लोकतांत्रिक इतिहास में बीते 11 सितंबर को काले दिन के तौर पर देखा जाए तो उसे गलत नहीं कहा जाएगा. देश के कर्मठ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो कि खुद को जनता का प्रधान सेवक साबित करने की कोशिशों में नजर आते हैं के केंद्र शासित क्षेत्र चंडीगढ़ के दौरे पर श्मशान घाट को बंद कर दिया जाता है. स्कूलों-कॉलेजों में अवकाश घोषित कर दिया जाता है. उनकी राह में आने वाले सेक्टरों की दुकानें जबरन बंद करा दी जाती हैं. लोगों को दुकानों के आगे खड़े होने तक की इजाजत नहीं होती है.

केंद्र शासित प्रशासन इस तरह का माहौल उत्पन्न करता है कि जैसे शहर में इमरजेंसी घोषित कर दी गई है और आपात हालत के कारण करफ्यू लगा दिया गया है. छह-सात घंटे शहर एक दमघोटू नजरबंदी के माहौल में होता है. यह ऐसा शहर जो अपने जन्म से ही स्मार्ट बना था. जहां की मुख्य सड़कों से दो-तीन सौ मीटर दूर दुकानें, घर और दफ्तर बनाने का प्रावधान पहले से ही है. मुख्य सड़कों की ओर किसी भी घर-दुकान का दरवाजा नहीं होता है. यहां का हाईकोर्ट और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं शहर को ‘पीसफुल सिटी’ का दर्जा दे चुकी हैं.

 

ऐसे शहर में देश के प्रधान सेवक के आने पर इस तरह के तुगलकी फरमान निश्चित रूप से दुखद क्षण रहे. एक पत्रकार मित्र के बुजुर्ग पिता को सिर्फ इसलिए घर से उठा लिया गया क्योंकि, शक था कि वह कांग्रेसी हैं. पुलिस ने करीब दो सौ कांग्रेसियों को रातोंरात घरों से ऐसे उठा लिया, जैसे वो आतंकवादी हों, जबकि सभी जानते हैं कि चंडीगढ़ के राजनीतिज्ञ प्रदर्शन भी शालीनता से करते हैं. केंद्र शासित प्रशासन की इस हरकत ने तो अंग्रेजी हुकूमत को भी मात दे दी.

शहर के बाशिंदों के मुंह से तो सिर्फ यही सुनने को मिला कि यह प्रधान सेवक का नहीं किसी तानाशाह का शहर दौरा था. हमारा मानना है कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संवेदनशील व्यक्ति हैं. वह निम्न वर्ग से यहां तक पहुंचे हैं तो वह उनके दर्द से वाकिफ हैं. हमने प्रशासन की इस तानाशाहीपूर्ण रवैये को लेकर ट्विीट किया, करीब 13 घंटे बाद उन्होंने ट्विीट कर इस पर अफसोस जताया और जांच का आदेश दिया. हमें पता है कि इस जांच का कोई नतीजा नहीं निकलेगा और किसी छोटे अधिकारी की गर्दन को कुछ दिनों के लिए दबा कर फाइल बंद कर दी जाएगी. इसका वाजिब कारण यह है कि  पीएम की इस सरकारी यात्रा को असल में उनकी पार्टी के पदाधिकारियों के निर्देश पर प्रशासन ने तैयार किया था. पदाधिकारी आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को निर्देश दे रहे थे. अफसरशाही पहले ही खुद को वीआईपी समझती है तो वह पीएम के लिए कोई भी ड्रामा करने से कैसे चूकती. 

 

नतीजा सभी के सामने है कि ‘पार्थिव शरीरों’ को श्मशान के पास तक लाकर वापस ले जाना पड़ा क्योंकि उनको रास्ता ही नहीं दिया गया. हमने पंडित जवाहर लाल नेहरू को भी देखा है. वह जब निकलते थे तो सड़क के किनारे खड़े नागरिकों का अभिवादन भी स्वीकारते और कहीं भी गाड़ी रुकवाकर उनसे मिलते थे. लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी में भी यह बात देखने को मिली. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कुछ सख्ती हुई मगर राजीव गांधी भी अपनी हर यात्रा में अचानक आमजन के बीच जाकर उनसे मिलते थे. उनकी हत्या के बाद कुछ और सख्ती हुई मगर इतनी भी नहीं कि लोगों की राह रोक दी जाए, मुर्दों को श्मशान तक न जाने दिया जाए. स्कूल-कालेजों में अवकाश घोषित कर दिया जाए. मरीजों और उनके तीमारदारों को कैद कर दिया जाए. यही नहीं जबरन दुकानें-बाजार बंद करवा दिए जाएं.

हम स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के काफिले के साथ मोटर साइकिल से लखनऊ में घूमते रहे हैं. ऐसा पहली बार देखा तो लगा कि शायद हम लोकतांत्रिक देश में नहीं रहते और लोकतंत्र नहीं बल्कि नए तरह का राजतंत्र विकसित हो चुका है. यहां एक राजा और उसका तंत्र है तो दूसरी तरफ शासित जनता और दोनों के बीच अफसरों-पुलिस वालों की दीवार है. अगर यही लोकतंत्र और लोकतंत्र के सबसे अहम पद पर बैठे व्यक्ति की व्यवस्था है तो हमें बेहद अफसोस है, इस व्यवस्था पर और लोकतंत्र हमारे लिए कलंक. कलंक पोछने के लिए जांच के ड्रामें, हमारा उपहास उड़ाते हैं. अब हम दूसरे विषय पर आते हैं. माना जाता है सही राजनीति से ही पुख्ता और समृद्ध अर्थनीति बनती है. जब देश की राजनीति दिशाहीन होती है तो अर्थनीति भी तबाही की ओर चल देती है.

हमारे देश के आर्थिक सलाहकार, दुनिया के जाने माने अर्थशास्त्री, कौशिक बसु ने स्पष्ट कहा है कि राजनीतिक अनिर्णय के कारण अर्थनीति संकट में है. आम समझ का व्यक्ति भी जब तुलनात्मक रूप से देखता है तो पाता है कि अटल बिहारी की एनडीए के 2004 तक के हालात, उसके बाद मनमोहन की यूपीए का पहला, दूसरा दौर, और अब मोदी की भाजपा सरकार की अर्थनीति रचनात्मक फैसलों के अभाव में फंसी हुई है. महंगाई की हालत, रुपया बनाम डॉलर, कुकिंग गैस की उपलब्धता और मूल्य, पेट्रोल-डीजल के भाव के हिसाब से, आर्थिक विकास की दृष्टि से, रोजगार सृजन की दृष्टि से, सड़क निर्माण की तुलना करके हम दुखद हालातों से रू-ब-रू होते हैं. नतीजा यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार से जो अपेक्षाएं की गर्इं थीं, वह अभी तक सिर्फ हवा में हैं. निरंकुश राजनीतिक अधिकार, लाल बत्ती संस्कृति और कर्तव्य शून्यता? यही   तो मिला है अब तक हमें. बड़ों की सुरक्षा और वीआईपी संस्कृति के बोझ में आमजन इतना दब गया है कि उसे मुर्दे का अंतिम संस्कार करने की भी इजाजत नहीं मिल रही है.

रोजगार घट गए हैं और रेल- सड़क और दूसरी यात्राएं असुरक्षित हो गई हैं. पुलिस वीआईपी की घरेलू नौकरानी बनकर रह गई है. क्रिकेट मैच खुलेआम अपसंस्कृति फैला रहे हैं और हमारे मंत्री-संसदों में इनसे कोई बेचैन बल्कि मस्ती आ रही है. उन्हें सिर्फ लाल बत्ती चाहिए और अफसरों को निरंकुश अधिकार चाहिए, बिना किसी जवाबदेही के. आखिर किसलिए, लोकतंत्र बनाने वाली जनता के लिए या अपने हित साधने के लिए? बीते सप्ताह हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र और देश की धार्मिक सांस्कृतिक नगरी वाराणसी जाने का अवसर मिला. प्रदेश की राजधानी लखनऊ से दो रास्ते हैं एक एनएच-24बी और दूसरा एनएच-231 हमने जाने में पहला और आने में दूसरा रास्ता तय किया. इन राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलने के दौरान लगा कि हम किस गांव की सड़क पर आ गए हैं. दुख इस बात का था कि विकास करने का नारा देते न थकने वाले पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय की राह इतनी दुर्लभ है जैसे बीहड़ों की. इसके बाद सबसे ज्यादा दुख तब हुआ जब ‘क्यूटो’ शहर के मॉडल पर वाराणसी को बनाने की बात करने वाले प्रधानमंत्री के संसदीय कार्यालय रविंदरपुरी मार्ग की हालत और गंदगी देखकर शर्म से सिर झुक गया.

 

हमने लंका, नवादा, रमन मार्ग, अस्सी घाट मार्ग, डीएलडब्ल्यू, सामने घाट की सड़कें और गंदगी देखी तो बेहद दुख हुआ. हम जब काशी विश्वनाथ मंदिर, दशाश्वमेव घाट और मैदागिनि होते हुए वाराणसी कैंट, रेलवे स्टेशन से बाबतपुर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक पहुंचे तो हमें शर्म आ रही थी कि हम उस नगरी में हैं जो हमारी सांस्कृतिक विरासत को संभालती है और जिसने देश को प्रधानमंत्री दिया है. यहां का मेयर, दोनों विधायक, जिला योजना कमेटी के चेयरमैन और सांसद भाजपा के ही हैं. इसके बाद यह हालात निश्चित रूप से देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण हैं. वाराणसी के लोग अब तो यह कहने लगे हैं कि हमसे बड़ी भूल हो गई अपना प्रतिनिधि चुनने में. 

 

मोदी जी, हमने आपको भरपूर जोश और विश्वास के साथ वोट दिया था. हमने आपको प्रधानमंत्री बनाने और पूर्ण बहुमत वाली सरकार का जनादेश दिया था कि आप उस कुव्यवस्था को बदलेंगे जो पिछली सरकारों में पनपी है. हमने आपसे उम्मीद की थी कि आप सच्चे लोक प्रतिनिधि बनेंगे न कि राजसत्ता के प्रतिनिधि बनकर वीआईपी कल्चर को बढ़ाएंगे. हमने आपसे विकास और संतुलित अर्थव्यवस्था की उम्मीद की थी. हमने योजनाओं के सिर्फ नामकरण करने के लिए आपको नहीं चुना बल्कि वास्तविक कार्यों के लिए चुना है जिससे आमजन राहत महसूस करे.

 

हमने आपको चोरी रोकने के लिए पहरेदार बनाया था न कि हमारी पॉकेटमारी के लिए. हमने आपको वीआईपी की सुरक्षा को सख्त बनाने के लिए नहीं बल्कि अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संसद भेजा था. हमने आपसे भ्रष्टाचार मुक्त-सुशासन की अपेक्षा की थी न कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली ब्यूरोक्रेसी में वृद्धि करने के लिए. हमने बिल्डरों के प्रॉफिट वाली नीतियों को खत्म करके आमजन को घर मुहैया कराने और महंगाई से निजात दिलाने वाले मोदी को पीएम बनाया था न कि कॉरपोरेट स्टाइल में जीने वाले नेता को. आप आत्ममंथन कीजिए और स्वयं किए गए वायदों का मनन कीजिए. आप पर यकीन करने वाली जनता के साथ हो रहे धोखे को रोकिए और सही दिशा में कदम बढ़ाइए, न कि सिर्फ पब्लिीसिटी इवेंट्स की ओर. 
   

जय हिंद! 

 

(यह लेखक के निजी विचार हैं )