जब कोई व्यक्ति एक ऐसे देश का नेता हो जो लगभग एक सदी पहले तक दुनिया के भूमि-क्षेत्र के महत्वपूर्ण भाग को नियंत्रित करता था, तब भव्यता की कल्पनाओं से खुद को मुक्त करना कठिन हो जाता है. हम में से हर कोई एक बाध्यकारी अच्छे आदमी को जानता है जो तब तक चैन से नहीं बैठता जब तक वह हस्तक्षेपों के माध्यम से हालात बेहतर करने का प्रयास नहीं करता, लेकिन जिससे आमतौर पर अंत में हालात और बदतर हो जाते हैं. चूंकि, उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा में फ्रांस और युनाइटेड किंगडम के इतिहास को अच्छी तरह रट रखा है, उनके लिए जाहिर तौर पर इस भ्रम से मुक्ति पाना कठिन है कि पूर्व उपनिवेश बस्तियों में अब भी प्रभुत्व के वैसे ही स्तर को अमल में लाया जा सकता है. 
 
वर्ष 2011 में, यूरोप की पूर्व उपनिवेशी शक्तियों पर परोपकार करने की सनक सवार थी. परोपकार करने की इस सनकी होड़ में अमेरिका भी शामिल हो गया जिसकी विदेश नीति को वास्तव में हिलेरी क्लिंटन नामक एक ऐसी महिला द्वारा आकार दिया जा रहा था जो शुरू से ही अपने विचारों में अमेरिकी कम और यूरोपीय अधिक थी. हालात बेहतर करने की पुकार का आरंभ सबसे पहले फ्रांसीसी विचारक द्वारा किया गया था जिसने फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी से बंगाजी में लाखों निर्दोष लोगों को बचाने का आह्वान किया था. लेकिन, यह बेहद प्रशंसनीय कार्य पूरा किस प्रकार किया जा सकता था? लीबिया में स्थानीय गोपनीय एजेंटों द्वारा ‘गद्दाफी के लोग’ के रूप में पहचाने गए, लोगों के समूहों पर बमों और मिसाइलों की बौछार करके. सरकोजी पहले से ही इन अफवाहों को झूठा सिद्ध करने के लिए बेहद उत्सुक थे कि उन्होंने मुअम्मर गद्दाफी से महंगे उपहार स्वीकार किए हैं. बस फिर क्या था, सरकोजी के इस परोपकार करने की सनक में हिलेरी क्लिंटन और डेविड कैमरुन भी शामिल हो गए और इन तीनों ने बाकायदा प्राणदंड देने वाली भीड़ की अगुवाई की, जिससे अंतत: उन्होंने अपना मकसद पूरा कर ही लिया. उग्र विद्रोहियों की भीड़ ने मुअम्मर गद्दाफी को पकड़कर मौत के घाट उतार दिया, जिसने कुछ वर्ष पहले ही अपनी सामूहिक विनाश के हथियारों की आपूर्तियों और अपने सैन्य हत्यारों को बेच दिया था. लीबियाई जनता को ‘तानशाही’ से मुक्ति दिलाकर और स्थानीय सरदारों और आतंकी गिरोहों के शासन के माध्यम से ‘लोकतंत्र’ आरंभ करने के बाद, इस परोपकारी तिकड़ी ने सीरिया की ओर कदम बढ़ाए. मकसद वही था, जो दुर्गति लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी ही हुई, बशर असद को भी उसी तरीके से सत्ता से उखाड़ फेंकना.
 
लीबिया में देश की जनजातियों का लगभग एक-चौथाई भाग मुख्य रूप से जातीय कारणों से गद्दाफी को रास्ते से हटाना चाहता था या इसलिए क्योंकि उसे वहाबियों द्वारा धर्मभ्रष्ट तानाशाह के रूप में देखा जाता था. नाटो के लक्षित हमलों के साथ मिलकर ऐसा समर्थन गद्दाफी को पराजित करने के लिए पर्याप्त साबित हुआ, लेकिन सीरिया में सुन्नी जनसंख्या में वहाबियों का अनुपात 15 फीसदी से भी कम था और इस बार अपने सबसे करीबी सहयोगी राष्ट्र पर हमला होने की संभावना से मास्को ने भी तीखे तेवर अपना लिए और इस परोपकारी त्रिमूर्ति पर गरजने के लिए तैयार होने लगा. मास्को को कतई गवारा नहीं था कि उसके करीबी मित्र के स्थान पर एक ऐसे गुमनाम शख्स को प्रतिष्ठित किया जाए जो लगभग आधा दर्जन खुफिया एजेंसियों द्वारा नियुक्त किया जाना था और जिसका एकमात्र धर्म इन एजेंसियों के इशारे पर नाचना था. यह लड़ाई शुरु से ही उन कट्टरपंथियों द्वारा लड़ी जा रही थी जो असद को केवल इसलिए सत्ता से बेदखल करना चाहते थे क्योंकि असद एक ‘अलावी’ मुसलमान था, एक ऐसा धर्म जिसे सीरिया में वहाबियों द्वारा उतनी ही घृणा के साथ देखा जाता है जितना पाकिस्तान में ‘अहमदियों’ को. इन कट्टरपंथियों को तुर्की, फ्रांस, सऊदी अरब और कतर की देखरेख में धन, हथियार और प्रशिक्षण दिया जाता था और एक वर्ष के समय में इन कट्टरपंथियों ने ‘आईएसआईएस’ का रूप ले लिया. 
 
ऐसा नहीं है कि इस परिवर्तन का पूर्वानुमान नहीं लगाया गया था लेकिन क्लिंटन-सरकोजी-कैमरून की तिकड़ी ने इस संभावना पर गौर करने की जरूरत नहीं समझी कि वे कट्टरपंथियों को जिन हथियारों की आपूर्ति कर रहे हैं, उन्हीं हथियारों का मुंह एक दिन शायद उनके दानकर्ताओं की ओर ही मुड़ जाएगा. जल्दी ही सीरिया भी गैर-कट्टरपंथियों के लिए लीबिया जितना ही असुरक्षित बन गया था. जिस समय मुअम्मर गद्दाफी को बलपूर्वक सत्ता से निष्कासित किया गया उस समय वह अमेरिका, फ्रांस और यूके के सुरक्षा हितों को ‘शून्य’ चुनौती पेश कर रहा था. लीबियाई तानाशाह का बलपूर्वक निष्कासन बशर असद के साथ भी वैसा ही व्यवहार करने की प्रेरणा बना जिससे परिणामों की श्रृंखला की एक ऐसी शुरुआत हुई जिनका अंत यूरोप के पश्चिमी भाग में लाशों के ढेर के साथ हो रहा है. ऐसी हर मौत इनके द्वारा लिए गए फैसलों का नतीजा है, लेकिन नाटो गठबंधन के सदस्यों को मानव अधिकारों के उल्लंघन का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, सारा दोष ‘मानव तस्करों’ के सिर पर मढ़ दिया गया है. आज इन देशों में अराजकता का माहौल बन गया है? 
 
डेविड कैमरून को लेकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानव अधिकारों को बढ़ावा देने के लिए मिसाइलों और बमों का साधन के रूप में इस्तेमाल करने की उनकी क्षुधा कुछ शांत हो गई है. जहां तक हिलेरी क्लिंटन का सवाल है उनका एकमात्र मकसद उनके पति द्वारा रिक्त किए गए व्हाइट हाउस कार्यालय का वैध अधिभोगी बनना है. कैमरुन और सरकोजी की ही तरह, हिलेरी क्लिंटन के पास भी ऐसे फैसले लेने के लिए ‘007’ लाइसेंस है जो बिना किसी प्रकट परिणामों के मानव जीवन की भयावह क्षति का कारण बनते हैं. वर्ष 2017 के आते-आते, पेरिस, लंदन और वाशिंगटन के परोपकारियों द्वारा ‘सुधारे गए’ स्थानों से 30 लाख से भी अधिक लोगों की यूरोप के अन्य देशों में पलायन करने की प्रबल संभावना है और व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो समय बीतने के साथ-साथ यह लोग यूरोपीय संघ के अंतर्गत आने वाले देशों के स्थायी निवासी बन जाएंगे. शायद इस ‘परोपकारी’ तिकड़ी की यही मंशा थी कि यूरोप में जनसंख्या गिरावट को फिर से उठाना और उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया से आए युवाओं के साथ इस महाद्वीप को आबाद करना. 
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)