हमारा खजाना खाली है.हमारे काम में कानून विघ्न बन रहे हैं.हम ऐसा नहीं कर सकते, हमारे पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं.इस तरह की बातें हम काफी वक्त से सुन रहे हैं और उन पर यकीन करके चुप्पी साधे बैठे हैं.हमें सिर्फ यही कहना है कि जब चुनावी घोषणा पत्र में वह सब करने का वादा किया था जो अब नहीं हो सकता है, तब यह क्यों नहीं सोचा था? उस वक्त यह क्यों नहीं कहा था कि अगर अदालत में मामला जाएगा और कानून खिलाफ होगा तो हम कुछ नहीं करेंगे.तब यह क्यों नहीं कहा था कि हमें इस हालत में खजाना मिलेगा तो हम कुछ नहीं कर सकेंगे.तब क्यों नहीं कहा था कि अगर देश के खजाने की हालत इतनी बदतर होगी तो हम अपने और अन्य वीआईपी लोगों पर खर्च होने वाली रकम आधी कर देंगे? हमारे देश के राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दलों के पुरोधा कमोबेश इसी तरह की बातें करते हैं, मगर हमें शनिवार को तब अच्छा लगा जब यूपी के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि प्रदेश के विकास के लिए वह जो करना चाहते हैं उसमें कोई विघ्न-बाधा है.उन्होंने कहा कि हमने सोचा लखनऊ मेट्रो लाई जाए तो एक साल में 70 फीसदी काम पूरा हो गया.हमने सोचा कि हाईटेक सिटी बनना चाहिए तो काम शुरू हो गया.हमने सोचा आईटी सिटी बननी चाहिए तो वह काम पूरा हो गया.हमने सोचा क्रिकेट स्टेडियम बनना चाहिए तो आप 2016 में मैच देख सकेंगे.हम चाहते हैं कि पीएम को सौगात दें और वाराणसी में मेट्रो लाएं तो उस पर प्रोजेक्ट तैयार किया जाने लगा है.हमने सोचा ताज एक्सप्रेस वे को लखनऊ तक लाया जाए तो 302 किमी की सड़क के लिए भूमि अधिग्रहण करके किसानों को मुआवजा भी दे दिया गया.हमने लखनऊ में इंडस्ट्रियल कॉरीडोर बनाने का फैसला लिया तो अथॉरिटी बनाकर काम शुरू कर दिया.बाधाएं तो तब आती हैं जब हम बहाने खोजते हैं नहीं तो विकास के काम में कोई विघ्न नहीं होता. अखिलेश यादव की इन बातों और भविष्य की योजनाओं के पूरे होने के प्रति इतने आत्मविश्वास को देखकर यही कहा जा सकता है कि देश को ऐसे ही नेताओं की जरूरत है न कि उन नेताओं की जो सत्ता पाने के लिए कोई भी वादा करते हैं मगर सत्ता मिलते ही बहाने गिनाने लगते हैं.
 
प्रकृति ने हमारे देश पर अपार कृपा की है.किसी भी तरह के संसाधन की कमी नहीं है, बस उसके उपयोग के लिए सही कदम उठाने की जरूरत है.इस बारे में हम इजराइल से सीख सकते हैं जिनके देश पर भी कब्जा कर लिया गया था और वे दर-दर की ठोकरें खा रहे थे.उन्होंने न केवल अपने देश पर कब्जा वापस लिया बल्कि उसे इतना पुख्ता बनाया कि अब उसकी सीमाओं की तरफ नजर उठाने की कोई हिम्मत नहीं करता.यही नहीं उसने मरुस्थल में जिस तरह से कृषि उपज को बढ़ाया है वह हमारे लिए प्रेरणा स्रोत हो सकता है.जहां चारों तरफ खारा पानी है और पीने के पानी का इतना संकट है, वहां सबकुछ ठीक करना उनके जज्बे को सलाम करने को विवश करता है. हमारा मानना है कि हमारी सबसे बड़ी समस्या आबादी है. हमें इसे नियंत्रित करना होगा और इसके लिए चीन को सामने रखना होगा.चीन इस वक्त विश्व की ऐसी महाशक्ति है जिसके सामने अमेरिका भी थर्राता है, क्योंकि चीन आर्थिक रूप से इतना समर्थ हो चुका है कि विश्व की मार्केट में उसका सबसे बड़ा शेयर है.चीन के सियासतदां ने कभी यह बहाने नहीं गिनाए कि हम विश्व के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश हैं.हमारे देश का आधा हिस्सा बर्फ और दुर्गम पहाड़ियों में है.उन्होंने काम करने वालों को सम्मान दिया.हमें भी देश हित में कुछ सख्त तो कुछ जनहित के फैसले लेने होंगे.हम कल्याणकारी लोकतांत्रिक देश हैं मगर राष्ट्रहित में काम करने वालों को प्रोत्साहन देने की नीति बनानी होगी.वोट बैंक के लालच से ऊपर उठकर काम करना होगा.इस वक्त जातिगत आरक्षण चर्चा का विषय है.हमारे लिए शर्म की बात है कि 40 फीसदी अंक पाने वाला एक जाति विशेष का युवक श्रेष्ठ पद पर होता है और 80 फीसदी अंक पाने वाला उसके मातहत नौकरी के लिए भी धक्के खाता है.हम शिकायत करते हैं कि राष्ट्र के योग्य लोग विदेश भाग जाते हैं और देश खोखला रहता है.उस वक्त हम यह भूल जाते हैं कि अपने देश की योग्य प्रतिभाओं को हम उपेक्षित करते हैं, जबकि नाकाबिलों की फौज तैयार करते हैं.जब देश के नीति नियंताओं की फौज नाकाबिलों के बीच से निकलेगी तो वह स्वाभाविक रूप से निकम्मे होंगे.निकम्मों से हम देश के विकास का मॉडल कैसे तैयार करा सकते हैं? वे बहाने ही बताएंगे.हमारा मानना है कि अगर किसी जाति-धर्म का अतीत में शोषण हुआ है और वह पिछड़े हैं तो उन्हें आगे लाने का वास्तविक प्रयास किया जाना चाहिए.उन जाति-धर्म के लोगों को योग्य बनाने की दिशा में काम किया जाए.उन्हें सरकारी मदद से अच्छी शिक्षा और संसाधन मुहैया कराए जाएं.जब वह योग्यता के   मानदंड पूरे करें तो उन्हें सभी के साथ बराबरी में खड़ा किया जाए.ऐसे में हम योग्य और प्रोडक्टिव आबादी तैयार करेंगे.अगर ऐसा नहीं करेंगे तो वोट बैंक के लालच में हम नाकारा और निकम्मे लोगों की फौज बनाएंगे जो हमें किसी भी मोर्चे पर जीतने नहीं देगी.हमारा देश युवा है और उसे सही दिशा देने की जरूरत है.अब हम 1947 जैसे कंगाल राष्ट्र भी नहीं हैं.उस वक्त जैसी भुखमरी और संसाधनहीनता भी देश में नहीं है.देश ने पिछले 68 साल में अपना एक मुकाम बनाया है.कुछ कमियां रही हैं जिन्हें दुरुस्त करके हम आगे बढ़ सकते हैं.हमें उसी दिशा में कुछ बेहतर करने की जरूरत है.
 
हमारे देश में कोरे सम्मान देने का चलन है.किसी को पद्मश्री, किसी को पद्म विभूषण तो किसी को भारत रत्न तो किसी को किसी दूसरी श्रेणी का सम्मान, मगर हम यह सम्मान देने के बाद उस व्यक्ति के बारे में चर्चा भी नहीं करते हैं.वह किन हालात में घूम रहा है और सरकारी बाबू ‘आईएएस, आईपीएस, पीसीएस, पीपीएस’ जैसे अफसर उनके साथ ऐसा व्यवहार करते नजर आते हैं जैसे वह मालिक हों और सम्मान प्राप्त व्यक्ति उनका सेवक. अगर वह योग्य होते तो विश्व के किसी देश में कुछ बेहतरीन कर रहे होते.इन पदों पर जमे रहने के लिए वह राजनेताओं से लेकर उनके दलालों तक के पांव पड़ते नजर आते हैं.यही कारण है कि जब देश के लिए कुछ बेहतरीन करने की बारी आती है तो इनके पास बहाने ज्यादा समाधान कम होते हैं. हमारे राजनेताओं और नीति नियंताओं को अब उन योग्य लोगों की खेती शुरू करनी होगी जो बहाने और विघ्न-बाधा न बताएं बल्कि देश, समाज, समुदाय और परिवारों के विकास के लिए काम कर सकें.सबके हाथ में रोजगार हो और हर कोई देश के लिए कुछ न कुछ उत्पादन करे, सिर्फ अपने लिए नहीं.हमें कर्मठ और योग्य लोगों की जरूरत है न कि अयोग्य भीड़ की.
 
(यह लेखक का निजी विचार है.)