एक पुरानी कहावत है कि नाम में क्या रखा है. वास्तव में, नाम में बहुत कुछ रखा है. क्या पता आपको कब अपने नाम पर खरा उतरना पड़ जाए.भारतीय जनता पार्टी, इंडियन नेशनल कांग्रेस या समाजवादी पार्टी अधिकतम उद्देश्यों की न्यनूतम परिभाषाएं हैं. आप शायद सोचें कि सीपीआई(एम) निश्चित रूप से मार्क्सवादी है क्या, लेकिन यह केवल एक नगण्य वाक छल है. इसी तरह, गठबंधन नाम की अस्थिर वास्तविकताओं के लिए भी नामकरण की आवश्यकता पड़ती है. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) दोनों ही प्रयोजन के तर्कसंगत बयान हैं. हाल ही में बिहार में नीतीश कुमार, लालू यादव, सोनिया गांधी, मुलायम सिंह यादव और शरद पवार के बीच जल्दबाजी में बनाए गए ‘महागठबंधन’ की अपूर्णता स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है. यह कुछ जरूरत से ज्यादा ही भव्य गठबंधन था जिसमें प्रमुख राजनीतिक हस्तियों के अहम का टकराव होना तय था. इस महागठबंधन की इतने कृत्रिम अंग थे कि यह कार्य करने में ही असक्षम था. 
 
स्मृति अल्पकालीन होती है लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता. इसकी शुरुआत एक ‘भव्य विलय’ से हुई जो मूल रूप से पुराना ‘जनता परिवार’ था जिसके कुलपति थे मुलायम सिंह यादव. इस भव्य विलय का ऐलान ढोल-नगाड़ों के साथ हुआ और इससे पहले की उन ढोल नगाड़ों की गूंज कम पड़ती, यह ‘महागठबंधन’ एकाएक ढह गया. एक कामचलाऊ विकल्प का प्रस्ताव दिया गया कि वे एकसाथ मिलकर बिहार का चुनाव लडेंगे. उसके बाद लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने सीटों के आबंटन की घोषणा की, दो प्रधान चरित्रों को 100-100 सीटें, शांत बैठी कांग्रेस को 40 सीटें और शेष 3 सीटें किसी भी सहयोगी दल के लिए जो उन पर लड़ने का इच्छुक हो. किसी ने भी मुलायम या पवार से सीटों के आबंटन पर विचार विमर्श करने की जरूरत तक नहीं समझी. बस फिर क्या था, मानो चूहों के बीच बिल्ली को छोड़ दिया गया हो.  यह लेख लिखे जाने के समय तक मुलायम के गुस्से को शांत करने के हरसंभव प्रयास किए जा रहे थे. मुलायम ने कांग्रेस को आबंटित 40 सीटों में से 10 सीटों की मांग की है जो उनकी धूर्त चालाकी का उत्कृष्ट उदाहरण है. देखते हैं कि आगे क्या होता है लेकिन जहां तक मतदाताओं का सवाल है यह संदेश स्पष्ट है कि यह एकता नहीं बल्कि महज कामचलाऊ गठबंधन है जो सत्ता के लोभ में किसी भी क्षण बिखर सकता है. यह सुशासन के लिए स्थिरता नामक बुनियादी आवश्यकता पर खरा नहीं करता. जो लोग चुनावी व्यवहार की दिशा जांचना चाहते हैं उनके लिए पेश हैं कुछ प्रासंगिक संकेतक, सबसे पहले स्थानांतरण पर नजर दौड़ाएं, न ही एकल पार्टी और न ही गठबंधन में सीटों का सही वितरण है. महत्वपूर्ण नेताओं ने ‘महागठबंधन’ की प्रधान पार्टियों से बाहर जाना शुरू कर दिया है. दूसरा, जनमत सर्वेक्षणों पर नजर दौड़ाएं, लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह उन्हें विज्ञापित किया जा रहा है. जनमत सर्वेक्षण मतदाताओं की राय प्रतिबिंबित करने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन इनमें अक्सर विश्लेषकों के पूर्वाग्रह को ही दर्शाया जाता है. लेकिन आपको चुनावी मौसम में हुए कई चुनावों में राजनीतिक दलों के लिए समर्थन के ग्राफ पर ध्यान से गौर करना चाहिए, समय-समय पर उतार-चढ़ाव आ सकते हैं लेकिन उन्हें दर्ज किया जाएगा, एक ओर ऊपरी गतिशीलता होगी तो दूसरी तरफ गिरावट दर्ज की जाएगी, जिस पार्टी का समर्थन ग्राफ ऊपर की ओर जाएगा, अक्सर उसके ही विजयी रहने की संभावना बताई जाती है. 
 
तीसरा, राजनीतिक नेताओं की भाषा पर गौर करें. जो नेता अपना आपा खोने लगते हैं अक्सर वही नेता कड़े मुकाबले से चिंतित नजर आते हैं. नीतीश कुमार एक सार्वजनिक बैठक में खीझे हुए और झगड़ालू नजर आए, उनका यह रूप दिखाने वाला वीडियो सोशल मीडिया में तेजी से फैल गया. मोबाइल कैमरे नाम के खतरनाक आविष्कार ने मुखरने के विकल्प का सफाया ही कर दिया है. चौथा, आंखों पर ध्यान दें. चुनावी रैली में भीड़ का आकार निसंदेह मायने रखता है. मतदाता आमतौर पर विरोधी को चिढ़ाने के लिए नहीं जाते बल्कि वे अपने पसंदीदा राजनीतिज्ञ की हौसला अफजाई करने के लिए जाते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बैठकों में बड़ी संख्या में युवाओं ने भाग लिया, लेकिन यह केवल कहानी का एक भाग है.असली कहानी तो आंखों की भाषा में नजर आती है. उस युवा भीड़ की आंखों में विश्वास की अद्भुत चमक थी. पांचवां, गैर-मामूली आंकड़ों पर ध्यान दें. बेशक, ऐसे विस्तार में जाने के लिए आप को एक राजनीतिक सनकी जैसा होने की आवश्यकता है, लेकिन असली रहस्योद्घाटन तो यहीं हैत उन निर्वाचन क्षेत्रों पर नजर दौड़ाएं जहां अतीत में जीत और हार का अंतर 5000 से कम वोटों का रहा हैत केवल एक फीसदी रुझान भी नतीजों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त सिद्ध होगा. जो सीट आप 5000 वोटों के अंतर से हार गए थे, वही सीट आप 3000 हजार वोटों से जीत सकते हैं. छठा, यह केवल प्रत्याशियों के लिए. अपनी जेब पर नजर रखें. बेशक, आपको चुनाव लड़ने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है लेकिन पैसे से चुनाव नहीं जीता जा सकतात जिन प्रत्याशियों पर दबाव है, वे अपने पैसे के दम पर कल्पनाओं के सागर में गोते लगाने लगते हैंत उन्हें लगता है कि वह पैसे से प्रत्येक मतदाता को खरीद लेंगे. लेकिन मतदाता केवल एक दिन की अय्याशी के लिए मतदान नहीं करते, वे एक बेहतर भविष्य के लिए मतदान करते हैं और जी हां, यह जरूर सुनिश्चित कर लीजिए कि आप अपने गठबंधन को एक साधारण नाम दें. 
 
 (यह लेखक के निजी विचार हैं.)