इस कहानी को पिछले कुछ समय की मजेदार कहानियों में से एक का दर्जा जरूर मिलना चाहिए. 3 अक्टूबर को कोलकाता के नजदीक पड़ते बिधाननगर में नगर निगम चुनाव के लिए महापौर (मेयर) के पद के लिए मार्क्सवादी प्रत्याशी असीम दासगुप्ता थे, जिन्हें आज सबकी नजरों में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है. असीम दासगुप्ता लगभग 25 वर्ष तक बंगाल में लेफ्ट फ्रंट सरकार के वित्तमंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं, लेकिन यह शक्तिशाली लोगों के पतन पर केंद्रित मजाक नहीं है. वास्तव में, सीपीआई(एम) को श्रेय दिया जाना चाहिए कि वह किसी के व्यक्तिगत अहंकार को पार्टी आदेशों के साथ हस्तक्षेप नहीं करने देती. अगर एक अभिमानी वित्तमंत्री को उपनगरीय महापौर के पद के लिए प्रयास करने का आदेश दिया जाता है तो उसे आदेश की अनुपालना करनी ही होगी. मजाक की बात कुछ और ही है. 
 
कॉमरेड दासगुप्ता मतदाताओं के घर जाकर पुराने जमाने के तौर-तरीकों से वोट मांग रहे हैं. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक वह नागरिकों को बताते हैं, ‘वोट डालना मत भूलिए और यह सुनिश्चित करें कि आप सुबह जल्दी जाकर मतदान करें क्योंकि हम उम्मीद करते हैं कि तृणमूल कांग्रेस के गुंडे उस समय सबसे कम हुड़दंगी करते हैं.’ दासगुप्ता ‘निजर वोट, निजर दीन’ या ‘अपना वोट स्वयं दें’ के शीर्षक वाली प्रचार पुस्तिकाएं भी वितरित कर रहे हैं. यह ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए हास्यकर है जो 1977 से लेकर 2011 तक बंगाल में रहा हो, जब सत्ता पर लेफ्ट फ्रंट का अनंत दिखाई देने वाला मजबूत अधिकार था. मार्क्सवादी ठीक ऐसे ही प्रत्येक चुनाव में अपने वोटों में अतिरिक्त वृद्धि करते थे और जीत सुनिश्चित करते थे. उनके कार्यकर्ता राज्य पुलिस द्वारा संरक्षित गुंडों की मदद से उन मतदान केन्द्रों पर कब्जा कर लेते थे जहां उनका मानना था कि उनकी पार्टी के खिलाफ मतदान हो सकता था. मतदान केन्द्रों पर तैनात अधिकारियों को सहयोग न करने की स्थिति में गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी जाती थी. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सीपीआई(एम) के साथ बिल्कुल वही कर रही है जैसा सीपीआई(एम) ने औरों के साथ किया था. बंगाल के मार्क्सवादियों द्वारा निष्पक्ष चुनावों का समर्थन करने की कल्पना करना भी बेमानी है. लेकिन पराजय अपने साथ कई बदलाव लेकर आती है. यह आपको सक्षम और गुणी व्यक्ति भी बना सकती है. 
 
अजीब बात यह है कि बंगाल में सत्ता गंवाने के चार वर्ष बाद भी मार्क्सवादी अपनी पराजय के कारणों से अवगत नहीं हो पाए हैं. एक मुहावरा इस सारी कहानी का सार प्रस्तुत करता है ‘बूढ़े आदमी, बूढ़े सिद्धांत.’ वामपंथियों ने न ही युवाओं के साथ तालमेल बिठाने के अपने समीकरण को बदला है और न ही अपने बूढ़े आदमियों को सेवानिवृत्त किया है, जिनका दौर बहुत पहले ही बीत चुका है. असीम दासगुप्ता अब 69 वर्ष के हो चुके हैं. क्या कारण है कि सीपीआई(एम) ने बिधाननगर में महापौर के पद के लिए किसी 40 वर्षीय व्यक्ति को अपना प्रत्याशी नहीं बनाया? क्या इसलिए क्योंकि पार्टी में सक्षम और युवा सदस्यों का अकाल पड़ गया है? कहीं सीपीआई(एम) भी सोवियत पोलित ब्यूरो की मानसिकता से ग्रस्त तो नहीं है, जिसमें एक बार प्रविष्टि के बाद आप तब तक वहीं बरकरार रहते थे जब तक आपको ईश्वर का बुलावा नहीं आ जाता था. चूंकि मार्क्सवादी आइकॉन स्टालिन ईश्वर में यकीन नहीं करता था, वह इस समस्या का समाधान आवधिक बर्खास्तगियों के साथ करता था, लेकिन बंगाल के स्टालिनवादियों के लिए यह विकल्प उपलब्ध नहीं है. 
 
  नगरपालिका चुनाव में स्थानीय परिणामों के बावजूद, इसकी संभावना कम ही है कि वर्तमान में आधा झुका हुआ लाल ध्वज थके-हारे उम्रदराज पुरुषों के नेतृत्व में लहरा पाएगा. दिलचस्प सवाल यह है कि क्या वामपंथी भारतीय चुनावी समीकरण में उनके द्वारा रिक्त किए गए स्थान को पुन: प्राप्त कर पाएंगे? क्या भारत में मार्क्सवाद उसी तरह अप्रचलित हो चुका है जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुआ है? चीन कम्युनिस्ट पार्टी की मंशाएं समतावादी हैं, लेकिन वे जानते हैं कि वे पुराने फामूर्लाबद्ध नुस्खों से अब समृद्धि उत्पन्न नहीं कर सकते. मार्क्सवाद के स्तंभ टूटने लगे हैं और अपने पीछे केवल नेक इरादे छोड़ कर जा रहे हैं. बंगाल-मार्क्सवाद की दीर्घायु का रहस्य सिद्धांत में नहीं बल्कि पार्टी यंत्र में निहित है. उनकी चिर-प्रतिद्वंदी ममता बनर्जी ने इस तथ्य को समझा और इसलिए वह इस यंत्र के पर्याप्त भागों को ग्रहण कर अपने खुद के नेटवर्क में समायोजित कर सकी. गरीबी की चुनौती को ऐसी राजनीतिक ताकतों द्वारा संबोधित किया जा रहा है जिनका वाम दलों से कुछ लेना-देना नहीं है. ममता बनर्जी बंगाल में इसलिए विजयी रहती हैं क्योंकि उन्हें गरीबों का समर्थन प्राप्त है. मार्क्सवादी 35 वर्ष तक बंगाल को अपना गढ़ समझते रहे और यह उनके लिए एक बहुत प्रभावी गढ़ था. हैरत की बात है कि वामपंथियों ने एक बार भी यह नहीं सोचा कि इस किले के दरवाजे बाहर की ओर भी खुल सकते हैं और यह एक ऐसा सुरक्षित आधार हो सकता है जहां से एक राज्य, या एक विचारधारा को प्रसारित किया जा सकता है. इसके स्थान पर उन्होंने किले के दरवाजे बंद कर लिए और अभिमानी असामाजिकता में पीछे की ओर चले गए. 
 
व्यक्तियों की तरह राजनीतिक दल भी कई कारणों से शैय्या-ग्रस्त हो सकते हैं, अप्रासंगिकता के कारण कई वक्त से पहले ही मौत के मुंह में समा चुके हैं. जब भारतीय वाम-पक्ष का मृत्युलेख लिखा जाएगा तब यह कहा जाएगा कि इसकी मृत्यु आत्मसंतोष के कारण हुई. यह हत्या नहीं, बल्कि एक आत्महत्या थी. क्या अब पिछली गलतियों को सुधारने के लिए समय बीत चुका है? जी नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है. लेकिन लेफ्ट को कोई डॉक्टर नहीं केवल चमत्कार ही बचा सकता है और चमत्कार केवल ईश्वर ही कर सकता है. अगर लेफ्ट गॉड में विश्वास नहीं करेगा, तो उसे कम से कम एक अलग गॉडफादर को खोजने का प्रयास करना चाहिए जो उसके अस्तित्व को बचा सके. 
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)