इस्लामाबाद में सेनापतियों को स्पष्ट रूप से अहसास हो गया है कि आर्थिक उन्नति के अभाव में सैन्य ताकत का कोई महत्व नहीं है और वह पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में इस अहसास को अमल में ला रहे हैं. हालांकि, 1948 में जवाहरलाल नेहरू द्वारा पाकिस्तान के नियंत्रण में रहने देने की अनुमति वाले इस क्षेत्र में चीन के भारी निवेश को लेकर काफी बातें हो रही हैं. दूसरी हकीकत यह है कि सऊदी अरब और तुर्की जैसे देश भी पाक अधिकृत कश्मीर में चीन की तरह भारी निवेश कर रहे हैं, लेकिन अभी तक इसे प्रेस कवरेज और विदेश मंत्रालय की शिकायतों में प्रमुख स्थान नहीं मिल पाया है. तो फिर पाकिस्तान द्वारा खड़ी की गई समस्या का समाधान क्या है? इस क्षेत्र को शेष भारत के साथ जोड़ने की संभावना बहुत क्षीण है, क्योंकि पाकिस्तान के साथ पारंपरिक युद्ध दिल्ली में किसी भी सरकार के एजेंडे में नहीं है. विद्रोह का जवाब विद्रोह से देने के विकल्प को देश की जोखिम से बचने वाली नौकरशाही द्वारा सिरे से खारिज कर दिया जाएगा. तीसरा विकल्प हो सकता है कि भारत के जम्मू-कश्मीर को ऐसी गति और गहनता के साथ विकसित किया जाए जिससे पाक अधिकृत कश्मीर अपनी स्वयं की स्थिति का आकलन करने के लिए विवश हो जाए.
 
भारत में नौकरशाही व नौकरशाहों के साथ यह समस्या है कि जहां उनके स्वयं के हितों का संबंध होता है वहां उनके पास शानदार व्यवहार कौशल होता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समझौता वार्ताओं में वे इस देश के लिए उदार परिणाम सुनिश्चित करने में विफल रहते हैं. बहुत बार ऐसा होता है कि भारत की अंतिम वार्ता स्थिति (आमतौर पर यथास्थिति) को इस प्रक्रिया में वक्त से पहले ही स्पष्ट कर दिया जाता है, जिसका परिणाम यह होता है कि इसे प्रारंभिक वार्ता मुद्रा के रूप में लिया जाता है और तब दूसरा पक्ष और अधिक रियायतों की मांग करने लगता है. राजनीति नेताओं और सैन्य अधिकारियों द्वारा जुझारू शब्दों के इस्तेमाल के बावजूद, पाक अधिकृत कश्मीर के मामले में यह स्पष्ट था कि 1972 से उत्तरी व दक्षिण ब्लॉकों को यथा-स्थिति स्वीकार्य थी. 1971 में पाकिस्तान पर विजय उसके साथ मौकापरस्त सौदेबाजी करने का एक सुनहरा अवसर था. हमारी सेना द्वारा बंदी बनाए गए लगभग 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को रिहा करने के एवज में भारत के हिस्से के अंतर्गत आने वाले जम्मू-कश्मीर में सरल घुसपैठ अथवा आक्रमण को रोकने के लिए अतिरिक्त भूखंड की मांग की जा सकती थी. हम नहीं जानते कि जुल्फिकार अली भुट्टो में ऐसा कौन सा विशेष आकर्षण था जिसने इंदिरा गांधी को पाकिस्तान द्वारा नियंत्रण रेखा (एलओसी) को अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता देने की न्यूनतम शर्त को औपचारिक रूप भी नहीं देने दिया.
 
1948 में कश्मीर के एकीकरण से संकोच करने के साथ 1972 में एक और अवसर गंवा दिया गया जब एलओसी को भारत-पाकिस्तान के बीच की सीमा के रूप में मान्यता देने के मामले में इंदिरा गांधी ने एक अनुभवी पाखंडी द्वारा दिए गए एक झूठे वचन को ही स्वीकार कर लिया. एक अन्य पड़ोसी (चीन) के मामले में, जिसके साथ भारत का अभी भी सीमा विवाद चल रहा है, सीमा वार्ता के शुरुआती चरण में एकबार फिर अंतिम बातचीत स्थिति (वास्तविक नियंत्रण रेखा के पार यथा-स्थिति) स्पष्ट थी. चीन द्वारा इसे प्रारंभिक पहल के रूप में लिया गया और भारत से मांग की गई अतिरिक्त रियायातों ने सुनिश्चित किया कि सीमा-वार्ता उन्हीं मतभेदों व बारीकियों में अवरुद्ध रहे जहां वे एक दशक पहले थे. इस समय भारतीय पक्ष की ओर से चीन से रियायतों की मांग आवश्यक है ताकि प्रत्येक चीनी मांग का सामना भारतीय प्रतिक्रिया से हो लेकिन हमारे अधिकारियों से इस तरह के साहस की उम्मीद करना खुद को झूठी उम्मीद देने जैसा होगा. वर्ष 2003 में भारत को इराक के सबसे अधिक स्थिर भाग कुर्दिस्तान में 18 हजार सैनिकों को तैनात करने का प्रस्ताव दिया गया था. ऐसा करने से भारत को दो फायदे हो सकते थे. पहला, अमेरिका के साथ सैन्य संबंधों की गतिवृद्धि होती जो भारतीय वायुसेना, थलसेना और नौसेना को बड़े पैमाने पर सुसज्जित करने के लिए आवश्यक है और दूसरा, इराक के तेल समृद्ध कुर्दिश हिस्सों में लाभ उठाने का उचित अवसर मिलता. लेकिन इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया था और गत वर्ष भी भारत को अनौपचारिक रूप से आईएसआईएस के खिलाफ युद्ध में उसके कुछ सैन्य संसाधनों को समर्पित करने का प्रस्ताव दिया गया था लेकिन उसे भी ठुकरा दिया गया. मिस्र, जार्डन और ऑस्ट्रेलिया उन देशों के साथ हैं, जो आईएसआईएस के खिलाफ युद्ध में भाग ले रहे हैं. आईएसआईएस के खिलाफ युद्ध में भाग लेने के परिणामस्वरूप इन देशों के सुरक्षा परिदृश्य पर किसी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा और न ही भारत की सुरक्षा के खतरे में पड़ने की कोई संभावना है. सच्चाई यह है कि आने वाले 3 वर्ष में आईएस का सफाया सुनिश्चित करने के लिए सैन्य कार्रवाई में भारत के भाग लेने की प्रबल संभावना बनी हुई है. चीन, तुर्की, कुवैत और सऊदी अरब को यह संदेश दिए जाने की आवश्यकता है कि उन्हें केवल पाक अधिकृत कश्मीर में ही नहीं बल्कि भारतीय नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर में भी निवेश करने की जरूरत है. इसमें कोई संदेह नहीं कि पाकिस्तान की तुलना में भारत निवेश करने के लिए कहीं अधिक आकर्षक   गंतव्य है.
 
भारतीय नियंत्रण वाला जम्मू-कश्मीर निश्चित रूप से निवेश के कई अवसर प्रदान करता है. ऐसा होने के लिए न केवल भारत सरकार के रुख और संदेश में बदलाव करने होंगे बल्कि भारतीय रिजर्व बैंक को भी इस्लामी बैंकिंग जैसे नवाचारों के प्रति अपने विरोध को त्यागने की जरूरत है, जिसकी अनुमति का परिणाम देश के बाहर से पैसे के भारी निवेश के रूप में सामने आएगा. निश्चित रूप से कुछ संदिग्ध धन स्रोत भी होंगे जो इस्लामाबाद के एजेंडे के साथ सहमत होंगे, लेकिन ऐसे समूह अपने कृपापात्रों को वैसे भी पैसा भेजते रहेंगे. अगर इस्लामी बैंकिंग को वैध रूप दिया जाता है तो ऐसे धन-हस्तांतरण पारदर्शी बन जाएंगे और संदिग्ध लेन-देन की पहचान करने में आसानी होगी. इन दिनों हवाला नेटवर्क और यहां तक कि सामान्य बैंकिंग प्रणालियां भी कश्मीर में धन प्रवाह करने का माध्यम बन गई हैं ताकि उन अलगाववादियों तक वित्तीय समर्थन पहुंचाया जा सके जो जानते हैं कि भारत से पृथक कश्मीर का पक्ष लेना एक फायदेमंद पेशा है. दोहरे अंकों की विकास दर सुनिश्चित करने के लिए नई नीतियों की जरूरत है. नीति आयोग को प्रधानमंत्री कार्यालय के लिए प्रबुद्ध मंडल का रूप लेने की जरूरत है, जिसमें सेवानिवृत्त और मौजूदा अधिकारी नहीं बल्कि नौकरशाही के वैकल्पिक दृश्य की पेशकश करने वाले लोगों को नियुक्त किया जाए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली शेष राजनीतिज्ञों से बिलकुल अलग है. उन्हें अनोखी और साहसी नीतियों का निर्माण व कार्यान्वयन करने की जरूरत है. केवल वही नीतियां देश को उच्च विकास पथ पर अग्रसर कर सकती हैं जिन्हें प्रधानमंत्री की संपूर्ण शैली में लागू किया जाए ताकि देश के युवाओं द्वारा प्रस्तावित संभावनाओं का भरपूर इस्तेमाल किया जा सके. 
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं)