पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने साबित कर दिया है कि वह ऐसी राजनीतिज्ञ नहीं हैं जिन्हें उनके विरोधी आसानी से नजरअंदाज कर सकें.वास्तव में, ममजा बनर्जी ने अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पूरे जोश व गंभीरता के साथ तैयारी शुरू कर दी है और अगर वह विजयी रहती हैं तो वह एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभर कर सामने आ सकती हैं.
एक सप्ताह के भीतर दो चतुर प्रहारों ने ममता बनर्जी को राज्य के नागरिकों का प्रिय बना दिया है जो अन्य राज्य के नागरिकों पर अपनी बौद्धिक सर्वोच्चता का दावा करने का निरंतर प्रयास करते रहते हैं.भारत के महानतम मुक्तिदाताओं में से एक नेताजी सुभाषचंद्र बोस से संबंधित फाइलों को गुप्त सूची से हटा कर ममता ने केंद्र सरकार पर नेताजी से संबंधित सभी दस्तावेजों को सार्वजनिक क्षेत्र में लाने का दबाव डाल दिया है.ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले माह अपने आवास पर बोस के परिवारजनों के साथ होने वाली बैठक के बाद नेताजी से संबंधित दस्तावेजों के विवर्गीकरण का आदेश दे सकते हैं.देश के लिए सामान्य रूप से और बंगालियों के लिए विशेष रूप से नेताजी हमारे स्वतंत्रता संग्राम की सबसे श्रद्धेय हस्तियों मे से एक हैं और ममता बनर्जी की इस कार्रवाई को नेताजी के रहस्यमयी ढंग से लापता होने से संबंधित अफवाहों को दूर करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है.उनके इस कृत्य ने उन्हें देशभर के लोगों का प्रिय बना दिया है.
 
  इसी तरह, बंगाल क्रिकेट संघ (सीएबी) के अध्यक्ष पद के लिए आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी और लड़कपन स्वभाव वाले भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली को समर्थन देकर ममता बनर्जी ने एकबार फिर तीक्ष्ण राजनीतिक बुद्धि का परिचय दिया है.सौरव न केवल प्रसिद्ध खिलाड़ी रहे हैं, बल्कि संभवत: सबसे अधिक सम्मानित बंगाली आइकॉन भी हैं.बंगाल के लोगों का सौरव के प्रति अपार स्नेह व विशेष लगाव जगजाहिर है.बंगाल क्रिकेट संघ के अध्यक्ष के रूप में उनकी पदोन्नति मुख्यमंत्री को उनके कई विरोधियों पर बढ़त दिलाने में मदद करेगी क्योंकि एक क्रिकेट प्रशासक के रूप में गांगुली की पारी अभी शुरू ही हुई है और हो सकता है वह एक दिन बीसीसीआई के अध्यक्ष बन जाएं. ममता बनर्जी संयोग से नेता नहीं बनीं और न ही वह वंशवादी कारणों से नेता बनी हैं.उन्होंने कड़ी मेहनत और संघर्ष के दम पर यह मुकाम हासिल किया है और वह अपनी पार्टी को दृढ़संकल्प और धैर्य के बल पर बंगाल में सत्ता में लेकर आई हैं.ममता 1980 के दशक में भारतीय युवा कांग्रेस की महासचिव रह चुकी हैं और उन्होंने अपने सभी विरोधियों को चतुराई में मात दे दी है.उनके राजनीतिक करियर का सबसे गौरवपूर्ण क्षण 2011 में आया जब उन्होंने बंगाल में शक्तिशाली लेफ्ट के 34 वर्ष लंबे शासनकाल का अंत किया और उसे सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया.ममता की इस शानदार जीत के लिए उनकी दुनिया भर में सराहना की गई.उस ऐतिहासिक क्षण के बाद से भारत के दौरे पर आने वाला प्रत्येक अमेरिकी नेता इस सरल किंतु प्रभावशाली राज्य प्रमुख से मुलाकात करने की अपनी इच्छा व्यक्त करता है, जिनके पास निकट भविष्य में राष्ट्रीय मंच पर जगह बनाने की क्षमता है. ममता बनर्जी ने देश की प्रधानमंत्री बनने की अपनी इच्छा को शायद कभी शब्दों में व्यक्त नहीं किया है.लेकिन, यह देखते हुए कि कांग्रेस दिन-प्रतिदिन अपना आधार खोती जा रही है और हिम्मत हार रही है, आने वाले समय में वह आसानी से भाजपा के विकल्प के रूप में उभर सकती हैं.ममता को सबसे बड़ा लाभ यह है कि पुरानी व भव्य पार्टी के साथ उनकी पुरानी संबद्धता के कारण वह कांग्रेस के सामान्य जन में स्वीकार्य हैं.वह उन पूर्व कांग्रेसी नेताओं में से भी हैं जिनका प्रदर्शन पोषक पार्टी से नाता तोड़ने के बाद और बेहतर हुआ है.उनकी साधारण पृष्ठभूमि और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ उनकी विशाल संयोजकता अपेक्षित नेतृत्व कौशल प्रदान करते हैं.
 
उन सभी के लिए जिन्होंने अतीत में कांग्रेसी विचारधारा में भारी विश्वास रखा है, ममता बनर्जी ही शायद अकेली ऐसी नेता हैं जो हर राज्य के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के लिए एक प्रेरणास्रोत की भूमिका अदा कर सकती हैं.कांग्रेस के भीतर यह विश्वास स्पष्ट रूप से बढ़ता जा रहा है कि सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी चुनावी मोर्चे पर वांछित परिणाम प्रदान करने में सक्षम नहीं हैं.इसलिए, एक ऐसा नेता को किसी न किसी समय पर कार्यभार संभालने की जरूरत है जो संगठन का हिस्सा रह चुका हो और इसके महत्व और मजबूत पक्षों को भली-भांति समझता हो.यह तलाश ममता बनर्जी पर आकर समाप्त होती है.कांग्रेस से नाता तोड़ने वाले और बाद में अपने राजनीतिक दल गठित करने वाले पूर्व कांग्रेसी नेता भी एक बड़े राजनीतिक खेल में ममता को अपने शुभंकर प्रतीक के रूप में स्वीकार कर सकते हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद यादव शायद कांग्रेसी खेमे के सबसे अनुभवी और चतुर राजनीतिज्ञ हो सकते हैं, लेकिन गत वर्ष संसदीय चुनाव में घोर पराजय के शीघ्र बाद हुए विधानसभा चुनाव में उनके अपने राज्य द्वारा उनकी पार्टी को अस्वीकार करने के बाद उनका   समय लगभग खत्म हो चुका है.उनकी सबसे अधिक दिलचस्पी यह सुनिश्चित करने में है कि उनकी पुत्री सुप्रिया सुले उनकी उत्तराधिकारी बनें.वाईएस राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगन मोहन रेड्डी को आंध्रप्रदेश में विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद कार्यालय का प्रभार संभालने योग्य नहीं समझा गया. नवंबर में बिहार चुनाव परिणामों के पश्चात कांग्रेस पार्टी विभिन्न क्षेत्रीय दलों में खंडित हो सकती है.क्षेत्रीय संगठनों का नेतृत्व करने वाले सबसे पहले खुद को अपने संबंधित राज्यों में मजबूती से स्थापित करना चाहेंगे जिससे ममता का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा.इस प्रकार, अगर ममता अगले वर्ष सत्ता में आती हैं तो भारतीय जनता पार्टी की शक्ति को चुनौती देने के लिए वर्तमान और पूर्व कांग्रेसी नेताओं के भव्य गठबंधन का नेतृत्व करने से वह केवल एक कदम दूर हो सकती हैं.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)