1965 में हुए भारत-पाक युद्ध को लेकर एक छोटा किंतु महत्वपूर्ण सवाल कि पाकिस्तान ने अपने दोहरे अभियान के प्रथम भाग का गुप्त नाम (कोड-नेम) स्पेन के तट पर स्थित एक छोटे से चट्टानी द्वीप के नाम पर क्यों रखा जो आज भी ब्रिटेन के कब्जे में है? अगस्त 1965 के हमले को ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ का नाम क्यों दिया गया, जिसमें कपटपूर्ण ढंग से खुद को ‘कश्मीरी’ नागरिकों के रूप में प्रस्तुत करने वाले पाकिस्तान प्रशिक्षित लड़ाकों ने कश्मीर घाटी में राज-विद्रोह करने का प्रयास किया? अगर यह पूरी तरह से विचित्र नहीं, तो थोड़ा अजीब जरूर लगता है. ‘जिब्राल्टर’ एक मुस्लिम-अरब जीत के लॉन्च पैड के रूप में इतिहास में अपना जीवन शुरू करता है, जिसने दुनिया के इतिहास को बदल कर रख दिया.कई स्पेनिश स्थानों के नामों की तरह ‘जिब्राल्टर’ भी अरबी नाम का विकृत रूप है. तारिक-इब्न-जियाद द्वारा गॉथिक राजा रोड्रिक को हराने के बाद और आइबेरियन उपद्वीप पर मुस्लिम शासन की नींव रखने के बाद अरबों ने इस द्वीप का नामकरण किया था.अरबी सफलता शीघ्रगामी और आश्चर्यजनक थी.जैसा कि प्रतिष्ठित इतिहासकार एडवर्ड गिब्बन ने ‘रोमन साम्राज्य के पतन का इतिहास’ में लिखा था कि अगर अरब पश्चिम से पूर्व का रुख करने की बजाय पश्चिम से पश्चिम का ही रुख करते तो ब्रिटेन पराजित हो सकता था और ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज में गिरिजाघरों के स्थान पर मस्जिदों की मीनारें दिखाई देतीं.
 
 चूंकि, पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह जनरल अयूब खां को व्यापक रूप से यथार्थवादी समझा जाता था.उसकी मंशाओं को लेकर मैं निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकता, लेकिन अयूब खां अपने युवा विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की कल्पनाओं को निश्चित रूप से प्रतिबिंबित करता था, जो 1965 में जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले का प्रमुख कर्ताधर्ता था.शायद अयूब खां केवल भुट्टो की तुलना में ही यथार्थवादी था.1971 में पाकिस्तान की करारी हार के बाद भी भुट्टो भारत के साथ एक हजार वर्ष तक चलने वाले युद्ध की बातें कर रहा था. 1965 की शरद ऋतु में पाकिस्तान ने द्विचरणीय योजना को सक्रिय किया था. पहली योजना ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ के माध्यम से बनाई गई थी जिसमें नियमित सैनिकों एवं अधिकारियों के साथ प्रशिक्षित अस्थायी सैनिकों को अन्यत्र विद्रोह पैदा करने के लिए भेजा गया था.दूसरे चरण को ‘ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम’ का नाम दिया गया था जिसका संचालन पाकिस्तानी सेना के औपचारिक सैनिकों द्वारा किया जाना था.कुछ दिनों तक चली तनावपूर्ण लड़ाई के बाद पाकिस्तानी सेना की दोनों योजनाएं विफल हुर्इं और उसे सीमा पार अपना क्षेत्र भारतीय सेना के हाथों गंवाना पड़ा.इसके साथ ही पाकिस्तान को उसकी दु:साहसी विफलता के कारण अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी चौतरफा आलोचना का सामना करना पड़ा, लेकिन क्या दूसरे चरण के नाम में भी कोई सुराग छुपा है? जी हां.जैसा कि सभी जानते हैं कि ग्रैंड स्लैम ताश के खेल से लिया गया एक शब्द है जिसका अर्थ है अल्टीमेट विक्टरी यानि जीत का उच्चतम रूप.  1970 के दशक में जब जनरल जिया उल हक ने भुट्टो सरकार का तख्तापलट किया था, उस समय पाकिस्तानी अभिजात वर्ग इस्लामी प्रवृत्ति और बुर्रा साहिब (बड़ा आदमी) व्यवहार का मिश्रण था. नौकरशाह और अधिकारी ब्रिटिश राज की अंग्रेजी रहन-सहन वाली संतानें थीं जिन्होंने निर्वाचित वर्ग के ज्यादा हस्तक्षेप के बिना शासन किया जो कराची, रावलपिंडी और इस्लामाबाद के उच्चतम स्तरों में स्थानीय महक और पूर्वाग्रह लेकर आ सकते थे.विशेषाधिकार प्राप्त यह निर्वाचित समूह क्लब जीवन के शिष्टाचारों और नियमों का अनुसरण करते थे, धाराप्रवाह अंग्रेजी भाषा बोलते थे और स्वयं को ऐसी परोपकारी अनिवार्यता समझते थे जो पाकिस्तान की भौगोलिक एकता को अखंड रखकर अपना देशभक्त कर्तव्य निभा रहे थे.जब उन्हें राजनीतिक तिकड़मबाज के रूप में समझा जाता था तब वे इस्लाम को सामयिक श्रद्धांजलि अर्पित करते थे, लेकिन इससे अधिक और कुछ नहीं.
 
जिन कट्टरपंथियों को भुट्टो के शराब पीने पर एतराज था, भुट्टो के पास उन्हें देने के लिए यह गुस्ताख जवाब था कि वह केवल शराब पी रहा है न कि लोगों का खून.यह अभिजात वर्ग लंदन, पेंटागन व वाशिंगटन में बैठे उसके आकाओं को सामाजिक, सांस्कृतिक और सामरिक रूप से आकर्षक दिखाई पड़ता था. वो पाकिस्तान अब बीते समय की बात है.लेकिन, इसका अंत एकाएक नहीं बल्कि धीरे-धीरे, चरणबद्ध तरीके से हुआ.इसकी शुरुआत जिया उल हक ने की जब उसने 1971 में भारत के हाथों मिली करारी हार को इस्लामीकरण की पुनर्दृष्टि के लिए बहाने में परिवर्तित कर दिया.जैसे-जैसे धार्मिक उत्साह के नए प्रवाह सार्वजनिक संवाद और तत्पश्चात हुकूमत को भी अपनी चपेट में लेने लगे, जिया उल हक के उत्तराधिकारी भी नए प्रचलनों के सामने बेबस नजर आए और मार्ग से भटक गए.जनरल परवेज मुशर्रफ ने इस प्रक्रिया को अधोमुख करने का आधा-अधूरा प्रयास किया.उसकी दिलचस्पी   पथभ्रमित राष्ट्र को वापस मार्ग पर लाने में नहीं बल्कि व्यक्तिगत शासन के सरंक्षण में निहित थी.वो सभी सुल्तानों का बहादुर शाह जफर था. दिल्ली को इस्लामाबाद में बिलकुल भिन्न सत्ता संरचना के साथ निपटना पड़ता है.जिन्हें पाकिस्तान में लोकतांत्रिक चुनावों के माध्यम से निर्वाचित किया गया है, वे भी इस तथ्य से भली-भांति अवगत हैं कि उनका राजनीतिक अस्तित्व केवल कट्टरपंथियों के साथ समझौता करने से ही संभव है.यह किसी भी शांति प्रकिया के मार्ग में आने वाली संकटपूर्ण बाधाओं में से एक है.मुझे नहीं लगता मेरे देश में कोई भुट्टो को याद करता होगा लेकिन जनरल अयूब खां व उसके पूर्वाधिकारियों पर रहम करें.इसमें हैरानी की कोई बात नहीं कि जनरल अयूब खां को उसके अभिमानी डिप्टी की तुलना में युद्ध की बेहतर समझ थी.
 
 (यह लेखक के निजी विचार हैं.)