एक पुरानी कहावत है कि शत्रु का शत्रु मित्र होता है. इसलिए, वे अनोखे राजनीतिक साथी बनते हैं. पहली नजर में देखने पर 22 वर्षीय हार्दिक पटेल, अरविंद केजरीवाल और नीतीश कुमार में शायद ही कोई समानता देखने को मिले. यह तीनों विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं. पटेल, केजरीवाल और नीतीश शैक्षिक और सांस्कृतिक रूप से असंगत हैं, लेकिन जब बात शैली और अर्थ की हो तो यह तीनों एक ही नाव पर सवार हैं. चाहे जातीय भेदभाव के खिलाफ लड़ाई हो अथवा भ्रष्टाचार के खिलाफ, यह तीनों आंदोलनात्मक राजनीति का प्रतिफल हैं. वे अपने राजनीतिक सिद्धांत में सुस्पष्ट ढंग से महत्वाकांक्षी और सहज रूप से व्यक्तिपरक हैं. इन तीनों का लक्ष्य भी एक है और वो है नरेंद्र मोदी को नीचे लाना.
 
 
 
‘आरक्षण योद्धा’ पटेल गुजरात की भाजपा सरकार पर किसी बुरे अभिशाप की तरह बरसे और मोदी को प्रधानमंत्री पद तक ले जाने वाले गुजरात मॉडल ऑफ गवर्नेंस की जड़ों पर तीक्ष्ण प्रहार किया. यह मोदी ही थे जिन्होंने धर्मनिरपेक्षतावादियों के वैकल्पिक प्रधानमंत्री बनने के नीतीश के सपने को चकनाचूर कर दिया था. केजरीवाल के संरक्षक पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि उनमें राष्ट्र का नेतृत्व करने के लिए आवश्यक गुण हैं. इस त्रिमूर्ति का उदय और चुंबकीय ताकत न केवल राजग सरकार के कुछ अच्छी तरह से प्रचारित फैसलों पर से ध्यान हटा रही है, बल्कि विभिन्न राज्यों में स्थानीय भाजपा नेतृत्व के लोक समर्थन में आई कमी की ओर भी संकेत करती है. 
 
 
शेष दो राजनीतिज्ञों की तुलना में हार्दिक पटेल अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं. वैश्विक राजनीति में बिरले ही देखने को मिलता है कि एक 22 वर्षीय नौसखिए ने गुजरात जैसे संपन्न व शक्तिशाली राज्य के हाथ खड़े करा दिए हों और समूचे राष्ट्र में चर्चा का विषय बन गया हो. पटेल विभिन्न राजनीतिक रैलियों में भाग लेने वाला एक आम सदस्य था जिसके पास न ही वित्तीय अथवा न ही राजनीतिक समर्थन था. पटेल और केजरीवाल का कद एकसमान है, लेकिन पटेल ने नई ऊंचाइयों को छूने के लिए, विरोध प्रदर्शन आयोजित करने के लिए आम आदमी पार्टी प्रमुख को अपने रोल मॉडल के रूप में चुना.
 
 
पटेल ने गुजरात में 14 लाख समर्थकों के साथ 80 विरोध रैलियां कीं. उन्हें कुछ लोगों द्वारा हार्दिक ‘केजरीवाल’ और उनके साथियों द्वारा उन्हें ‘नया मोदी’ का नाम दिया गया है. पटेल ने 6 माह से कम समय में न केवल गुजरात सरकार को आधे राज्य में कर्फ्यू लगाने के लिए बाध्य कर दिया बल्कि एक धन-संपन्न व शक्तिशाली समुदाय के लिए नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण की मांग करने के लिए लाखों लोगों को गतिशील किया. विडंबना यह है कि खबरों के अनुसार एक कॉमर्स स्नातक ने अहमदाबाद के सहजानंद कॉलेज से 50 फीसदी से कम अंक प्राप्त किए, लेकिन वह एक चतुर राजनीतिक छात्र है. उसकी और मोदी की विरोध सभाओं, टेलीविजन पर उपस्थितियों और संचार शैली में अद्भुत समानता है.
 
 
 
प्रकट रूप में देखें तो पटेल आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन उसकी असल मंशा है मोदी द्वारा गुजरात में रिक्त किए गए स्थान की पूर्ति करना. उसने प्रधानमंत्री पर मौखिक हमला नहीं किया है, लेकिन उसके भाषण मोदी और भगवा पार्टी को सीधे तौर पर यह कहते हुए धमकाते हैं कि अगर उसकी मांगें पूरी नहीं हुर्इं तो वह 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव में राज्य में कमल का फूल दोबारा नहीं खिलने देगा. 
 
 
 
जब तक मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, कोई भी राजनीतिक संगठन अथवा व्यक्ति किसी भी कार्य की हिमायत करने के लिए 10 हजार से अधिक लोग एकत्रित नहीं कर सकता था, लेकिन पटेल ने भाजपा के मौजूदा राज्य नेतृत्व की कमजोरी को भांप लिया है और नए पटेल का अभिनय करके इसे संकट में डालने का फैसला कर लिया है. विरोधाभास यह है कि हार्दिक पटेल मुख्यमंत्री पटेल की अगुवाई वाली राज्य सरकार के खिलाफ लोकप्रिय विद्वेष को जागृत करने में सफल रहा है. यह नरेंद्र मोदी को चुनौती पेश करता है. 
 
 
नरेंद्र मोदी की पार्टी को उनके अपने ही राज्य में पराजित होने के लिए विवश करके पटेल और उसका समुदाय वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में दूसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री के दावे को कमजोर करना चाहेंगे. नरेंद्र मोदी अपनी छवि पर पटेल के आंदोलन के नकारात्मक प्रभाव को समझ गए हैं. इसलिए उन्होंने एक संक्षिप्त टेलीविजन प्रस्तुति के माध्यम से लोगों को शांति बनाए रखने के लिए सीधे अपील करने का फैसला किया. नरेंद्र मोदी के भारत के सर्वोच्च राजनीतिक पद पर आसीन रहते हुए गुजरात में भाजपा की हार मोदी के लिए अभिशाप समान होगी. 
 
 
 
पटेल गुजरात में भारत के सबसे शक्तिशाली नेता के प्रभाव को कम करने का प्रयास कर रहा है, केजरीवाल और नीतीश दोनों ने यही मकसद प्राप्त करने के लिए बिहार में सहूलियत का एक गठबंधन बना लिया है. नीतीश जेपी क्रांति के वंशज हैं. हालांकि आम आदमी पार्टी का बिहार में विश्वसनीय चेहरा या महत्वपूर्ण उपस्थिति नहीं है, दिल्ली के मुख्यमंत्री ने गैर-भाजपा और गैर-कांगे्रसी मंच के निर्माण के मकसद से लालू-नीतीश की जोड़ी में शामिल होना चुना है. केजरीवाल शायद एक जातीय मुखिया न हों लेकिन वह अभी भी राष्ट्रीय परिदृश्य पर सबसे प्रतिष्ठित नेताओं में से   एक हैं. कई शिक्षित युवा उन्हें एक भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था से लोहा लेने वाले योद्धा के रूप में देखते हैं, जबकि उन्होंने आम आदमी की जीवनशैली को अपनाना जारी रखा है.
 
 
 
 
केजरीवाल ने अपने साधारण पैंट-कमीज के पहनावे में कोई बदलाव नहीं किया है और न ही वह शस्त्रधारी अंगरक्षकों के काफिले के साथ यात्रा करते हैं, वह किसी से भी बात कर लेते हैं, क्योंकि एक आम आदमी को उनसे संपर्क बनाने के लिए वीआईपी सुरक्षा चक्र को पार नहीं करना पड़ता. मतदाताओं के एक निश्चित मुखर खंड में केजरीवाल को नीतीश कुमार की तुलना में अधिक विश्वसनीयता प्राप्त है. नरेंद्र मोदी ने वाराणसी लोकसभा चुनाव में केजरीवाल को निर्णायक रूप से हराया था और कहीं न कहीं केजरीवाल उस हार का बदला लेने को आतुर हैं. सोशल मीडिया पर मोदी और केजरीवाल दो सबसे अधिक लोकप्रिय राजनीतिज्ञ हैं. सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर मोदी के बाद केजरीवाल दूसरे सबसे लोकप्रिय गैर-भाजपा व गैर-कांग्रेसी नेता हैं.
 
 
 
बिहार के चुनावी युद्ध में कदम रखकर नीतीश से अधिक केजरीवाल को फायदा होगा. बिहार में पराजय मोदी के अधिकार में सेंध लगाएगी और राष्ट्रीय नेताओं की लीग में शामिल होने के लिए केजरीवाल को एक बेहतर सौदा करने के योग्य बनाएगी. नीतीश भी अपने मन में ऐसी ही महत्वाकांक्षाएं पाले हुए हैं. ऐसा पहली बार होगा कि नीतीश बिना भाजपा के सहयोग के चुनावी रणक्षेत्र में उतरेंगे. वह मतदाताओं को दिखाना चाहते हैं कि वह शक्तिशाली मोदी को हराने में सक्षम हैं. ऐसा करने के लिए वह अपने सबसे पुराने और कटु राजनीतिक प्रतिद्वंदी को भी गले लगा सकते हैं. 
 
 
 
तो क्या केजरीवाल और नीतीश कुमार का सभी मुद्दों पर बातचीत करना केवल एक संयोग भर है? केजरीवाल ने बिहार पुलिस पर इतना भरोसा दिखाया है कि उन्होंने दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी इकाई का प्रबंधन करने के लिए नीतीश कुमार से उनके कुछ पुलिस अधिकारियों को दिल्ली भेजने का आग्रह किया. यहां तक कि दोनों गैर-राजनीतिक मंच भी साझा कर रहे हैं. अतीत में भी, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसी शक्तिशाली राजनीतिक हस्तियों को पराजित करने के लिए कई राजनीतिक क्षत्रपों ने एक-दूसरे के साथ हाथ मिलाए हैं. इतिहास एक बार फिर खुद को दोहरा रहा है लेकिन यह सब विशुद्ध वैकल्पिक राजनीतिक मॉडल प्रदान करने के लिए नहीं बल्कि केवल मोदी मॉडल को अप्रासंगिक बनाने के लिए किया जा रहा है.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं )