सुभाषचंद्र बोस को लेकर किसी के भी मन में संदेह नहीं है कि नेताजी हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के सबसे प्रतिष्ठित नेताओं में से एक थे और इतिहास में उनका स्थान किसी अन्य शख्सियत से कम नहीं है. कई लोग बोस को अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़कर जाने के पीछे का प्रमुख कारण मानते हैं. इस समय नेताजी ने खुद आगे बढ़कर नेतृत्व किया, लाखों भारतीयों को तानशाह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा दी, जिसका अंत 1947 में भारत की आजादी के साथ हुआ. लेकिन उनके अमूल्य योगदान को हमेशा से छोटा समझने का प्रयास किया गया है. उनके द्वारा संगठित आजाद हिंद फौज को कभी भी वह दर्जा नहीं दिया गया, जिसके वह सही हकदार थे क्योंकि कांग्रेस की आजादी की लड़ाई की कहानी कुछ अलग थी.अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा 12 हजार 744 पृष्ठों वाली नेताजी की गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक करने के बाद हमारे स्वतंत्रता आंदोलन और सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज के जुझारू सैनिकों के योगदान के बारे में एक नया अध्याय जुड़ गया है.
 
एक तरफ यह खुलासे इतिहासकारों को घटनाओं के प्रकटीकरण पर नजर दौड़ाने के लिए नया दृष्टिकोण प्रदान करेंगे, तो वहीं केंद्र सरकार को उन शेष फाइलों को भी गुप्त सूची से उतारने के लिए विवश करेगा जो अभी भी सरकार के संरक्षण में हैं.ऐसे संकेत मिले हैं कि नेताजी से संबंधित कुछ फाइलों को यूपीए के शासनकाल के दौरान नष्ट कर दिया गया था. हालांकि, ऐसा माना जाता है कि बोस के बारे में फैली गलतफहमियों का अंत करने के लिए शेष फाइलें पर्याप्त सिद्ध होंगी. इसलिए, पूर्व सोवियत संघ व ब्रिटेन की सरकार एजेंसियों के साथ-साथ अमेरिकियों, चीनियों व जापानियों के लेखागारों में जो भी जानकारी उपलब्ध है, उसे प्राप्त करना आवश्यक है. आज आजाद हिंद फौज के गुमनाम नायकों को कृतज्ञता और गर्व के साथ उनका निर्दिष्ट मान देने के लिए इतिहास को उसके विशुद्ध रूप में समझना भी महत्वपूर्ण है. यह संकेत देने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं कि नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को हुई विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी और उन्हें बाद में सोवियत संघ द्वारा हिरासत में लेकर पहले मॉस्को ले जाया गया था. उनके कुछ सगे-संबंधियों के इस दावे के सही होने की पूरी संभावना है कि पूर्व राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन ने 1940 के दशक में भारत के राजदूत के रूप में सोवियत जेल में नेताजी से मुलाकात की थी. अगर षडयंत्र सिद्धांत पर यकीन किया जाए तो एक प्रख्यात विद्वान रह चुके डॉ. राधाकृष्णन ने इस कथित मुलाकात पर पूरी तरह से चुप्पी साधे रखी और इसलिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा उन्हें इस तथ्य के बावजूद पहले उप-राष्ट्रपति और उसके बाद राष्ट्रपति के पद से पुरस्कृत किया गया जबकि राधाकृष्णन का कांग्रेस अथवा स्वतंत्रता संघर्ष से कुछ खास लेना-देना नहीं था. नेताजी के रहस्य का पर्दाफाश तथ्यों को सामने ला सकता है और अगर दावे झूठे साबित हुए तो शायद राधाकृष्णन को दोषमुक्त भी कर सकता है. 
 
इस समय नेताजी के भतीजे के बेटे चंद्रा बोस प्राइम टाइम चैनलों पर एक बेहद उचित बात को महत्व दे रहे हैं कि सुभाषचंद्र बोस ही अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ने के पीछे का एकमात्र प्रमुख कारण थे और इस तरह नेताजी ही वह मुक्तिदाता थे जिन्होंने हमें औपनिवेशिक बंधन से मुक्ति दिलाई. चंद्रा बोस ने बताया कि आजाद हिंद फौज में भर्ती के लिए परीक्षण शुरू होने के बाद और भारतीय सशस्त्र बलों में विद्रोह होने के बाद अंग्रेज घबरा गए थे और उनके शीर्ष नेतृत्व में भय की भावना घर कर गई थी. अगर यह प्रसंग सही है तो यह उस विश्वास को झुठलाता है कि भारत ने अहिंसक साधनों के माध्यम से स्वत्रंतता प्राप्त की. बेशक अहिंसा आंदोलन ने हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान प्रासंगिक भूमिका निभाई थी, लेकिन उस समय ऐसे क्रांतिकारी भी थे जो इन तौर-तरीकों से सहमत नहीं थे. उदाहरण के लिए, भगत सिंह और उनके साथियों की अपनी विचारधारा जिन्हें विदेशी शासन का विरोध करने के परिणामस्वरूप फांसी पर चढ़ाया गया. जब सुभाषचंद्र बोस को लगा कि अंग्रेजों को अहिंसा से देश छोड़ने के लिए विवश नहीं किया जा सकता और स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए सत्याग्रहों के स्थान पर असंख्य बलिदानों की जरूरत है तब वह भी कांग्रेस का साथ छोड़कर अपने अलग मार्ग पर चल पड़े. इसी संदर्भ में उन्होंने साथी भारतीयों से ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का आह्वान किया था.उनके इस आह्वान ने भारतीय युवाओं को प्रेरित किया और वे आजाद हिंद फौज के रुप में एकजुट हुए. 20वीं सदी के प्रारंभिक भाग में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे शीर्ष नेताओं द्वारा समर्थित अहिंसा का सिद्धांत उपमहाद्वीप में जनता की राय को प्रभावित करने के उद्देश्य से किया गया था.इसलिए नेताजी की फाइलों को सार्वजनिक करने से इतिहासकारों को घटनाओं को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी और सच को सामने लाया जा सकेगा. यह निर्धारित करेगा कि क्या 1947 में महज सत्ता का हस्तांतरण हुआ था अथवा सही मायनों में आजादी प्राप्त की गई थी?
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)