नीति-निर्माण व इसके कार्यान्वयन के लिए राजनीतिज्ञों की नौकरशाही पर निर्भरता को देखते हुए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि यूपीए शासनकाल की कई पहलों को राजग सरकार द्वारा समान रूप से उत्साहपूर्वक समर्थन दिया जा रहा है. चूंकि उच्च नौकरशाही की श्रेणियों में गलती स्वीकार करना एक मुख्य गलती है, इसलिए यह स्वाभाविक है कि जिन नीतियों को प्रमाण्य रूप से अनुत्पादक दिखाया जा रहा था उन्हें वर्तमान में जारी रखा गया है. जापान, जर्मनी, ब्राजील और भारत का चार राष्ट्रों का क्लब या जी-4 इनमें से एक है, जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करने के लिए सामूहिक रूप से गठित किया गया है. संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के इस सबसे विशिष्ट क्लब में शामिल होने के लिए इन चारों देशों में से प्रत्येक के पास आवश्यक संजीदगी व गंभीरता है. हालांकि एक ओर यूरोपीय देश को इस विशिष्ट क्लब में शामिल किए जाने पर शायद कुछ सवाल खड़े किए जा सकते हैं क्योंकि ब्रिटेन और फ्रांस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के साथ यूरोपीय महाद्वीप का पहले से ही उचित रूप से प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.
 
अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति में यूरोप की निरंतर रूप से घटती भूमिका को देखते हुए अगर हम यह मानकर चलें कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या दोगुना बढ़ाकर 10 तक हो जानी चाहिए तो ऐसी स्थिति में स्पष्ट रूप से एशिया की कम से कम तीन सीटें होनी चाहिए, यूरोप की दो सीटों को बरकरार रखा जाना चाहिए, दक्षिणी अमेरिका को ब्राजील और अर्जेंटीना, अफ्रीका को दक्षिण अफ्रीका और नाईजीरिया के साथ दो-दो सीटों का लाभ मिलना चाहिए. जापान स्पष्ट रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के योग्य है. जापान संयुक्त राष्ट्र के कार्यों के लिए प्रचुरता के साथ धन प्रदान करता रहा है और 1945 में संयुक्त राष्ट्र के गठन के बाद से अब तक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर त्रुटिहीन व्यवहार करता आया है. लेकिन पी-5 के स्थायी सदस्य चीन द्वारा जापान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य क्लब में प्रवेश करने की अनुमति देने की संभावनाएं लगभग शून्य के बराबर हैं और आर-पार की रणनीति में टोक्यो के साथ हाथ मिलाकर ब्राजील और भारत भी अपनी प्रबल संभावनाओं को नष्ट कर रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा न्यूयार्क में जी-4 राष्ट्रों के शासनाध्यक्षों की बैठक की मेजबानी करने के साथ यह इंगित किए जाने की आवश्यकता है कि जहां तक स्थायी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सीट का सवाल है तो चारों में से प्रत्येक राष्ट्र को स्थायी सदस्यता के लिए अपने दावे की लड़ाई खुद लड़नी होगी. चूंकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा विचार करने के लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए, चारों में से प्रत्येक राष्ट्र को शामिल करने के लिए अलग-अलग प्रस्तावों पर संयुक्त राष्ट्र महासभा मतदान सुनिश्चित किया जाना चाहिए. अगर इस मतदान में पी-5 समूह का प्रत्येक सदस्य महासभा के दो-तिहाई सदस्यों व 15 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अधिकांश सदस्यों के साथ एक देश को समर्थन देता है तो वह देश स्थायी सदस्यों के क्लब में प्रवेश कर जाएगा. इस क्लब में शामिल होने की संभावनाएं सबसे अधिक भारत की हैं और उसके बाद ब्राजील और जर्मनी का नाम आता है, लेकिन चीन के विषेधाधिकार के कारण जापान इस होड़ से लगभग बाहर है. अगर पी-5 के भीतर भारत पर मतदान होता है तो चीन के लिए इस कदम का प्रतिशोध करना कठिन हो जाएगा बशर्ते नई दिल्ली, टोक्यो के साथ इस सम्मान को साझा करने की जिद पर न अड़ा रहे. 
 
नेहरूवादी कूटनीति की यह विशेषता रही है कि अन्य शक्तिशाली राष्ट्रों की जरूरतों को आगे बढ़ाने के लिए भारत के हितों को कुर्बान किया गया है. भलाई का यह कार्य सबसे अधिक जवाहरलाल नेहरू द्वारा किया जाता था जो पानी जैसे अस्तित्व के लिए आवश्यक मामलों में भी दूसरे राष्ट्रों के प्रति दरियादिली दिखाने का कोई मौका नहीं चूकते थे. जवाहरलाल नेहरू या उनके सलाहकारों को छोड़कर पाकिस्तान को सिंधु नदी के 80 फीसदी से अधिक पानी देने की वजह आज तक कोई नहीं जान पाया. लेकिन ऐसा नहीं है कि केवल जवाहरलाल नेहरू ही राष्ट्र के हितों के साथ समझौता करते रहे थे. लालबहादुर शास्त्री द्वारा ताशकंद में पाकिस्तान को हाजी पीर पास का आत्मसमर्पण और शिमला में इंदिरा गांधी द्वारा जुल्फिकार अली भुट्टो पर आंखें मूंद कर विश्वास करना राष्ट्र हितों के अनावश्यक बलिदान के ऐसे कई उदाहरणों में से हैं. भारत के हितों को अंतिम स्थान पर रखने की ऐसी नीति से भारत ने पाया कम खोया अधिक है लेकिन नरेंद्र मोदी से भारत के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की उम्मीद की जाती है. 
जब तक जापान को चीन का समर्थन नहीं प्राप्त होता, तब तक जापान के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने की संभावनाएं नगण्य हैं. भारत को ध्यान में रखना होगा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता पर अंतिम निर्णय संयुक्त राष्ट्र महासभा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद व पी-5 द्वारा लिया जाएगा. यह स्पष्ट किए जाने की जरूरत है कि जबकि जी-4 का गठन करने वाले चारों देश एक-दूसरे का समर्थन करते हैं, इनमें से किसी को भी संयुक्त राष्ट्र के सबसे विशिष्ट समूह में प्रवेश करने   के अन्य देशों के प्रयासों का प्रतिशोध करने का अधिकार नहीं है. बान-की-मून के रूप में, संयुक्त राष्ट्र के पास एक ऐसा महासचिव है जो भारत को समझता व उसकी सराहना करता है और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी भारत के साथ एक मजबूत गठबंधन सुनिश्चित करने के प्रति उत्सुक दिखाई देते हैं. जाहिर है कि हमारे देश के नीति-निर्माता परिणाम के स्थान पर प्रक्रिया को तरजीह देते हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की होड़ में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए. भारत को खुद को ऐसी स्थिति में कैद नहीं करना चाहिए जहां उसे स्वयं की उम्मीदवारी के विरोध के कारण नहीं बल्कि जापान की उम्मीदवारी पर चीनी निषेधाधिकार के कारण स्थायी सदस्यता से हाथ धोना पड़ जाए. जी-4 देशों के समूह में से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रवेश की सबसे अधिक संभावनाएं भारत की बनती हैं. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के रूप में भारत को स्वीकार किए जाने की शुभ घड़ी आ गई है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुनिश्चित करना होगा कि यह मौका हाथ से न जाने पाए.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं)