इन दिनों अक्सर ये लगने लगा है कि विचार का भी विवेक होना जरुरी है. अगर वो विवेक आधारित विचार नहीं है तो फिर महज मानसिक स्खलन या फिर नज़र का अपाहिजपन ही होगा. आप गुजरे समय के सारे अनाचार, कदाचार, अत्याचार, व्यभिचार, पापाचार (अगर आपको ऐसा लगता है तो) का हिसाब कर उसे बराबर करना चाहते हैं तो फिर ये बदलाव नहीं बदले की व्यवस्था होगी. फिर तो देश के साथ ये धोखा है जिसने बदलाव के लिये अपने अधिकार का इस्तेमाल किया, अच्छे दिनों की उम्मीद लगाई.

जिस तरीके से साहित्यकारों ने अकादमी पुरस्कार लौटाने शुरु किए हैं, कुछ मित्रों को लगता है कि ये नाटक-नौटंकी है या फिर एक खास विचारधारा का पोषण है. अब ऐसा लगता है तो उनकी नजर में कुछ गलतियां गुजरे वक्त में हुई होंगी- साहित्यकारों से या फिर सरकारों से. यह भी हो सकता है कि साहित्यकारों ने अपने निजी जीवन में दारु पी हो और दुनिया भर को मिनटों में नापा-तौला हो. यह भी हो सकता है कि कुछ ने सत्ता के साथ सांठगांठ कर कुछ इनाम-पुरस्कार हथिया लिए हों लेकिन क्या इससे उनके उस विचार को खत्म माना जाए जो इंसानियत, आदमियत, मेहनतकश और तरक्कीपसंद लोकतंत्र के हक में उन्होंने रखे. क्या गबन, मैला आंचल, नौकर की कमीज, आधा गांव से लेकर तिरिछ तक के लेखकों को खारिज कर दें? प्रेमचंद और निराला जैसे साहित्यकारों ने तो कांग्रेस के अधिवेशनों में हिस्सा तक लिया, तो उन्हें मतलबी कह दें?

निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, शमशेर, केदारनाथ सिंह जैसे नामवर कवियों ने किस पूंजीपति और दल की पैरोकारी की? वैसे साहित्यकार जिन्होंने अभी अकादमी सम्मान लौटाया है, मसलन- मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, उदय प्रकाश या फिर कृष्णा सोबती- इन लोगों के निजी जीवन को कितने लोग जानते हैं? कितनी चुनौतियों और इम्तिहानों से जीवन गुजरता है- कितनों को पता है? इसी तरह से अलग अलग भाषाओं में लिखनेवाले कलमजीवी लोगों को सिरे से खारिज करना जहरीली मानसिकता का संकेत देता है.

बस इसलिए कि वे फलां दंगे पर नहीं बोले और फलां पर बोले या फिर फलां की हत्या पर नहीं खड़ा हुए, फलां पर हुए- आप उनके पूरे जीवन को नाप बैठते हैं. जब जी में आए उबकाई कर देते हैं. ये स्थिति आपके पाले में खड़े लेखकों की ही नहीं है, यह तो ग़ालिब, दाग़ से लेकर अली सरदार जाफरी, कैफी आज़मी और राही मासूम रज़ा तक को भी झेलना पड़ा. लकीर के इस तरफ हो या उस तरफ, आम आदमी के हक में खड़ा होने वाला लेखक दग़ाबाज या काफिर हो ही जाता है.

अगर मैं मान भी लूं कि इक्का दुक्का लोग अपनी दुकान चला रहे होंगे और वो सरकारी संस्थानों की सरपरस्ती में कुछ लोगों के सीने पर तमगा टांक रहे होंगे तो क्या उन चंद लोगों के आधार पर इतनी बड़ी जमात को खारिज किया जा सकता है? समस्या उन लोगों की बस इतनी है कि दिन भर घर-बार की जरुरतों से उलझते रहने के बाद वे साहित्य के लिए मरते-खपते हैं. देश-समाज के भीतर घुसकर उसकी गिरह-गांठ पकड़ते रहते हैं और अपनी रचनाओं के जरिए समय को बांध कर रख देते हैं. इसके बाद उनके पास समय ही नहीं बचता कि वो मोर्चा बनाएं, सड़क पर उतरें, लोगों को लामबंद करें, व्यवस्था की खोट खुल्लम-खुल्ला दिखाएं और फिर जनता तो बदलाव के लिए आवाज लगाएं.

बस इतना ही जानिए कि ये लोग तमाम थपेड़ों के बावजूद फौलादी हौसला रखते हैं- समय काटता रहता है और ये समय को पकड़ते रहते हैं. अंग्रेजी के लेखकों जैसी स्थिति भी नहीं है हिंदी या फिर दूसरी भारतीय भाषाओं में लिखने वाले साहित्यकारों की कि एक रचना हिट नहीं हुई कि दिन बदल गए. दिन नहीं बदलने की गारंटी गांठ में बांधकर समय के सीने पर चढ़े रहने वाले ये वो लोग हैं जो सत्ता-व्यवस्था को बार-बार ललकारते रहते हैं.

जब ये अपने पुरस्कार विरोध के तौर पर लौटाएं तो हमको एक कौम के पैरोकार लगते हैं लेकिन यही लोग कालजयी रचनाओं को रचते रचते दाने-दाने को मोहताज हो जाएं तो कोई पूछने तक नहीं जाता. रचनाकार जिंदा रहता है तो समाज जिंदा रहता है और समाज जिंदा रहेगा तो मुल्क जिंदा रहेगा. विरोधी विचार का विरोध, विरोध के दायरे में ही हो तो वह विरोध कहलाता है वर्ना अराजक और आतंकी माहौल तो पैदा किया ही जाता है. असहमतियों का समाज ही जिंदा और विकासमान समाज है. विवेक ही विरोध या असहमति का सांचा तय करता है.

(यह लेखक के निजी विचार हैं)