सनसनीखेज आरुषि-हेमराज दोहरे हत्याकांड पर आधारित हाल ही में रिलीज हिंदी फिल्म‘तलवार’से एक मजबूत संदेश उत्पन्न होता है कि एक विकासशील आपराधिक कहानी की रिपोर्टिंग करते हुए मीडिया को और अधिक जिम्मेदाराना भूमिका निभानी चाहिए और किसी को भी कानूनी सुनवाई के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्र में चलने वाली अनाधिकृत सुनवाई के कारण कष्ट नहीं भुगतना चाहिए. शायद यह भी मात्र एक संयोग नहीं है कि‘तलवार’को ऐसे समय पर रिलीज किया गया है जब इस दोहरे हत्याकांड प्रकरण पर आधारित पुस्तक भी शीघ्र ही विमोचित होने वाली है. ‘तलवार’फिल्म की तरह यह पुस्तक भी राजेश और नुपुर तलवार की दोषसिद्धि के साथ मामले के निष्कर्ष पर उचित सवाल खड़े करने का इरादा रखती है, जिसमें आज से 7 वर्ष पूर्व नोएडा में हुई खौफनाक हत्याओं के बाद भी लोगों की दिलचस्पी बनी हुई है.
 
राजेश और नुपुर तलवार अपनी पुत्री और घरेलू नौकर की हत्या के लिए जेल में सजा भुगत रहे हैं. आरोपी के निवारण के लिए उपलब्ध अगले तार्किक कानूनी कदम के रूप में सत्र न्यायालय का फैसला इलाहाबाद उच्च न्यायालय की समीक्षा की प्रतीक्षा कर रहा है. हालांकि, फिल्म के निर्माण के मकसद से संबंधित कटाक्षों को इसी विषय पर फिल्म बनाने वाले एक और फिल्मकार द्वारा सामने लाया गया है, तब भी न्यायपालिका से अदालत परिसर के बाहर हो रहे घटनाक्रमों से प्रभावित न होने की उम्मीद की जाती है. 
 
आरुषि-हेमराज के साथ कई आच्छादित (अप्रकट) दृष्टिकोण जुड़े हैं. इसमें कोई शक नहीं कि मीडिया ने या तो अपनी अज्ञानता के कारण, या फिर अपनी टीआरपी रेटिंग बढ़ाने के जोश में कई पहलुओं की रिपोर्टिंग करते हुए अपेक्षित पेशेवराना अंदाज का प्रदर्शन नहीं किया. उदाहरण के लिए, जब सीबीआई के नार्को विश्लेषण परीक्षण के लिए तीन घरेलू नौकरों को बेंगलुरू ले जाया गया, तब किसी भी पत्रकार ने यह प्रासंगिक सवाल पूछने की जरूरत नहीं समझी कि क्या प्रमुख जांच एजेंसी ने मजिस्ट्रेट से संदिग्धों का पारगमन रिमांड लिया है और क्या संदिग्धों को बेंगलुरू में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था अथवा नहीं और क्या नार्को विश्लेषण परीक्षण करने से पहले संदिग्धों की अनुमति ली गई थी अथवा नहीं? 
 
प्रेस आरुषि मामले की हाल ही के शीना बोरा मामले के साथ तुलना करने में अधिक दिलचस्पी ले रहा है. सच्चाई यह है कि दोनों मामलों में एक मौलिक विषमता को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. आरुषि मामले में स्पष्ट रूप से हत्या क्षणिक आवेश में आकर की गई थी जबकि शीना बोरा मामले में हत्या एक पूर्व-नियोजित षडयंत्र के तहत की गई थी. आरुषि और हेमराज के शवों को पाए जाने के बाद नुपुर तलवार ने कानून के शक की सुई स्वयं पर से हटाने के लिए विभिन्न टेलीविजन चैनलों को कई साक्षात्कार दिए, लेकिन सीबीआई ने अंतत: उन्हें और उनके पति को दोषी पाया. शीना बोरा मामले में, पीटर मुखर्जी ने पुलिस द्वारा उससे पूछताछ करने से पहले कई टीवी चैनलों को इंटरव्यू दिए थे और फिलहाल पीटर को अपराध के साथ संबद्ध करने वाला कोई सबूत नहीं मिला है.
 
शीना बोरा मामला भी समय बीतने के साथ आकस्मिक मोड़ ले रहा है. जिन परिस्थितियों में मुख्य आरोपी इंद्राणी मुखर्जी को शुक्रवार को गंभीर हालत में बायकुला जेल से मुंबई के जेजे अस्पताल में स्थानांतरित किया गया, उसने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. अभी भी यह पता नहीं लग सका है कि इंद्राणी मुखर्जी जेल में रहते हुए उन दवाओं को किस प्रकार प्राप्त कर पार्इं जिनका सेवन उन्होंने किया. क्या ऐसा भी हो सकता है कि कोई उनकी हत्या की साजिश रच रहा हो और इसलिए उस व्यक्ति ने न्यायिक हिरासत में इंद्राणी मुखर्जी को दवाएं दिलार्इं? महाराष्ट्र सरकार को कई सवालों के जवाब देने हैं और बेहतर होगा कि मीडिया निष्पक्षता के साथ और बिना किसी पूर्वाग्रह के धीरे-धीरे विकसित होते इस मामले को दक्षता के साथ कवर करे.
 
आरुषि-हेमराज मामले की तरह किसी दिन शीना बोरा हत्यकांड मामले पर भी फिल्म बनाई जाएगी, जो शायद आरुषि-हेमराज हत्यकांड मामले से भी अधिक पेचीदा है. ऐसे मामलों पर आधारित फिल्मों के निर्माण के साथ कोई समस्या नहीं है, लेकिन जब एक फिल्म में पात्र अथवा पात्रों को जांच के दौरान उनकी भूमिका से भिन्न रूप से चित्रित करने के लिए तथ्यों को विकृत करने का प्रयास किया जाता है, तब ऐसा प्रतीत होता है कि इस फिल्म के माध्यम से किसी को बचाने का दुराग्रही प्रयास किया जा रहा है.
 
1960 के दशक में ‘ये रास्ते हैं प्यार के’नामक बॉलीवुड फिल्म रूपहले पर्दे पर असल जीवन में सनसनीखेज हत्या को दोहराए जाने के शुरुआती उदाहरणों में से एक है. यह फिल्म ‘नानावती मामले’पर आधारित थी, जिसमें नौसेना के एक कमांडर ने 1959 में अपनी पत्नी के प्रेमी प्रेम आहूजा को मामूली झगड़े के बाद मार डाला था. यह मामला भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का हिस्सा है, क्योंकि यह संभवत: भारत में होने वाला आखिरी ऐसा मुकदमा था, जिसमें प्रासंगिक कानूनी बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया था, जिन्हें आज तक आपराधिक कानून के छात्रों को पढ़ाया जाता है. यह मामला उस समय कई महीनों तक सुर्खियों में छाया रहा और चूंकि उस समय इलेक्ट्रानिक मीडिया नहीं थी, समाचार पत्रों की तो जैसे रोज दिवाली होती थी, क्योंकि 25 पैसे में बिकने वाला अखबार 2 रुपए का बिकता था.
 
कई हॉलीवुड फिल्मों में भी वास्तविक अपराधों को चित्रित किया गया है.‘बोनी और क्लॉयड’ इसी नाम की कुख्यात जोड़ी की सच्ची कहानी पर आधारित फिल्म थी. अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की हत्या ने कई फिल्म निर्माताओं को इस सनसनीखेज हत्या के विभिन्न संस्करणों को प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया. हालांकि, टेक्सास के डलास में जॉन एफ कैनेडी की हत्या का रहस्य आज भी लोगों में कौतूहल उत्पन्न करता है. इसलिए दर्शकों को बुद्धिमत्तापूर्ण संशयवाद के साथ‘तलवार’देखनी चाहिए, क्योंकि जरूरी नहीं है कि यह फिल्म आरुषि-हेमराज मामले का सबसे तथ्यात्मक वर्णन हो.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)