कि अगर जनता दल (युनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन आज भी होता तो बिहार के मतदाता 2015 विधानसभा में इसे जोरदार व स्पष्ट जनादेश देते.

लेकिन, दोनों दलों के सफल गठबंधन के बीच नीतीश कुमार का विशाल अहंकार दीवार बनकर खड़ा हो गया और फलस्वरूप दोनों दलों ने संबंध विच्छेद कर लिया. वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के बावजूद नरेंद्र मोदी की अत्यधिक प्रशंसा करने को लेकर नीतीश कुमार के मन में कोई दुविधा नहीं थी, लेकिन एक समकक्षी मुख्यमंत्री का प्रधानमंत्री पद की आकांक्षा रखना नीतीश कुमार को नागवार गुजरा. नीतीश कुमार ने वैचारिक कारणों से नहीं, अपितु अपने अहंकार को दिलासा देने के लिए वर्ष 2013 में एकबार फिर से 2002 के गोधरा कांड व गुजरात दंगों का जिक्र किया. तमाम दुर्भावनाग्रस्त प्रयासों के बावजूद नीतीश मोदी को राष्ट्र के सर्वोच्च कार्यकारी कार्यालय से वंचित नहीं रख सके, लेकिन नीतीश ने खुद को बिहार में लगातार तीसरे कार्यकाल और केंद्र में संभावित शक्तिशाली भूमिका से वंचित जरूर कर लिया. इसके साथ ही नीतीश ने बिहार के लोगों से उनकी पहली पसंद की सरकार निर्वाचित करने के विकल्प को भी छीन लिया. 

सच्चाई यह है कि बिहार के मतदाता नीतीश और मोदी (नरेंद्र व सुशील) दोनों को सत्ता में देखना चाहते हैं, लेकिन उन्हें इनमें से एक को चुनना होगा. भाजपा द्वारा मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के नाम की घोषणा न करने के साथ बिहार के मतदाताओं की चयन समस्या और बढ़ गई है. अगर भाजपा विजयी होती है तो नरेंद्र मोदी तो बिहार पर शासन करेंगे नहीं और नीतीश कुमार एक जाना पहचाना नाम है. चयन कठिन इसलिए है क्योंकि नीतीश ने राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ संबद्ध करके खुद को सबसे अलोकप्रिय दलों के साथ जोड़ लिया है.

अगर भारतीय जनता पार्टी ने सुशील मोदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया होता तो शायद उसे स्पष्ट बढ़त मिल सकती थी. अगर नीतीश ने खुद को भ्रष्ट और बदनाम कांग्रेस के साथ गठबंधन से दूर रखा होता तो शायद नीतीश को भी बढ़त मिल सकती थी.

यह स्तंभलेखक बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा को मजबूत स्थिति में देखता है. बिहार के मतदाताओं के जहन में राष्ट्रीय जनता दल के 15 वर्ष के शासन की भयावह यादें आज भी ताजा हैं जिसने राज्य को अराजतकता और अंधकार के युग में वापस धकेल दिया था. इसमें कोई शक नहीं कि अगर नीतीश कुमार भविष्य में बिहार के मुख्यमंत्री बनते हैं तो लालू प्रसाद यादव उन पर भारी प्रभाव का इस्तेमाल करेंगे. इसकी प्रबल संभावना है कि लालू प्रसाद अपनी एक या अधिक संतानों को नीतीश सरकार में स्थापित करेंगे. वहीं दूसरी ओर भाजपा अगले साढ़े तीन वर्ष तक केंद्र में सत्ता में है और मतदाताओं के लिए समझदारी इसी में है कि वे अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए उसी पार्टी को निर्वाचित करें जो केंद्र में सत्तारूढ़ है. यह कहने की आवश्यकता नहीं कि जातीय विन्यास अपनी भूमिका निभाएंगे, लेकिन अगर चुनवी नतीजों के निर्धारण में बिहार के युवा मतदाता की अहम भूमिका सामने आती है तो इसमें किसी को हैरान नहीं होना चाहिए. नरेंद्र मोदी आज भी युवा मतदाताओं में खासे लोकप्रिय हैं.

अंत में, नीतीश कुमार पर सबसे अधिक दांव लगा हुआ है. अगर नीतीश जीतते हैं तो वह भाजपा-विरोधी राजनीति का केंद्र बन सकते हैं. अगर नीतीश हार जाते हैं तो यह पराजय उनके राजनीतिक करियर का अंत कर सकती है. हमें 8 नवबंर को बिहार के मुख्यमंत्री की अहंकार यात्रा का अंतिम परिणाम पता चल जाएगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)