देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू तमाम समस्याओं के बावजूद देश को इतना सशक्त बना गए और सशक्त होने की राह दिखा गए थे कि छोटी-छोटी समस्याओं का हल ही ढूंढ़ना बाकी था.यह देश के लिए दुखद है कि पिछले 25 साल में देश और उसकी राजनीति जिस दिशा में गई उसने आम लोगों के लिए संकट बढ़ा दिए. देश का आम शहरी हो या फिर ग्रामीण दोनों ही छोटी-छोटी समस्याओं से ऐसे जूझ रहे हैं कि कुछ बड़ा सोचने का वक्त ही नहीं निकाल पाते. हालात यह हैं कि हमें भारतीय होने पर गर्व नहीं शर्म महसूस होने लगी है. पंडित नेहरू ने देश को जिस ढांचागत विकास की राह दिखाई थी, वह विनिवेश की राह में खो गया है. अब या तो वोट बैंक के लिए लोक लुभावन काम हो रहे हैं या फिर किसी वर्ग विशेष के हित के लिए. उन आम लोगों और उनकी समस्याओं को मुद्दा भी नहीं समझा जा रहा जो रोजाना खट रहे हैं.हम यूपी की राजधानी लखनऊ की उस घटना पर चर्चा करना चाहते हैं, जो असल में देश की बड़ी समस्या है. दो दिन पहले हजरतगंज चौक के पास फुटपाथ पर पिछले 35 साल से टाइपिंग करके परिवार का पेट पालने वाले बुजुर्ग कृष्ण कुमार को जिस तरह से एक पुलिसकर्मी ने अपमानित किया और टाइपराइटर पटक दिया, उसे किसी भी दृष्टि से सही नहीं कहा जा सकता है.यह सच है कि यह बुजुर्ग कानूनन अतिक्रमण की श्रेणी में आने वाले अपराध के दोषी हैं, मगर इसके लिए उन्हें इस तरह से अपमानित करने की इजाजत नहीं दी जा सकती. हम यूपी के युवा मुख्यमंत्री को धन्यवाद देंगे कि उन्होंने यह बात संज्ञान में आते ही तत्काल सकारात्मक और उदाहरण प्रस्तुत करने वाला कदम उठाया.
 
उन्होंने मीडिया रिपोर्ट्स पर ही दोषी एसआई को निलंबित करने का आदेश जिले के एसएसपी को दे दिया. यही नहीं बुजुर्ग के सम्मान को वापस लौटाने के लिए जिलाधिकारी और एसएसपी को उनके घर जाकर नया टाइपराइटर देने का भी आदेश दिया.जिले के सबसे बड़े इन दोनों अफसरों ने जब बुजुर्ग कृष्ण कुमार का दरवाजा खटखटाया तो उन्हें वह सम्मान महसूस हुआ जो वह सपने में भी नहीं सोच पा रहे थे.इस घटना के बाद हमारे देश की तमाम सरकारों और प्रशासन प्रमुखों को यह बात समझनी होगी कि वह राजनीति और प्रशासन अपने या किसी कानून के लिए नहीं कर रहे, बल्कि उन लोगों को सुविधा देने के लिए कर रहे हैं जो देश के मालिक हैं यानी जनता. अखिलेश यादव के इस आदेश और कदम से एक बात साफ हो गई कि यूपी में अभी भी लोकतंत्र कायम है. हमने देखा है कि बड़ी-बड़ी योजनाओं और विकास की बात करने वाले अक्सर उन छोटे-छोटे लोगों को नजरअंदाज कर देते हैं, जो वास्तव में सरकार बनाते हैं. हमारे नेता और राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिए कुछ भी बोलते हैं, मगर जब सत्ता मिल जाती है तो नियमों और कानूनों की लकीरें पीटते हैं, जबकि सत्य यह है कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का काम है कि वह आमजन के हित में नियम-कानून बनाएं और उसमें बदलाव करें. इससे उन्हें कोई नहीं रोक सकता है. निश्चित रूप से सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह लोगों को बेहतर जीवन देने के लिए नियम बनाए और उनका सख्ती से पालन कराए.यह भी सत्य है कि ऐसे नियमों और कानूनों से अगर किसी का रोजगार छिनता है तो उनको पुनर्वासित करे. यदि कोई कृष्णकुमार फुटपाथ पर अतिक्रमण करके अपना परिवार पालता है तो लोकहित में उसे वहां से हटाना प्रशासन की मजबूरी है, मगर प्रशासन की यह भी जिम्मेदारी है कि वह उसे वाजिब जगह काम करने के लिए लाइसेंस और स्थान दे. अगर प्रशासन और सरकार ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें नियमों की पालन के नाम पर उत्पीड़न करने का हक भी नहीं दिया जा सकता है. हमने चंडीगढ़ में देखा है कि यहां नगर निगम, एस्टेट ऑफिस और स्थानीय पुलिस के लोग मिलकर अतिक्रमण का धंधा चलाते हैं.इस धंधे में जो फिट नहीं होता उसका चालान कटता है और उत्पीड़न भी होता है. जरूरत यह नहीं है कि हम नियमों का ठीकरा आमजन के सिर फोड़ें चूंकि, सरकार और प्रशासन सभी को दुकानें या दूसरे स्थान उपलब्ध नहीं करा सकता है तो उसे इन फुटपाथी दुकानदारों के हित में नियम और लाइसेंस की व्यवस्था करनी चाहिए.नियमों की लकीर पीटते हुए हम अगर किसी का रोजगार छीनते हैं तो वह परिवार का पेट पालने के लिए अपराध करेगा फिर नई समस्या होगी इसलिए काम देने के लिए नियमों में संशोधन किया जाए, जिससे आमजन अपनी भारतीयता पर गर्व कर सके.
इस घटना के बाद यह बात सामने आई है कि देश की राजनीति भ्रमित हो चुकी है. हमारे राजनेता यह नहीं समझ पा रहे हैं कि वह अपने लिए सत्ता में आए हैं या आमजन के प्रतिनिधि के रूप में. सरकार को ‘बनिया की दुकान’ समझा जाने लगा है. हमारा देश ‘कल्याणकारी राज्य’ की अवधारणा पर बना है. यहां सिर्फ उसका ही हित नहीं देखा जाएगा जो धनपति है बल्कि उसका भी हित देखा जाएगा जो निर्धन है. सत्ता पाने के लिए शुरू से ही राजनीतिक दल विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपनाते हैं. पहले आमजन से लुभावने वादे करते हैं और बाद में उन्हीं के शोषण करने वाले नियम बनाते हैं. वोट बैंक बनाने के लिए कभी जातिवाद, कभी धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर लोगों को बांटा जाता है तो कभी गरीब-अमीर, महंगाई का चेहरा दिखाया जाता है.जब करने की बारी आती है तो इन सब से ऊपर सिर्फ उनके स्वार्थ होते हैं. इस बीच राजनीति के दो चेहरे नजर आते हैं. एक खुद को सेक्युलर कहता है तो दूसरा खुद को सांप्रदायिक साबित करके एक वोट बैंक बनाना चाहता है. शायद सांप्रदायिक और गैर सांप्रदायिकता के बीच कोई अंतर नहीं है, क्योंकि दोनों ही असल में वोट बैंक के लिए सांप्रदायिक बन चुके हैं.एक अल्पसंख्यकों के लिए सांप्रदायिक है तो दूसरा बहुसंख्यकों के लिए सांप्रदायिक है.इनके बीच जो सत्य नजर आता है वह है अतिवादी राजनीति.इन सब के बीच राजनेता आमजन के हितों को पूरी तरह नजरअंदाज करते हैं.वह आमजन के छोटे-छोटे मुद्दों को हल नहीं होने देना चाहते हैं और न ही उसके लिए कोई सार्थक कदम उठाते हैं जबकि यह मुद्दे अगर हल हों तो आमजन भी देश के लिए उत्पादक होगा.ऐसे में देश के लोगों को सोचना पड़ रहा है कि अगर देश की राजनीति का यही चेहरा हमेशा के लिए लोगों के सामने रहेगा और इसी के जरिए राजनीतिक दल एक-दूसरे से भिड़ते रहेंगे, तो देश के उस संविधान का क्या होगा, जो लोकतंत्र में लोककल्याणकारी धर्मनिरपेक्षता की पैरवी करता है? तो क्या देश में ऐसे ही राजनीति आगे बढ़ती रहेगी, जिसमें सिर्फ अतिवादी ही सत्ता के शिखर तक पहुंचेंगे? देश के सभी राजनीतिक दलों का दृष्टिकोण स्पष्ट हो चुका है.तथाकथित सेक्युलर दलों को भी लोग समझने लगे हैं.ऐसे में, लोगों के लिए यह समझ पाना कठिन नहीं है कि वे किसे अपनी जिम्मेदारी सौंपें.इस बीच एक सवाल भी खड़ा होता है कि क्या इस देश में ऐसा कोई नेता नहीं होगा, जिसके लिए देश सर्वोपरि हो?  हमारी सरकारों को शहरों और गांवों को स्मार्ट बनाने के ड्रामे से ऊपर उठना होगा.उन्हें पहले आमजन के छोटे-छोटे मसलों को समझना होगा.सरकार को आमजन को दो वक्त की रोटी-कपड़े और सिर ढकने के लिए जरूरी संसाधन-रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने वाली योजनाओं पर काम करना होगा.इस देश की 75 फीसदी आबादी अभी भी दो वक्त की रोटी के लिए ही जीती है.उसे राष्ट्रवाद या सांप्रदायिकता से कोई लेना-देना नहीं है.गांवों में स्वरोजगार के अवसर जुटा कर ही हम भूमिहीनों की दिहाड़ी मजदूरी की निर्भरता को कम कर सकते हैं.
 
भारत सरकार ने वर्ष 2011 की जनगणना के आर्थिक, सामाजिक आंकड़े हाल ही में जारी किए हैं.ये आंकड़े भारत में गरीबों की वर्तमान दुर्दशा की कहानी बयान कर रहे हैं.चिंता का विषय केवल यह नहीं है कि गरीबों की हालत खराब है, बल्कि वह पहले से ज्यादा बदतर होती जा रही है.जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक जहां 2001 में जनजाति वर्ग के 45 प्रतिशत किसान अपनी जमीन पर खेती करते थे, 2011 में इस वर्ग के मात्र 35 प्रतिशत लोग ही अपनी जमीन पर खेती करते हैं.2001 में अनुसूचित जाति के 20 प्रतिशत लोग अपनी जमीन पर खेती करते थे, वहीं 2011 में 15 प्रतिशत.जहां 2001 में 37 प्रतिशत लोग भूमिहीन खेतिहर मजदूर थे, वहीं 2011 में 44.4 प्रतिशत लोग.यानी 2001 से 2011 के बीच दस वर्षों में काफी संख्या में गरीबों के हाथ से भूमि छिन गई है और अधिक आय वालों की जमीनों में वृद्धि हुई है.राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की 68वीं रिपोर्ट के मुताबिक 2004-05 से लेकर 2009-10 के 5 साल में ही स्वरोजगार में लगे ढाई करोड़ लोग स्वरोजगार से बाहर हो गए जबकि सवा दो करोड़ लोग दिहाड़ी मजदूर बन गए.हमारी सरकारें आजादी के बाद से ही लगातार गांव और किसानों की बातें करती रही हैं मगर सच यह है कि आज भी गांवों में 36 प्रतिशत लोग निरक्षर हैं.मात्र 29.7 परिवारों के पास ही सिंचित भूमि है.शहरों में जनदबाव व सुविधाओं की कमी के चलते, अभावों में जी रही ग्रामीण जनता के पास कोई विकल्प नहीं है. लाखों किसानों की आत्महत्याएं इस बात का प्रमाण हैं कि कृषि अलाभकारी होती जा रही है.जनसंख्या का दबाव भी लगातार बढ़ रहा है.बड़ी मात्रा में भूमि का उपयोग गैर कृषि कार्यों के लिए होने लगा है.सरकारी योजनाएं भी कमोबेश इसको बढ़ावा देती हैं और ‘लैंड डेवलपर्स’ का एक वर्ग तैयार करती हैं.शहरीकरण, औद्योगीकरण, इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भूमि का उपयोग बढ़ता जा रहा है.भविष्य में लाभ कमाने के लिए अमीरों द्वारा बड़ी मात्रा में भूमि हस्तगत कर ली गई है.ऐसे में सरकार को तथाकथित विकास के नाम पर योजनाएं बनाने का खेल बंद करके आमजन की समृद्धि की दिशा में काम करने की जरूरत है.हर हाथ को काम और हर परिवार को घर की छोटी-छोटी जरूरतें पूरी करने के लिए काम करना होगा, न कि रोजगार छीनने वाले नियमों की लकीर पीटने का काम.
 
( ये लेखक के निजी विचार हैं)