‘माय नेम इज खान एंड आई एम नॉट ए टेररिस्ट.’ कुछ वर्ष पहले बॉलीवुड सितारे शाहरुख खान की एक विवादास्पद फिल्म का यह विवादास्पद डायलॉग बहुत तेजी से एक विशिष्ट समुदाय में फैल गया था. यह डायलॉग दुनिया भर के लोगों को यह संदेश दे रहा था कि अधिकांश मुस्लिम हिंसा के पक्ष में बिलकुल भी नहीं हैं. आज 2015 में अल्पसंख्यक दर्शकों को एक ऐसे नेता ने मंत्रमुग्ध कर दिया है जिसका नाम है ओवैसी और जो गलतियों का जीता-जागता प्रमाण प्रतीत होता है. देशव्यावी स्वीकार्यता की अपनी खोज में, लंदन से वकालत की डिग्री लेने वाले इस 46 वर्षीय बैरिस्टर ने एक गलत फैसला ले लिया है. अतीत में कई अन्य मुस्लिम नेताओं की तरह ओवैसी भी इस धारणा को वास्तविक रूप देने का प्रयास कर रहे हैं कि उनके समुदाय की चिंताओं को सांप्रदायिक बढ़ावा देकर वह खुद के लिए एक विशिष्ट राजनीतिक स्थान सुरक्षित कर लेंगे. पिछले कुछ सप्ताह में वह खुद को मुसलमानों और उनके हितों का मसीहा साबित करने के किसी भी अवसर से नहीं चूके हैं, मानो राजनीति में सफल होने के लिए और बने रहने के लिए उनके पास और कोई रास्ता ही नहीं है.
 
इस संदर्भ में, ओवैसी और मुसलमानों के लिए पृथक राष्ट्र के लिए लड़ने वाले मोहम्मद अली जिन्ना में काफी समानताएं हैं. जिन्ना ने भी लंदन से वकालत की पढ़ाई की थी और हिंदुस्तान में मुसलमानों को उचित न्याय न मिलने का हवाला देते हुए मुसलमानों के लिए पृथक राष्ट्र की मांग की थी. अधिकांश भारतीय मुसलमान जिन्ना से सहमत नहीं थे और उनके इस विचार को खारिज कर दिया, लेकिन अपनी पैतृक राजनीतिक जागीर को हैदराबाद व इसके आसपास सीमित रखने वाले ओवैसी अब बिहार के चुनावी मैदान में उतर पड़े हैं. उनका यह कदम दर्शाता है कि वह खुद पर एक अखिल भारतीय मुस्लिम नेता का लेबल चिपकाना चाहते हैं. ओवैसी ने मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में 40 से अधिक उम्मीदवार खड़े किए हैं. ओवैसी और उनके भाइयों को अल्पसंख्यक समुदाय के दरिद्र वर्ग की स्थितियों में सुधार लाने के लिए कम और बहुसंख्यक समुदाय के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के लिए ज्यादा जाना जाता है. यह मेरी समझ से बाहर है कि 20 फीसदी से भी कम सीटों पर चुनाव लड़ने वाला नेता एक जाति-ग्रस्त राज्य में किस प्रकार बदलाव ला सकता है? चूंकि ओवैसी की ‘ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन’ ने महाराष्ट्र में विधानसभा और नगर निगम चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया था. उन्होंने अपने रणक्षेत्र का देश के अन्य हिस्सों में भी विस्तार किया है. ओवैसी हर उस स्थान पर दिखाई पड़ते हैं जहां कोई सांप्रदायिक घटना अथवा दुर्घटना होती है. गत सप्ताह वह उत्तर प्रदेश के दादरी में पहुंच गए, जहां एक मुसलमान को केवल उसके घर में गोमांस रखने के संदेह के कारण क्रोधित लोगों की भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया था.
 
ओवैसी को उनकी शैली की राजनीति करने का पूरा अधिकार है. वह भारत के चुनिंदा मुस्लिम नेताओं में से हैं जो दुनिया के कई देशों में यात्रा कर चुके हैं और अच्छी तरह से शिक्षित भी हैं, लेकिन सवाल यह है कि उनके जैसे विद्वान नेता को सांप्रदायिक राजनीति में लिप्त होने की क्या आवश्यकता है? भारत का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि कट्टरपंथी तत्वों को समर्थन देने वाला नेता कभी भी राष्ट्रीय नेता नहीं बन सका. ओवैसी और उनकी शैली के अन्य नेता खुद को समावेशी भारत के नेता के रूप में नहीं देखते. अधिकांश मुस्लिम नेता अल्पसंख्यकों की भावनाओं को उकसाने में लगे हैं लेकिन उन्हें अहसास नहीं है कि ऐसा करने से वह इस देश की शासन व्यवस्था को प्रभावित नहीं कर सकते. आश्चर्य की बात है कि स्वतंत्र भारत के 68 वर्ष बाद भी देश में एक भी ऐसा मुस्लिम नेता नहीं है जिसकी उसके अपने ही समुदाय में अखिल भारतीय स्वीकार्यता हो. इंडोनेशिया के बाद मुसलमानों की संख्या भारत में सबसे अधिक है. यह भी सच है कि अल्पसंख्यकों तक आर्थिक विकास के लाभ पूरी तरह नहीं पहुंच पाए हैं. सभी राजनीतिक दलों ने कुछ मुस्लिम नेताओं को विधिपूर्वक अपनी सरकार अथवा पार्टी में प्रतीकात्मक पद देकर उन्हें खुश किया है. बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से हिंदू व मुस्लिम समुदायों में कुछ उन्मादी तत्व हिंसा पर उतर आए हैं. दोस्ती और भाईचारे को बढ़ावा देने के बजाय प्रतिशोध और प्रतिद्वंदिता की बातें की जा रही हैं. ओवैसी और उनके जैसे लोग यह भूल रहे हैं कि कट्टरपंथी बयानबाजी का अभ्यास करने वाला कोई भी नेता केवल चुनिंदा कट्टरपंथियों का ही प्रिय बन सकता है, लेकिन अधिकांश शांतिप्रिय लोग ऐसे नेताओं से सख्त नफरत करने लगते हैं. 
 
ओवैसी को एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो उन मतदाताओं को विभाजित करता है जिनसे ‘हिंदुत्व ताकतों’ से लड़ने की उम्मीद की जाती है. लेकिन यह कोई संयोग नहीं था कि बेंगलुरू के नगर निकाय चुनाव में उनकी पार्टी के सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. यहां तक कि अधिकांश हिंदू और धर्मनिरपेक्षवादी तत्वों द्वारा भी सनातन संस्था जैसे संगठनों को अस्वीकार किया जा रहा है. ओवैसी को यह सोचना चाहिए कि जब भी गूगल पर भारत के शीर्ष मुस्लिम नेताओं को सर्च किया जाता है तो केवल फिल्मी सितारों के नाम ही क्यों स्क्रीन पर दिखाई पड़ते हैं? क्या यह अफसोस की बात नहीं है कि ऐसे देश में एक भी प्रमुख राजनीतिक कार्यकर्ता को अल्पसंख्यक समुदाय के तर्कसंगत चेहरे के रूप में नहीं समझा जाता जहां मुस्लिम जनसंख्या कुल आबादी का 16 फीसदी है. भारतीय मतदाताओं ने हमेशा से चरमपंथी तत्वों को अस्वीकार किया है. मुस्लिम लीग को केवल केरल के कुछ जिलों तक सीमित कर दिया गया है. शिवसेना भी महाराष्ट्र के पार अपने पैर नहीं पसार पाई है. यही हाल राम सेना और भगवा ब्रिगेड की अनगिनत छोटी शाखाओं का है. भारतीय मुसलमान को ऐसी आवाज की जरूरत है जो उनकी जायज मांगों व चिंताओं को दुनिया के सामने रखे. यह चिंता का विषय है कि भारत के उदारवादी और प्रगतिशील मुस्लिम विद्वान राजनीति में चरमपंथी तत्वों की वृद्धि पर चुप्पी साधे हुए हैं. कोई भी इस हकीकत को नकार नहीं सकता कि मुसलमान भारत की एक सहनशील राष्ट्र की छवि का अभिन्न अंग हैं. यह समय है ऐसे मुस्लिम नेताओं को खोजने का जो विभाजित भारत के नहीं बल्कि समावेशी भारत के पक्ष में बात करें. ओवैसी की आवाज मुसलमानों के लिए उतनी ही खतरनाक है जितना गौण हिंदू तत्वों द्वारा दिए गए विषैले बयान. ओवैसी बिहार के मतदाताओं से राज्य में बदलाव लाने का वायदा करते हैं, लेकिन श्रीमान ओवैसी आप अपने बदलाव अपने पास ही रखिए क्योंकि इस देश को और मुस्लिमों को कम से कम आपके जैसे बदलावों की आवश्यकता तो हरगिज नहीं है. 
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)