प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अत्यधिक केंद्रीकरण का दोषी ठहराया गया है. आंकड़े दर्शाते हैं कि नरेंद्र मोदी ने कार्यभार ग्रहण करने के बाद से अपने पार्टी व सरकार के साथियों को शायद आवश्यकता से अधिक आजादी दे दी है और शायद इसी कारण 19वीं सदी के प्रशासनिक तंत्र से 21वीं सदी की सरकार बनाने का प्रधानमंत्री का उद्यम आशानुरूप गति नहीं पकड़ पा रहा है. उदाहरण के लिए, एक ऐसे युग में जहां केवल 100 दिन में ही व्यापक परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं, कानून मंत्रालय बेहद धीमी गति से कानूनी पुस्तकों को ऐसे औपनिवेशिक युगीन मातमों से छुटकारा दिला रहा है जिनमें से अधिकांश कानून एक सदी से भी पुराने हैं. दूरसंचार मंत्रालय शुरुआत में विषाक्त सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2005 के समर्थन में आया था.
 
 
 
कर, विनियम और ब्याज दरों का ऊंचा रहना जारी था, जबकि सेवाओं के वितरण द्वारा अभी भी 7-रेसकोर्स रोड के नए अधिभोगी का प्रभाव दिखाना बाकी है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि देश की विकास दर क्षमता के अनुरूप गति नहीं पकड़ पा रही है क्योंकि नौकरशाही के आदेशों की अनुपालना द्वारा अनिवार्य बनाए गए अतिरिक्त कर खर्चों व कागजी कार्रवाई के बोझ तले दबा कर सेवा क्षेत्र भी धीमा पड़ गया है. नौकरशाही के ऐसे असंगत व अनावश्यक नियमों ने भारत में गरीबों की संख्या में कमी आने के बजाय बढ़ोतरी को सुनिश्चित किया है. 
 
 
  जन्म-दरों में पर्याप्त रूप से कमी न आने के साथ रोजगार के तेजी से न बढ़ने से युवा वर्ग में हताशा बढ़ती ही जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप वे पैसा कमाने के लिए आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होने लगे हैं. फिरौती, अपहरण, लूट इत्यादि के आपराधिक मामलों में ज्यादातर शिक्षित युवा लिप्त हैं. सुनने में आया है कि गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के लिए परेशानी का सबब बन चुके हार्दिक पटेल ने कई रोजगार वेबसाइटों पर नौकरी के लिए आवेदन किया था. बार-बार प्रयास करने के बाद भी जब हार्दिक पटेल को सफलता नहीं मिली तब उसने फैसला किया कि आरक्षण और कोटा ही उसके समुदाय के लिए नौकरी पाने का एकमात्र तरीका है. गुजरात में केवल एक हार्दिक पटेल नहीं है, देशभर में ऐसे कई लाखों हार्दिक पटेल हो सकते हैं जो समय आने पर राज्य की शांति व कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकते हैं. 
 
 
 
नरेंद्र मोदी के कुछ समर्थक यह मूखर्तापूर्ण दावा करते हैं कि नौकरियों में भारी वृद्धि केवल नरेंद्र मोदी के ‘दूसरे कार्यकाल’ में आएगी. वे भूल जाते हैं कि अगर मौजूदा सरकार ने 2014 चुनावी अभियान के दौरान किए गए वायदे पूरे नहीं किए तो शायद मोदी का दूसरा कार्यकाल आए ही ना. लोकलुभावनवाद किसी समस्या का उत्तर नहीं है और न ही यह वोट बैंकों को आकर्षित करेगा, नहीं तो गत वर्ष कांग्रेस की झोली में 44 के बजाय 300 सीटें गिरतीं. मतदाता सुधार-कार्यों की प्रशंसा करते हैं, बशर्ते सुधार प्रक्रियाओं को शुरू करने में अधिक देर न लगे. 
 
 
मोदी सरकार के लिए इसका अर्थ है उसके कार्यकाल के प्रारंभिक दो वर्ष. व्यवसायियों और मंत्रियों की परिषद के बीच बैठकों के बजाय संसद के जरिए जीएसटी एवं भूमि विधेयक पारित कराने से विदेशी व घरेलू निवेश को अधिक प्रोत्साहन मिलता. यह व्यवसायी नहीं बल्कि सरकार है जिसे ‘उचित समय की प्रतीक्षा’ करने के बजाय परिवर्तनात्मक नीतियों को लागू करके ‘जोखिम’ लेने की जरूरत है. नीतियों को लागू करने में किया गया विलंब उनके कार्यान्वयन को सफल होने के लिए कम समय प्रदान करता है जिससे उसके अप्रभावी सिद्ध होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. 
 
 
 
  मोदी के निंदक सरकार की हर चूक का ठीकरा प्रधानमंत्री के सिर पर फोड़ते हैं जबकि सच्चाई यह है कि नरेंद्र मोदी जैसे 21वीं सदी के नेता द्वारा केवल एक विशेष समुदाय (जैन) के त्यौहार के दौरान मीट पर प्रतिबंध लगाने जैसे विचारों की पहल करने का सवाल ही नहीं पैदा होता. नागरिकों की व्यक्तिगत पसंद में ऐसे अस्वीकार्य व अनुचित हस्तक्षेप जैन समुदाय को प्रोत्साहित करने के बजाय अन्य समुदायों में जैनियों के प्रति क्रोध को भड़काएंगे, जबकि सच्चाई यह है कि मीट प्रतिबंध में स्वयं जैनियों का इतना बड़ा हाथ नहीं है.
 
 
 
आत्मसंयम व शाकाहारवाद वास्तव में प्रशंसनीय है लेकिन इसे प्रशासकीय आदेशों के बजाय नागरिकों की इच्छा से आरंभ किया जाना चाहिए. भाजपा द्वारा ऐसे मध्ययुगीन उपायों का सहारा लेने के साथ, शिवसेना भी इसकी तुलना में अधिक आधुनिक और 21वीं सदी की पार्टी दिखाई पड़ती है.  आशा करते हैं कि अदालतों द्वारा जल्दी ही इस गलती को सुधारा जाएगा. 
 
 
ऐसे समय में जब सरकार का ध्यान राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तरों पर रोजगार सृजन पर होना चाहिए ताकि देश के युवाओं में बढ़ते असंतोष को कम किया जा सके, प्रशासनिक आदेशों अथवा कानूनों में फेरबदल के माध्यम से नागरिकों के जीवनशैली विकल्पों को बदलने के प्रयास किए जाने से बचा जा सकता है.   भारतीय माइक्रोसॉफ्ट अथवा गूगल सुनिश्चित करने के लिए देशभर में स्वतंत्रता और नवीनता की संस्कृति को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है. इस विचार से शायद वे लोग सहमत न हों जो 21वीं सदी के भारत में 18वीं सदी के कानून लागू करना चाहते हैं अथवा जिन्होंने अपने हितों की पूर्ति के लिए सरकार द्वारा प्रदत्त  अधिकतम अधिकारों का जमकर दुरुपयोग किया है, लेकिन असंतोष प्रेरित अराजकता से बचने का यही एकमात्र तरीका है.
 
 
प्रधानमंत्री को आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि भाजपा व सरकार ऐसे ढंग से काम करें जिस तरीके से वह चाहते हैं और जो 21वीं सदी के अनुकूल हो. देश के विभिन्न हिस्सों में अनगिनत हार्दिक पटेल सड़कों पर उतरने से पहले रोजगार क्षेत्र में पर्याप्त अवसर देने के वायदे को पूरा करने के लिए सरकार को अधिक समय नहीं देंगे.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं)