देश के विभिन्न हिस्सों में, विशेष रूप से दादरी में, हाल में हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं इस देश की छवि के लिए अत्यंत हानिकारिक सिद्ध हुई है. गौरतलब है कि उत्तरप्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक की केवल इसलिए हत्या कर दी गई थी क्योंकि कुछ लोगों को उस पर गोमांस का सेवन करने का संदेह था. अंत में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को मौजूदा सरकार की ओर से मजबूत समर्थन उत्पन्न करने के लिए भारत के बहुलता और सहनशीलता के बुनियादी मूल्यों को दोहराने की जिम्मेदारी स्वयं पर लेनी पड़ी. वास्तव में, राष्ट्रपति भवन में प्रणब मुखर्जी के तात्कालिक भाषण से संकेत लेते हुए पीएम मोदी ने अपना मौन भंग किया और हिंदुओं व मुसलमानों को एक-दूसरे के साथ लड़ने के बजाय गरीबी के खिलाफ लड़ने के लिए कहा. इससे पहले न्यूयॉर्क की आधिकारिक यात्रा पर गए वित्तमंत्री अरुण जेटली ने भी अवलोकन किया कि दादरी जैसी घटनाओं की सर्वत्र निंदा की जानी चाहिए. 
 
सभी वर्ग के राजनीतिज्ञों द्वारा एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने के लिए राष्ट्रीय राजधानी के समीपवर्ती क्षेत्र में हुई इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का इस्तेमाल किया जा रहा है और ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं कि 50 वर्षीय मोहम्मद अखलाक की हत्या संघ परिवार के निष्ठावान तत्वों की सुविचारित रणनीति का परिणाम था. अगर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने गोहत्या की निंदा करते हुए कठोर रुख अपनाया होता तो किसी विधायक, या कनिष्ठ मंत्री की इस विषय पर भड़काऊ भाषण देने की हिम्मत न होती. ऐसा सोचा गया था कि मोदी की सिलीकॉन वैली की यात्रा देश में भारी निवेश का प्रवेशद्वार साबित होगी और दुनिया की उभरती हुई डिजीटल महाशक्ति के रूप में भारत को बढ़ावा देगी. लेकिन यह स्पष्ट हो चुका है कि उनकी अपनी विस्तारित पार्टी के परिवार में मौजूद गौण तत्व हालातों को अस्थिर करने के लिए आगे बढ़ रहे थे. देश में हर कहीं लोगों को यह सोचने के लिए विवश होना पड़ रहा है कि क्या भारत एक उभरती हुई डिजीटल महाशक्ति है या फिर एक ऐसा विभाजनकारी राष्ट्र जहां लोकतंत्र के प्राथमिक सिद्धांतों का अनादर किया जा रहा है और विवेकशील स्वरों का दम घोंटा जा रहा है. बेशक, कुख्यात दादरी प्रकरण ने देश को कलंकित किया है लेकिन देश को अगर शीर्ष राष्ट्रों की सूची में शुमार होना है तो तर्कवादियों की हत्या और लोगों पर विचार और विचारधाराओं को थोपने का प्रयास सही तरीका नहीं प्रतीत होता. नयनतारा सहगल, अशोक वाजपेयी और उदय प्रकाश द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस करने का फैसला उनकी उस मनोव्यथा को दर्शाता है जिसके साथ यह बुद्धिजीवी असहनशीलता के विकसित होते नाटक को देख रहे हैं. यह एक सर्वविदित तथ्य है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू की भतीजी नयनतारा सहगल अपनी चचेरी बहन इंदिरा गांधी की एक सक्रिय आलोचक थी और 1975 में आपातकाल लगाए जाने का जोरदार विरोध किया था. चूंकि यह प्रसिद्ध लेखिका अतीत में नागरिक स्वतंत्रता और मानव अधिकारों पर नियंत्रण के खिलाफ विभिन्न पैनलों की सदस्य रही है, इसलिए कोई भी उन पर कांग्रेसी समर्थक होने का आरोप नहीं लगा सकता. उचित मार्ग यही होगा कि इस देश में विचारकों को एक विशेष विचारधारा के सुव्यवस्थित सर्मथकों द्वारा बिना किसी विरोध के उनके विचार अभिव्यक्त करने की अनुमति दी जाए. यह भी सच है कि सहनशीलता का अभाव केवल संघ परिवार से जुड़े लोगों तक ही सीमित था. इस मामले में अन्य लोग भी बराबर के दोषी हैं.
 
चूंकि केंद्र में भाजपा सत्ता में है, यह नेताओं का कर्त्तव्य बनता है कि वे सुनिश्चि करें कि जो लोग भाजपा की विचारधारा से सहमत नहीं हैं, उन्हें किसी भी हाल में नुकसान न पहुंचाया जाए. राजनीति को एकतरफ रखते हुए कुछ दिन पहले उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा था कि यह मौजूदा सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह नागरिकों के जीवन के अधिकार की सुरक्षा करे. भारत जैसे विविध देश में इस प्रकार का सांस्कृतिक आतंक अस्वीकार्य है, जहां विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं और विभिन्न धर्मों का अभ्यास किया जाता है. एक परिभाषा के अनुसार संस्कृति भी राजनीति का पर्याय है. इसलिए किसी को भी संस्कृति के बारे में बात करके दूसरों की आंखों में धूल झोंकने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. कुल मिलाकर हिंदू बेहद सहनशील लोग हैं और देश के विभिन्न हिस्सों के साथ बदलती प्रथाओं और रीति-रिवाजों को स्वीकार करते हुए उनका पालन करते हैं. अगर भारत वास्तव में बीते 68 वर्ष के दौरान एक लोकतंत्र के रूप में विकसित हुआ है तो ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारा देश एक हिंदू बहुलवादी देश है और हिंदुओं ने हमेशा से यह साबित किया है कि उन्हें नए विचारों और विश्वासों का भय नहीं था लेकिन अपनी संस्कृति व परंपरा पर गर्व था. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत इसलिए भी एक धर्मनिरपेक्ष देश है क्योंकि यह मुख्य रूप से हिंदू राष्ट्र है. पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को धर्म के आधार पर स्थापित किया गया था और वह अभी तक न ही लोकतंत्र और न ही धर्मनिरपेक्षता को बरकरार रख पाया है. इसलिए यह जरूरी है कि भाजपा अपने गौण तत्वों पर लगाम लगाए और अपने कुछ कालभ्रमित और धर्मांध समर्थकों से अपनी भावनाओं पर काबू रखने के लिए कहे. सरकार को चलाने और देश को एकजुट रखने का दायित्व इस पार्टी के नेताओं पर है. भारत को असहनशीलता और बहुलवाद के प्रति द्वेष के बजाय विभिन्न क्षेत्रों में उसकी उन्नति के लिए पहचाना जाना चाहिए. भाजपा नेतृत्व को आवश्यक रूप से सुनिश्चित करना चाहिए कि भारत ‘डिजीटल इंडिया’ की ओर बढ़ने के लाभ को खो न बैठे और फलस्वरूप ‘विभाजनकारी भारत’ को बढ़ावा देने के जाल में न फंस जाए.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)