संगीत दिल और आत्मा को जोड़ने वाली एक सुरीली कड़ी है. केवल भारत ही ऐसा देश है जहां संगीत और संगीतकारों को लेकर समाज में विभिन्न व विभाजनकारी मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं. हाल ही में मशहूर गजल उस्ताद गुलाम अली को मुंबई में प्रदर्शन करने से रोकने के लिए शिवसेना प्रायोजित प्रतिबंध ने उदारपंथियों और राष्ट्रवादियों के बीच सीधे टकराव को मंच पर ला खड़ा किया है. विडंबना यह है कि गुलाम अली जैसा पाकिस्तानी नागरिक भारत में सांस्कृतिक स्वतंत्रता की लड़ाई का प्रतीक तो ऐसे बन गया है मानो उसका अपना देश जैसे सहनशीलता और बहुलवाद का स्वर्ग हो. धर्मनिरपेक्षता के कुछ रक्षकों ने संगीतमय नुस्खे को हिंदू-मुस्लिम के बीच दरार के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया है. मुस्लिम लीग अथवा ओवैसी के कोलहलमय संगठन की तरह, शिवसेना को भी उसकी सांप्रदायिक विभाजनकारी धुन गाने का पूरा अधिकार है. लेकिन इनमें से किसी को भी अपने सांस्कृतिक अथवा अन्य विकल्पों को पूरे राज्य या देश पर थोपने का अधिकार तो हरगिज नहीं है. चाहे क्रिकेट खिलाड़ी हों अथवा मुंबई में कला का प्रदर्शन करने वाले कलाकार, शिवसेना शुरू से ही किसी भी पाकिस्तानी के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाती रही है. इस बार शिवसेना ने राष्ट्रवादी आदर्शवाद की सुविधाजनक रचना पर अपना विद्रोही राग गाया है.
 
शिवसेना के मुखपत्र सामना ने अपने संपादकीय लेख में अनुमान लगाया कि हमने जो कुछ भी किया, उस से कुछ लोगों को समस्या हो सकती है लेकिन हमें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है. हमने देश के प्रति अपना फर्ज निभाया है. हमारे कृत्य हमारे उन सभी शहीदों को श्रद्धांजलि हैं जो पाकिस्तान के कायरतापूर्ण हाथों मारे गए. केवल युद्ध स्मारक बनाना ही पर्याप्त नहीं है, आपको एक कड़ा जवाब देना चाहिए और हमने भी यही किया है. उम्मीद के मुताबिक, खुद को कट्टर राष्ट्रवादी करार देने वाले अन्य लोग भी पाकिस्तान के सांस्कृतिक आक्रमण पर शिवसेना के आक्रामक समूह में शामिल हो गए. लोकप्रिय बॉलीवुड गायक अभिजीत भट्टाचार्य ने गुलाम अली के प्रदर्शन के प्रतिबंध के समर्थन में सबसे पहले ट्वीट करते हुए कहा, ‘इन बेशर्म लोगों (पाकिस्तान) के पास कोई आत्म-सम्मान नहीं है और इनके पास आतंकवाद फैलाने के अलावा और कोई काम नहीं है. तथाकथित राजनीतिक दल केवल चिल्लाते हैं लेकिन आतंकवादी देश से आए इन डेंगू कलाकारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करते. यह कव्वाल भारत में अपनी योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि पाकिस्तानी दलालों के माध्यम से आए हैं.’ जैसा कि उम्मीद थी, अभिजीत के इस ट्वीट को लेकर शबाना आजमी, महेश भट्ट और वेंडल रोड्रिक्स के धर्मनिरपेक्षवादी गुट ने उसकी कटु शब्दों में आलोचना की. चूंकि यह एक हिंदुत्व राजनीतिक दल था जिसने गुलाम अली का विरोध किया. ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने स्वाभाविक रूप से इसका राजनीतिक लाभ उठाते हुए गजल गायक को कोलकता व दिल्ली में आकर प्रदर्शन करने का न्यौता दिया. यहां तक कि प्रतिबद्ध हिंदुत्व संगठनों ने भी शिवसेना के गुलाम अली के प्रदर्शन पर प्रतिबंध को अनुचित करार दिया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी शिवसेना की कार्रवाई पर नाराजगी प्रकट की है. लेकिन यह सभी समाधानकारी विकृतियां भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस को गुलाम अली के प्रदर्शन पर लगाए गए प्रतिबंध को उठाने के लिए विवश नहीं कर सकी. 
 
जब से वर्ष 2014 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ है, गौण तत्वों के कृत्यों व दृढ़ कथनों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर संभाषण को परिभाषित व निर्धारित किया है. इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि हिंदुत्व के कुछ स्वयंभू पथप्रदर्शकों द्वारा दिए गए बिना सोचे विचारे बयानों पर प्रशासन की निष्क्रियता के कारण वे और निर्भीक ढंग से अपने विचारों की अभिव्यक्त करने लगे हैं. दूसरी ओर, भारतीय संस्कृति, मनोरंजन और पाकिस्तान में अल्पसंख्यक नागरिकों पर हमले को सुशिक्षित व विद्वान वर्ग द्वारा जानबूझ कर अनदेखा किया जा रहा है. हैरत की बात है कि जो गुलाम अली का बचाव कर रहे हैं, उनमें से कोई भी पाकिस्तान में भारतीय कलाकारों की फिल्मों के प्रदर्शन पर लगी रोक के बारे में न कुछ कहने को और न ही कुछ करने को तैयार है. कश्मीरी अलगाववादियों और आतंकवादियों को पाकिस्तानी समर्थन से खिन्न लोगों का सोचना है कि पाकिस्तानी गायकों, अभिनेताओं और अन्य मनोरंजकों को भारत में आकर पैसा और शोहरत कमाने का मौका आखिर दिया ही क्यों जाए. त्योहारों का मौसम चल पड़ा है और भारत में मानों पाकिस्तानी प्रदर्शनकारियों की बाढ़ सी आ गई है जो विभिन्न शहरों में डेरा डाले हुए हैं. इन्हें अमीर व शक्तिशाली वर्ग द्वारा निजी समारोहों में प्रदर्शन करने के लिए आमंत्रित किया जाता है. राजस्व अधिकारियों के अनुमान के अनुसार पाकिस्तानी गायक और कलाकार प्रत्येक वर्ष भारत से 77 लाख डॉलर की कमाई कर के जाते हैं. कुछ वर्ष पहले, विख्यात पाकिस्तानी गायक राहत फतेह अली खां को दो सदस्यों के साथ नई दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट पर अघोषित 1.25 लाख डॉलर की विदेशी मुद्रा के साथ हिरासत में ले लिया गया था.
 
भारतीय बाजार से व्यावसायिक लाभ अर्जित कमाने वाले इन कलाप्रवीण व्यक्तियों में से कोई भी पाक-प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ अथवा भारतीय कलाकारों व पत्रकारों के लिए उदार वीजा प्रणाली के पक्ष में एक भी शब्द नहीं बोलता, लेकिन यह कलाकार पाकिस्तान की यात्रा पर जाने वाले भारतीय उच्चवर्गीय व्यक्तियों के लिए शानदार पार्टियों की मेजबानी करते हैं, जो बदले में स्वदेश वापसी पर इन विदेशी कलाकारों की तरफदारी करते हैं. क्या लता मंगेशकर, अनुपम खेर या फिर खान तिकड़ी में से कोई भी पाकिस्तान में खचाखच भरे दर्शकों के सामने प्रदर्शन कर सकता है? जी नहीं, इसकी कल्पना भी मत कीजिए. पाकिस्तान ने गत 10 वर्ष के दौरान एक दर्जन से अधिक भारतीय फिल्मों पर अल्पावधिक व दीर्घावधिक प्रतिबंध लगाया है. इन फिल्मों में एक था टाईगर, जब तक है जान, चेन्नई एक्सप्रेस, एजेंट विनोद, डर्टी पिक्चर और भाग मिलखा भाग जैसी सफल फिल्में शामिल हैं जिनमें इमरान हाशमी, फरहान अख्तर, शाहरुख खान, सलमान खान और सैफ अली खान जैसे लोकप्रिय भारतीय मुस्लिम सितारे प्रमुख भूमिका में थे. इन सभी कलाकरों ने भारत को गौरवान्वित किया है लेकिन पाकिस्तान ने इन कलाकारों की फिल्मों को उसकी सांस्कृतिक पहचान के लिए खतरे के रूप में देखा. कुख्यात आतंकवादी हफीज सईद के नेतृत्व वाले आतंकी संगठन जमात-उद-दावा द्वारा पाकिस्तान में सैफ अली खान की ‘फैंटम’ के प्रदर्शन पर याचिका दायर करने के बाद पाकिस्तान की निचली अदालत ने फैंटम को प्रतिबंधित कर दिया. गौरतलब है कि हाफिज सईद 26/11 के मुंबई हमलों में प्रमुख संदिग्ध है. लेकिन भारत ने शायद ही कभी पाकिस्तान से आए उत्साहपूर्ण मनोरंजन को खारिज किया है. पाक निर्मित बड़ी संख्या में टीवी धारावाहिकों का नियमित रूप से भारत में प्रसारण किया जाता है और भारतीय दर्शक इन धारावाहिकों को बड़े चाव के साथ देखते हैं. समय आ गया है कि उन्हें इस बात का अहसास हो कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अली और उनके जैसे कलाकारों को संगीत और मनोरंजन के माध्यम से आतंक के खिलाफ युद्ध को कमजोर करने और उस पर से ध्यान हटाने की अनुमति हरगिज नहीं देगा. 
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)