यह देखना दिलचस्प था कि किस प्रकार नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय के निदेशक के रूप में महेश रंगाराजन के बाहर होने के बाद भारत के बौद्धिक और राजनीतिक प्रतिष्ठान के एक क्रोधित वर्ग ने असंतोष प्रकट किया. यह स्तंभलेखक दृढ़ता से संस्थानों की पवित्रता व उन्हें पर्याप्त रूप से स्वायत्तता प्रदान किए जाने की आवश्यकता में विश्वास रखता है. रंगाराजन का बाहर होना नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय में असली स्कैंडल नहीं है. असली स्कैंडल मई 2014 में हुआ था जब तत्कालीन यूपीए सरकार ने रंगाराजन के असल कार्यकाल को तीन वर्ष से बढ़ाकर 10 वर्ष (सेवानिवृत्ति की आयु तक पहुंचने तक) कर दिया गया था.किसी भी संस्थान प्रमुख को एक बार में 10 वर्ष का कार्यकाल देना अपने आप में एक असाधारण बात है. अधिकांश संस्थागत नियुक्तियां तीन वर्ष अथवा पांच वर्ष के लिए होती हैं. कुछ नियुक्तियों का कार्यकाल कानून के अनुसार बढ़ाया नहीं जा सकता जिनमें केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपति का पद भी शामिल है. शीघ्र ही सत्ता से बेदखल किए जाने वाली सरकार द्वारा लिए गए इस मूर्खतापूर्ण निर्णय पर काफी हो-हल्ला मचना चाहिए था, लेकिन व्यापक रूप से वाम-उदारवादी बौद्धिक स्थापना ने इस घटनाक्रम पर चुप्पी साधे रखी. 
 
यही कारण है कि रंगाराजन के प्रस्थान से संबंधित विरोध प्रदर्शनों की विश्वसनीयता अथवा संस्थानों की स्वायत्ता का उल्लंघन करने के लिए भाजपा सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों की विश्वसनीयता लगभग एक बड़े शून्य के बराबर है. रंगाराजन के पास नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय की अध्यक्षता करने के लिए आवश्यक सभी योग्यताएं हो सकती हैं, शायद उन्होंने इस संस्थान का संचालन भी अच्छे ढंग से किया हो, लेकिन यूपीए सरकार ने महज एक कलम के झटके मात्र से रंगाराजन की विश्वसनीयता को नष्ट कर दिया. रंगाराजन की गलती यह थी कि उन्होंने यूपीए के कृत्य को चुपचाप स्वीकार कर लिया. रंगाराजन के लिए उचित यही होता कि वह अपनी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए उसी समय अपने पद से इस्तीफा दे देते. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह चुनौती है कि वह अब सुनिश्चित करें कि उनकी सरकार किसी भी हाल में कांग्रेसी प्रथाओं का पालन न करे. शैक्षिक और सांस्कृतिक संस्थानों के मामले में हर किसी के लिए सार्वजनिक संभाषणों में छाए हुए ‘भगवाकरण’ के आरोपों अथवा ‘वामपंथ/मार्क्सवाद’ के जवाबी-आरोपों से विचलित होना बहुत आसान है. भारतीय जनता पार्टी के लिए महत्वपूर्ण निकायों में अवमानक नियुक्तियों पर यह कहकर पर्दा डालना बहुत आसान है कि कांग्रेस ने भी ऐसी या इससे भी बदतर नियुक्तियां की थी, लेकिन ‘बदलाव’ का वायदा करने वाले प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली पार्टी से ऐसे तर्क दिए जाने की उम्मीद नहीं की जाती. नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय एक अच्छी अग्निपरीक्षा की तरह है. संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने हाल के सप्ताहों में लापरवाह सार्वजनिक बयानों की एक श्रृंखला के साथ आम जनता में खुद को लोकप्रिय नहीं बनाया है. लेकिन, शर्मा और उनके मंत्रालय के पास अब यह दिखाने का अवसर है कि वे कुछ अलग करके दिखाने का माद्दा रखते हैं. शुरुआत के लिए, उन्हें नए निदेशक की नियुक्ति में यथोचित प्रक्रिया का पालन करना चाहिए. 
 
इस पद के लिए विज्ञापन दें. न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी प्रतिभाओं की तलाश करें. दक्षिणपंथी-प्रवृत्त व्यक्ति को चुनना अनुचित नहीं होगा लेकिन उसके पास पद के लिए आवश्यक योग्यताएं जरूर होनी चाहिए. स्वप्न दासगुप्ता, जो एक प्रख्यात दक्षिणपंथी टीकाकार होने के साथ-साथ बौद्धिक गंभीरता वाले एक योग्य इतिहासकार भी हैं, इस पद के लिए उत्कृष्ट विकल्प हो सकते हैं. अन्य उपयुक्त उम्मीदवार भी हो सकते हैं लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि योग्य उम्मीदवार की तलाश केवल अनुपयुक्त व असंबद्ध उम्मीदवारों तक ही सीमित न रह जाए और जिसे भी नियुक्त किया जाए उसे एक निश्चित तीन वर्षीय अथवा पांच वर्षीय कार्यकाल मिलना चाहिए. अनावश्यक रूप से बढ़ाए गए लंबे कार्यकाल केवल निहित स्वार्थों को मजबूत करने और संस्थानों को शख्सियतों के अधीन करने में मदद करते हैं. भारत तब तक प्रगति नहीं कर सकता जब तक इसकी शैक्षिक व सांस्कृतिक संस्थाओं का राजनीतिक प्रतिष्ठानों (चाहे यह भाजपा हो या कांग्रेस) के अनुचित षड्यंत्रों से बचाव नहीं किया जाता. 
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)