हर देश के लिए अपने इतिहास से परिचित होना आवश्यक है. भारतीय अतीत के प्रति आसक्त हैं, यह देखते हुए कि मध्यम वर्ग इतिहास के औपचारिक अध्ययन का आमतौर पर तिरस्कार करता है, यह वास्तव में एक विडंबना है. राजधानी में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की स्मृति में औरंगजेब मार्ग के पुनर्नामकरण को लेकर अखबारों और मीडिया में देश के आमजन से लेकर लोकप्रिय शख्सियतों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए हैं. इतिहास के बजाय इंजीनियरिंग के लिए देश की मजबूत प्राथमिकता को देखते हुए हमें पुरानी सड़कों के पुनर्नामकरण की तुलना में नई सड़कें बिछाने व पुरानी सड़कों के मरम्मत कार्यों से अधिक सक्रिय व उत्तेजित होना चाहिए. लेकिन सच्चाई यह है कि लोकप्रिय चेतना में भारत का अतीत भारत के भविष्य की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है. भारत जैसे युवा राष्ट्र के लिए यह एक अनोखी घटना है, जहां जनसंख्या के दो तिहाई भाग का जन्म 1980 के बाद हुआ है. अपने इतिहास के इस पड़ाव पर भारत पर भविष्य के खाली पन्नों के बारे में दक्षतापूर्वक लिखने की धुन सवार होनी चाहिए, लेकिन यह आज भी अपने कोलाहलपूर्ण इतिहास की निरंतर रूप से पुनर्व्याख्या और पुनर्लेखन करने की जिद पर अड़ा हुआ है जिसके लिए अधिकांश भारतीयों के पास आवश्यक विशेषज्ञता नहीं है. 
 
औरंगजेब मार्ग के पुनर्नामकरण पर कुछ राजनीतिक हलकों ने सफलता का जश्न मनाया. आखिरकार क्या औरंगजेब वही मुगल शासक नहीं था जिसने क्रूर रणनीति और भीषण परिणामों के साथ भारत पर इस्लाम का अपना संस्करण थोपने के लिए परम प्रयास किए? इसलिए आधुनिक भारत में उसका जिक्र तक नहीं होना चाहिए. औरों के लिए, यह हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा किया गया संशोधनवाद का एक नग्न कृत्य था जिनके लिए संस्कृतनिष्ठ कलाम औरंगजेब की तुलना में एक बेहतर मुस्लिम रोल मॉडल हैं. मैं यह समझने में असमर्थ हूं कि एक सड़क का नाम बदलने से क्या कोई फर्क पड़ सकता है. सच कहूं तो अधिकांश दिल्लीवासी औरंगजेब मार्ग को 21वीं सदी के दिल्ली की अपार दौलत व शक्ति के साथ तत्काल ही संबद्ध करते हैं, देश के शीर्ष उद्योगपति और प्रमुख नेता और नौकरशाह इस हरे-भरे मार्ग पर स्थित महलनुमा घरों में रहते हैं. अब निकट भविष्य में भी एपीजे अब्दुल कलाम मार्ग को शक्ति और दौलत की उसी छवि के साथ संबद्ध किया जाएगा, लेकिन अब्दुल कलाम बेहद सरल जीवन जीते थे जिसमें धन और शक्ति को नगण्य प्राथमिकता दी जाती थी. पुनर्नामकरण से अगर कुछ हासिल हुआ है तो वह है केवल व्यक्तिगत एवं सांप्रदायिक पक्षपात और इतिहास व वर्तमान के व्यंग्य चित्र. इतिहास का अध्ययन करने के लिए और यहां तक कि उसे फिर से लिखने के लिए भी एक स्थान होता है, लेकिन भारतीय शहरों के सड़क संकेतकों के नाम बदलकर इतिहास के साथ छेड़छाड़ किए जाने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए. औरंगजेब ने कई निर्मम कृत्य किए, लेकिन हम उसे भारतीय इतिहास से मिटा नहीं सकते. संभावनाएं यही हैं कि अधिकांश भारतीयों को उनके अतीत के शासकों में खामियां दिखेंगी चाहे वो मुस्लिम शासक हो, हिंदू अथवा अंग्रेज शासक. जरा देखिए यह देश भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के महज 50 वर्ष बाद ही उनकी नीतियों की कितनी आलोचना करता है. नेहरू की आर्थिक नीतियों ने शायद भारत को क्षति पहुंचाई हो, लेकिन उन्हें इतिहास से मिटाने का प्रयास करना कोई समझदारी का परिचय नहीं है.
 
इतिहास सदा से अच्छे एवं बुरे का मिश्रण होता आया है और अगर हम कष्टमय और त्रासद भाग को समझने का प्रयास नहीं करेंगे तो हम अपने वर्तमान को उचित तरीके से समझ नहीं पाएंगे. क्या यह उचित समय नहीं है कि हम अपने भविष्य को लेकर भी उसी तरह वाद-विवाद करें जैसे हम अतीत को लेकर करते हैं? देश को उसके कोलाहलपूर्ण और कुछ हद तक कष्टमय अतीत से मुक्ति दिलाने का यही एकमात्र तरीका है.