उत्तरप्रदेश के दादरी में अनियंत्रित भीड़ द्वारा मोहम्मद अखलाक की बर्बर हत्या ने हमारे विविधतापूर्ण और कुछ हद तक आक्रामक राष्ट्र को एकजुट कर दिया है. इस नृशंस व निंदनीय कृत्य ने मानों हर देशवासी की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है और उसका सिर शर्म से झुका दिया है. भारतीय वायुसेना में जूनियर अधिकारी के पद पर कार्यरत मोहम्मद अखलाक का बड़ा बेटा और छोटा बेटा दानिश निश्चित रूप से इस खौफनाक मंजर के मानसिक आघातों को शायद ही कभी अपने जेहन से निकाल पाएंगे. गौरतलब है कि मोहम्मद अखलाक का छोटा बेटा दानिश अभी भी अस्पताल में जानलेवा चोटों और अकथित क्रूरता की पीड़ा से उबरने का प्रयास कर रहा है. उत्तरप्रदेश के बिसाहड़ा गांव में और पूरे देश में आने वाली कई पीढ़ियों तक इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की यादें सदा ताजा रहेंगी.
 
भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश के नागरिकों से सहनशीलता का अनुपालन करने और ‘हमारे बुनियाद मूल्यों’को नष्ट होने से रोकने के प्रयास करने का आह्वान किया है. इस घटना ने दिखा दिया कि हमारे देश के कई नागरिकों में समाज के बुनियादी मूल्य हैं ही नहीं. वे इन मूल्यों को बहुत पहले ही त्याग चुके हैं. इस देश के कई युवा सहनशीलता के बुनियादी सिद्धांत में विश्वास नहीं करते, वे केवल इस धारणा में विश्वास करते हैं कि गोमांस का सेवन करने वाले एक बलात्कारी जैसा जघन्य अपराध कर रहे हैं और इसके लिए उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए. ऐसे उग्र विचारों और इस देश के युवाओं में इनके प्रचार के लिए कौन जिम्मेदार है? हमें खुद से यह सवाल पूछने की जरूरत है कि क्या यह राजनीतिक दल हैं जो प्रतिशोध और नफरत के माहौल को बढ़ावा दे रहे हैं या यह साध्वी प्राची जैसे स्वयंभू संत हैं जो हमें उनके वैश्विक नजरिए को स्वीकारने के लिए बाध्य कर रहे हैं?
 
इस देश के युवाओं को प्रतिगामी और अत्यधिक निंदनीय बयानों को सिरे से खारिज कर देना चाहिए और स्वार्थी राजनीतिज्ञों व संतों को यह संदेश देने का प्रयास करना चाहिए कि इस देश के युवा देश उनके असंगत बयानों में नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और सौहार्दपूर्ण माहौल में विश्वास करते हैं. असादुद्दीन ओवैसी और उसका छोटा भाई दोनों ही प्रतिशोध और नफरत की भावनाओं से भरे भाषण देकर इस देश की आबो-हवा में जहर घोलने का प्रयास कर रहे हैं. 1993 के मुंबई बम विस्फोटों के मुख्य दोषी याकूब मेनन के प्राणदंड को स्थगित करने व उसकी सजा को कम करने का प्रयास कर रहे लोगों के अभियान को असादुद्दीन ओवैसी ने यह बयान देकर काफी नुकसान पहुंचाया कि चूंकि याकूब मेनन एक मुसलमान है, इसलिए उसे विशेष रूप से निशाना बनाते हुए फांसी की सजा दी गई है. ऐसे भड़काऊ बयान समुदायों में असमानता पर प्रकाश डालने और युवाओं में खौफ उत्पन्न करने के लिए दिए जाते हैं कि क्योंकि वह एक विशेष समुदाय से संबंधित हैं, बहुसंख्यकों द्वारा उन्हें निशाना बनाया जाना तय है.
 
ऐसे बयान समाज में फूट डालने का कार्य करते हैं और शांतिपूर्ण माहौल को प्रतिशोध और नफरत की भावनाओं से भर देते हैं. आने वाले कई दशकों तक हम पर इसका प्रभाव रहेगा. महाराष्ट्र में शिवसेना ने मशहूर गजल गायक गुलाम अली के कार्यक्रम को रद कराकर माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है. इससे केवल इस धारणा को और अधिक बल मिलेगा कि मुस्लिमों को इस देश में विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है.
 
यहां पर यह सवाल खड़ा किए जाने की आवश्यकता है कि इस देश में हर बात को हिंदू-मुस्लिम से क्यों जोड़ा जाना चाहिए? आखिर कब तक हम यह सोचकर खुद को मूर्ख बनाते रहेंगे कि मुसलमान जानबूझ कर गोहत्या करते हैं और हिंदू गोमांस और अन्य किसी गोश्त का सेवन नहीं करते? हम कब तक ऐसे पूर्वाग्रहों और रुढ़िवादियों से प्रभावित होते रहना जारी रखेंगे? यह अब केवल सरकारी मुद्दा बनकर ही नहीं रह गया है, असल समस्या हमारे समाज के साथ ही है. हम क्यों सरकार से उम्मीद करते हैं कि वो समय-समय पर हमें सुधारेगी और हमारा मार्गदर्शन करती रहेगी? 
 
हम अपनी जीवनशैली और दूसरों की जीवनशैली को लेकर इतने चयनशील क्यों हैं? हमें औरों के जीवन में हस्तक्षेप करने का क्या अधिकार है? हमारे समाज का ऐसा एकपक्षीय और अभिमानी नजरिया खतरनाक है और हम अभी से अपने कार्यों का खामियाजा भुगत रहे हैं. उत्तेजक भाषण देने के लिए भाजपा सांसद संगीत सोम की गिरफ्तारी से कुछ हासिल नहीं होगा क्योंकि उनके जैसे कई और भी हैं. संगीत सोम के भाषण केवल इसलिए खतरनाक हैं क्योंकि वे युवाओं के मन को प्रभावित करते हैं और उन्हें एक विशेष दिशा की ओर मोड़ना चाहते हैं. मोहम्मद अखलाक की कथित हत्या के आरोप में गिरफ्तार किए गए सभी आरोपी युवा हैं जिनमें एक किशोर भी शामिल है. घटना के एक सप्ताह बाद भी माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है और यह स्पष्ट है कि 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों से हमने अभी तक कोई सबक नहीं सीखा है. संगीत सोम ने कथित तौर पर दादरी घटना को ‘एक आम हत्या और सांप्रदायिक हत्या से अलग’ बताया है. ऐसे गैर-जिम्मेदराना बयान देकर संगीथ सोम मृतक का अपमान कर रहे हैं.
 
हम किस प्रकार के समाज में रहते हैं जहां नियमित रूप से लोगों की हत्या की जाती है? क्या एक दूसरे की जान लेना और एक दूसरे से नफरत करना हमारे अस्तित्व के लिए इतना आवश्यक बन गया है? विभिन्न टीवी चैनलों पर ऐसी घटनाओं की आलोचना करने के लिए निरंतर रूप से होने वाले वाद-विवादों से क्या लाभ जब ऐसी घटनाओं में हर वर्ष वृद्धि हो रही है? 
 
दादरी घटना एक पृथक घटना नहीं है और इसे अलग समझना हमारी बड़ी भूल होगी. यह घटना हमारे समाज और राष्ट्र को कमजोर कर सकती हैं. यह एक ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण त्रासदी है जो हमें एकजुट रहने की आवश्यकता का स्मरण दिलाएगी, अन्यथा हमें डर है कि कहीं हमारी युवा पीढ़ी प्रतिशोध और नफरत की आग में न जल जाए. 
 
(ये लेखिका के निजी विचार हैं)