1947 में जहां भारत ने ‘स्वतंत्र’ नीति की शुरुआत की थी, वहीं कोरिया एक विभाजित और गरीब देश था. सात दशक बाद कोरिया अभी भी बंटा हुआ है, लेकिन दक्षिणी भाग एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में विकसित है, जहां प्रति व्यक्ति आय की तुलना किसी भी ‘विकसित देश’ की प्रति व्यक्ति आय के साथ की जा सकती है. दक्षिण कोरिया की सार्वजनिक स्वास्थ्य और कार्यप्रणाली अमेरिका जैसे देश जो 1950 के दशक से दक्षिण कोरिया के संरक्षक की भूमिका अदा करता रहा है, की तुलना में काफी बेहतर है. हालांकि, कोरियाई लोगों की बौद्धिक क्षमता का कोई मुकाबला नहीं है, लेकिन उनकी किस्मत का सितारा कभी भी उनके पक्ष में चमकता नहीं दिखाई दिया. इसके परिणामस्वरूप वे विदेशी ताकतों के प्रभाव के अधीन आ गए हैं. 
 
इसके विपरीत उत्तर कोरिया के लोगों को अभी भी एकल परिवार के वर्चस्व के दुर्भाग्य का कष्ट भोगना पड़ रहा है. दक्षिण कोरिया 1960 के दौर के बाद से धीरे-धीरे प्रगति के पथ पर अग्रसर हुआ. हालांकि, इसकी आर्थिक शक्ति केवल आधा दर्जन विशाल उद्यमों में केंद्रित रही है. इंटनरेट द्वारा लोगों को ज्ञान और अवसर के साथ सशक्त करने के ढंग को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि दक्षिण कोरिया को खुद को विशाल उद्यमों की पकड़ से मुक्त कराने की आवश्यकता है ताकि उसके प्रतिभाशाली उद्यमी वर्ग को उद्यम विकसित करने के लिए समानांतर आधार प्राप्त हो. एक प्रकार से यह स्थिति चीन अथवा भारत की स्थिति के समान है, जहां राज्य के स्वामित्व वाले उद्यम और घनिष्ठ पूंजीपति खुद को बढ़ावा देने के लिए राजनीतिक वर्ग पर अपने नियंत्रण का इस्तेमाल करते हैं और इसकी कीमत उन उद्यमियों को चुकानी पड़ती है जिन्हें ऐसा राजनीतिक संरक्षण प्राप्त नहीं है. 1990 में पूर्वी व पश्चिमी जर्मनी एकीकृत हो गए लेकिन ऐसा दोनों पक्षों के लोगों के परिश्रम के कारण नहीं बल्कि सोवियत संघ के पतन के कारण संभव हुआ. एक बार जब मिखाइल गोर्बाचोव ने स्पष्ट कर दिया कि पूर्वी जर्मनी को जारी रखने के लिए सैन्य शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, उसी क्षण से पूर्वी जर्मनी का विनाश निश्चित हो गया था. जोसेफ स्टालिन की मृत्यु के बाद से सोवियत संघ एक वैश्विक महाशक्ति का ऐसा विशिष्ट मामला है जिसका सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान उसके नियंत्रण के अधीनस्थ विशाल सैन्य संपत्ति का उपयोग करने के लिए बेहद कायर था. अफगानिस्तान ही वह देश था जहां अमेरिका ने पाकिस्तान और सऊदी अरब की मदद से सोवियत संघ की हार सुनिश्चित की, जिससे अनजाने में वहाबी कट्टरवाद का ऐसा पिशाच उत्पन्न हुआ जिसने आज आईएसआईएस का विषैला रूप धारण कर लिया है. बहरहाल, अगर मॉस्को के पास पाकिस्तान के खिलाफ अपनी परिसंपत्तियों को इस्तेमाल करने का सामरिक साहस होता तो पाकिस्तान मुजाहिद्दीन की मदद न कर पाता और सोवियत संघ को अमेरिका के सामने घुटने न टेकने पड़ते. पाकिस्तान को उसकी मनमर्जी अनुसार चलने देने से सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने दुनिया को यह दिखाया कि वह ऐसे हालात में भी अपनी सैन्य शक्ति का उपयोग करने से संकोच करती है जहां क्षमता का ऐसा उपयोग हार और जीत के अंतर में तब्दील हो सकता है. नाटो मुख्यालय और स्टालिन की मौत के बाद के सोवियत संघ कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में कई मायनों में समानता है क्योंकि विशाल सैन्य शक्ति का इस्तेमाल केवल दुर्बल प्रतिद्वंदियों के खिलाफ किया जाता है और तब भी कोई खास सफलता हाथ नहीं लगती. 
 
यह एक स्थापित तथ्य है कि उत्तरी और दक्षिणी कोरिया एक दिन एकीकृत हो जाएंगे. कोरियाई लोगों को अपनी संस्कृति पर युक्ति-संगत ढंग से गर्व है. क्या उत्तरी कोरिया का वर्तमान शासक एक विभाजित राष्ट्र के एकीकरण का आदेश देकर एक नया इतिहास बनाएगा, या उसके परिवार का शासन अराजकता में लुप्त हो जाएगा जिससे एकजुट होने का प्रयास कर रहे दोनों पक्षों के लाखों लोगों के लिए उचित अवसर उत्पन्न हो सकेगा? 8 अक्तूबर को वैश्विक शांति आर्थिक मंच द्वारा कोरिया के शांतिपूर्ण एकीकरण व आर्थिक विकास पर आयोजित सम्मेलन में इस तरह के मुद्दों पर चर्चा नहीं की गई. इस बैठक का उद्देश्य एक आर्थिक मानचित्र को तैयार करना था ताकि एकीकृत कोरिया में उत्तरी कोरिया की गरीबी नहीं बल्कि दक्षिणी कोरिया की समृद्धता की झलक दिखाई दे. आदर्श रूप से, प्योंगयांग में सुप्रीम नेता किम को दक्षिण के साथ एकीकृत होने का चयन करके अपने लोगों के लिए इतिहास बनाना चाहिए, लेकिन ऐसा होने के लिए सियोल को अधिक रचनात्मक कूटनीति की आवश्यकता पड़ेगी. दक्षिण द्वारा उत्तर में जितना अधिक व्यावसायिक निवेश और लोक-संपर्क होगा, दोनों का एकीकरण उतना ही करीब आता जाएगा. एक बात तो स्पष्ट है कि युद्ध कोई विकल्प नहीं है. इससे न केवल दोनों देशों का विनाश होगा बल्कि यह सद्भावना और शांतिपूर्ण परिणामों को पुरस्कृत करने वाले समाज के भीतर एक घाव उत्पन्न करेगा. हालांकि यह याद रखे जाने की जरूरत है कि अतीत में कोरिया को खुद उनपिवेश बनाया गया था, यह एक ऐसा राष्ट्र है जिसने खुद कभी भी अन्य लोगों को गुलाम नहीं बनाया. 
 
चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पार्क ने एक वर्ष पहले एकसाथ व्यापार और निवेश पर चर्चा की थी.दक्षिण कोरियाई प्रतिनिधिमंडल बड़ी संख्या में भारत की यात्रा कर रहे हैं. लेकिन नई दिल्ली को अभी भी विदेशी और स्वदेशी निवेशकों व उद्योगों के लिए भयावह सपना बनी नौकरशाही की कुटिल कार्यप्रणाली को भंग करने के लिए और अधिक कार्य करने की आवश्यकता है. यहां तक कि दक्षिण कोरिया और भारत के बीच अधिक हवाई उड़ानों की अनुमति देने का सरल मामला भी एक दशक से ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है. सौभाग्य से, सियोल में भारतीय दूतावास एक ‘व्यापार प्रेमी’ है और वह यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ा परिश्रम कर रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ लक्ष्य महत्वपूर्ण कोरियाई घटक अभिग्रहित करे. दक्षिण कोरिया एक ऐसा देश है जिसे वैश्विक नजरिए से और शुद्ध पूर्वी एशियाई दृष्टिकोण से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)