आप चाहे इस सच्चाई को स्वीकार करें या ना करें, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी आसानी से न कुछ भूलते हैं और न ही क्षमा करते हैं. बीते 16 महीने के दौरान उनके निश्चयात्मक कार्यों और सक्रिय नीतियों ने सिद्ध कर दिया है कि उन्होंने अक्षम समझे जाने वाले, राजनीति से प्रेरित और उनके लक्ष्य की प्राप्ति के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करने वाले लोगों को क्षमा नहीं किया है. प्रधानमंत्री ने अपने मार्ग से उनका सफाया किया है. तब भी प्रधानमंत्री व उनके सहयोगी वर्ष 2014 चुनावी अभियान में उनके द्वारा जनता से किए गए वायदों को भूल गए हैं. हो सकता है यह उनकी ओर से बरती गई असावधानी हो या फिर प्रधानमंत्री अपने कई मंत्रियों और सिविल सेवकों पर आवश्यकता से अधिक भरोसा करते हैं.  नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनावी अभियान में अपने लक्षित दर्शकों का बुद्धिमानी से चयन किया था जिनमें किसान, राष्ट्रवादी, छात्र, मध्यम वर्ग, व्यावसायिक समुदाय, सेवानिवृत्त सैनिकों और कंपनियों को चुना था.उन्होंने प्रत्येक वर्ग की समस्याओं पर चर्चा की थी और सत्ता में आने के बाद उनका हल ढूंढ़ने का संकल्प लिया था, लेकिन मोदी के सत्ता ग्रहण करने के 16 महीने बाद, जिन समूहों ने मोदी को विजयी बनाने का जिम्मा उठाया था वही आज विश्वास के अभाव का सामना कर रहे हैं. वे आज महसूस कर रहे हैं कि राजग सरकार उनकी समस्याओं को प्राथमिकता नहीं दे रही. करीब तीन लाख सेवानिवृत्त सैनिक और शहीद हुए सैनिकों की विधवाएं सबसे अधिक परेशान हैं जिन्हें पूरा भरोसा था कि ‘वन रैंक वन पेंशन’ की 40 साल पुरानी मांग सरकार द्वारा स्वीकार कर ली जाएगी.
 
नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के रेवाड़ी शहर से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की थी जहां उन्होंने रक्षा दिग्गजों की विशाल रैली को संबोधित करते हुए ‘वन रैंक वन पेंशन’ की उनकी वैध मांग को पूरा करने का आश्वासन दिया था. पिछले वर्ष, प्रधानमंत्री से लेकर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह व विभिन्न भाजपा मंत्रियों तक ने इसे लागू करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया. इसके क्रियान्वयन के विलंब ने सेवानिवृत्त सैनिकों को जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन पर जाने के लिए विवश किया. ‘वन रैंक वन पेंशन’ से संबंधित वित्तीय बाधाओं को लेकर कैबिनेट मंत्रियों द्वारा बनाए जा रहे बहानों ने उन्हें सबसे ज्यादा क्रोधित किया. भारत के रक्षा कर्मी सोच रहे थे कि जो सरकार विदेशी निवेश संस्थानों को आकर्षित करने के लिए 40 हजार करोड़ रुपए त्यागने को तैयार है, क्या उसी सरकार के पास उन जांबाजों पर खर्च करने के लिए अतिरिक्त 8000-10000 करोड़ रुपए नहीं हैं जिन्होंने देश की रक्षा की खातिर अपनी जान दांव पर लगा दी. उन्हें लगा कि नॉर्थ ब्लॉक ने ‘वन रैंक वन पेंशन’ के वित्तीय प्रभाव को लेकर प्रधानमंत्री को गुमराह किया है. इसके क्रियान्वयन पर आगे बढ़ने के प्रधानमंत्री के निर्देशों के बावजूद नौकरशाहों द्वारा इसमें बाधाएं डालने को लेकर सैन्यकर्मी खासे नाराज थे. अंतत: यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के समझदार तत्वों के संयुक्त प्रयास थे जिन्होंने मुद्दे का समाधान करने के लिए सरकार पर दबाव डाला. जब सरकार ने इसे कार्यान्वित करने का निर्णय लिया तब इसने सरकार की उदारता को प्रतिबिंबित नहीं किया. सेवानिवृत्त सैनिकों के अतिरिक्त भारत का युवा वर्ग भी सरकार के प्रति नाराजगी की भावनाएं जाहिर कर रहा है.अधिक रोजगार के अवसर पैदा करने का नरेंद्र मोदी का वायदा अभी तक केवल वायदा ही बन कर रह गया है और युवाओं में असंतोष बढ़ता जा रहा है. वहीं दूसरी ओर पुणे स्थित भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के घटिया संचालन ने मोदी के सबसे प्रबल बॉलीवुड समर्थकों को भी दुखी कर दिया.प्रधानमंत्री राष्ट्रीय रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से छात्रों और युवा वर्ग को संबोधित करते आ रहे हैं, लेकिन यह प्रयोग जमीनी स्तर पर व्यावहारिक कार्रवाई में परिवर्तित नहीं हो रहे हैं. इस देश के मोबाइल धारकों में 50 फीसदी से भी अधिक मोबाइलों का इस्तेमाल युवा वर्ग द्वारा किया जाता है. वे लगातार कॉल कटने से परेशान हैं, जिसके कारण उनकी जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है. दूरसंचार मंत्रालय की नींद तभी खुली जब प्रधानमंत्री मोदी को इस समस्या के कारण उनकी सरकार की छवि को होने वाली क्षति का आभास हुआ. इसके बाद, नागरिक उड्डयन मंत्रालय हवाई कंपनियों द्वारा लगाए जा रहे आवश्यकता से अधिक और मनमाने किराए से पूरी तरह अंजान बना हुआ है. इसके कारण सबसे अधिक कष्ट मध्यम वर्ग को हो रहा है जो नरेंद्र मोदी का सबसे मजबूत समर्थक वर्ग है. अंतत: मोदी ने हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया, लेकिन शायद ही उनके हस्तक्षेप से वांछित परिणाम पाए जा सकें क्योंकि मंत्रालय के अधिकारियों ने हमेशा हवाई कंपनियों के मालिकों का पक्ष लिया है.
 
जब युवा और मध्यम वर्ग नरेंद्र मोदी के युग में उपयोगी भविष्य को लेकर झल्लाए हुए हैं, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भीषण सूखे के कारण भारतीय किसान भी उतने ही चिंतित हैं.इससे पहले उन्हें नए कानून के अंतर्गत अपनी भूमि अधिग्रहित होने का भय सता रहा था.कुछ वरिष्ठ मंत्रियों ने भूमि विधेयक को इतने आक्रामक ढंग से प्रोत्साहित किया कि उन्होंने पूरे कृषक समुदाय को विमुख कर दिया. एकबार फिर प्रधानमंत्री ने हस्तक्षेप किया और अपनी घटती लोकप्रियता को और अधिक घटने से बचाया.लेकिन, नरेंद्र मोदी को काला धन वापस लाने के अपने संकल्प और प्रयासों को और अधिक गतिशील करना होगा.लूटे गए धन को वापस लाने की विफलता को लेकर कांग्रेस कभी भी मोदी पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ती.सर्वोच्च न्यायालय सरकार द्वारा इस दिशा में उठाए गए कदमों पर वित्त मंत्रालय से रिपोर्ट मांग रहा है. अर्थव्यवस्था का पुनरुद्धार करने की मोदी सरकार की अक्षमता को लेकर शीर्ष कंपनियों द्वारा दबी जुबान में चलाया जा रहा अभियान सबसे अधिक हैरान करता है.जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) विधेयक पर वित्त मंत्रालय द्वारा कोई सहमति न बना पाने की विफलता ने भारतीय कॉरपोरेट जगत को निराश किया है.वे सबके सामने सरकार की प्रशंसा करते हैं, लेकिन निजी तौर पर वे सामूहिक रूप से नरेंद्र मोदी पर दोष मढ़कर भारत के आर्थिक भविष्य को कोसते हैं.यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नरेंद्र मोदी को उनकी सरकार में औरों की विफलताओं के कारण चौतरफा आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)