हत्या उस समय सम्मोहक बन जाती है जब वह शुद्ध धृष्टता बन जाती है. हम अपरिमित चाव के साथ उसे विवशतापूर्वक, आसक्तों की तरह घूरते हैं. मैं केवल अवलोकन पेश कर सकता हूं लेकिन एक मनोविश्लेषक कारणों का सुझाव देने में सक्षम हो सकता है. धृष्टता कभी भी जोशपूर्ण नहीं हो सकती, यह निर्दयी होती है. धृष्टता छल की अंतहीन परतों में लिपटी भावशून्य गणना है. ऐसे में जब एक सुर्खियों में रहने वाले हत्यारे को सामाजिक गुट से सुरक्षा मिलती है तब कल्पना का स्वांग करने वाला हर झूठ अहम सुराग की तलाश करने का प्रयास कर रहे पुलिस बल को गुमराह करता है. शीना बोरा की हत्या धृष्टता के विशुद्ध अवतार का नवीनतम उदाहरण है.
 
एक झूठ को तब तक कायम नहीं रखा जा सकता जब तक प्रेस बिलकुल भोली-भाली और पुलिस निराशाजनक ढंग से हाथ पर हाथ धरे न बैठी हो. भारतीय मीडिया में त्रुटियां भले ही हों लेकिन उसे मूर्ख नहीं बनाया जा सकता. यह मामले की तह तक पहुंचने में पूरी तरह सक्षम है. मुख्य आरोपी इंद्राणी मुखर्जी द्वारा प्रोत्साहित नई कहानी को ही लीजिए. शीना का जन्म उसके सौतेले पिता उपेन्द्र बोरा द्वारा उसका बलात्कार करने के बाद हुआ था. टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस कहानी को मुख्य प्रमुखता देने के लिए पर्याप्त रूप से योग्य माना, लेकिन उसी दिन, शनिवार 29 अगस्त को, उसी समाचार पत्र ने बोरा के संस्करण को प्रकाशित किया जिसमें बोरा ने इस आरोप को नकारते हुए दावा किया कि असली पिता वह आदमी है जिसके साथ इंद्राणी ने किशोरावस्था में विवाह किया था जो सिद्धार्थ दास नाम का कोई व्यक्ति है. स्पष्टता हासिल करने के लिए बेहद सरल व साधारण उपाय है डीएनए परीक्षण. जब धूल की कहानी बनेगी तो हवा में धूल से भरे तूफान तो आएंगे ही. मीडिया को दोष देना बहुत आसान है लेकिन मीडिया का सफर जनता की दिलचस्पी द्वारा निर्धारित होता है. अगर पाठक नहीं होंगे तो कहानी भी नहीं होगी. हम इस हत्या से इतने हक्के-बक्के क्यों रह गए हैं? क्योंकि यह कोई आम हत्या नहीं है, बर्बरता की गहराई कल्पना की समझ से भी परे है, हमारे अनुभव की बहुत छोटी परिधि की तो बात ही छोड़ दीजिए. एक मां और पुत्री के बीच की जीवन की पवित्रतम नैतिक संहिता को विश्वास से परे नृशंस बना दिया गया है.
 
जब यह खबर फैली उस समय मैं गोल्डन एज ऑफ मर्डर नाम की एक शानदार नई पुस्तक पढ़ रहा था. यह पुस्तक जीके चेस्टर्टन से लेकर अगाथा क्रिस्टी तक उन रोमांचकारी ब्रिटिश लेखकों के बारे में है, जिन्होंने मर्डर मिस्ट्री की बेहद असाधारण ब्रिटिश साहित्यिक रचना बनाई. कातिल हमेशा संदेह से परे होता है, क्योंकि वह आपकी और मेरी तरह बेहद सामान्य होता है. न्याय देने के लिए एक विलक्षण जासूस की प्रतिभा की आवश्यकता पड़ती है. जितनी सूक्ष्मता और चालाकी से ब्रिटिश हत्या करते हैं, उसकी तुलना नहीं की जा सकती. अमेरिकी गिरोह-वध के मामले में श्रेष्ठ हैं. भारतीयों में तुलना योग्य कुछ भी नहीं है. ऐसा इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि भारत में हत्याएं नहीं होती. हमें बस शायद विश्वास ही नहीं है कि इन्हें हल किया जा सकता है. मुझे यह जानकर थोड़ी हैरानी हुई कि पुस्तक में वर्णित कई रहस्यमयी कथाएं ब्रिटेन में असल जीवन में हुई हत्याओं पर आधारित थी. जो बात मुझे अब प्रभावित करती है वह यह कि कल्पना के विशाल पुस्तकालय में ऐसी कोई पुस्तक नहीं है जिसमें एक मां ने न ही क्रोध के क्षणिक आवेश में आकर और न ही शांतचित्त निर्दयता के साथ अपनी जैविक पुत्री का कत्ल किया हो. वहीं शांतचित्त निर्दयता जिसका इंद्राणी ने कथित तौर पर तब प्रदर्शन किया जब उसने पहले शीना को नशीला पदार्थ खिलाकर बेहोश किया और बाद में उसकी दम घोंट कर हत्या कर दी. ऐसा प्रतीत होता है कि शीना का भाई मिखाइल भी उसके निशाने पर था, जो अगाथा क्रिस्टी द्वारा स्थापित एक और स्वयंसिद्ध सत्य की पुष्टि करता है कि पहली हत्या किसी भी नैतिक संहिता से ऐसी मुक्ति है कि दूसरी हत्या भी अपरिहार्य रूप से होगी.
 
लोभ और उसके बाद भय, किसी भी हत्या में प्रमुख अभिप्रेरणा की भूमिका निभाते हैं. लोभ के पाश में बंधे लोग यह यकीन करने लगते हैं कि वे पैसे के साथ सुरक्षा भी खरीद सकते हैं. उनके विश्वास के पीछे ठोस कारण है. याद रखिए कि इंद्राणी कानून के लंबे हाथों की पकड़ से लगभग बच ही निकली थी. यह मामला तीन वर्ष पूर्व ही प्रकाश में आ सकता था जब जिस क्षेत्र में जले हुए शव को छोड़ दिया गया था, उस क्षेत्र में तैनात पुलिस अधिकारी ने एक कबायली गांववासी द्वारा प्रदान की गई जानकारी पर जांच करने से इंकार कर दिया. उस पुलिस अधिकारी ने जांच करने से इंकार क्यों किया? क्या उसे पैसे दिए गए थे? अगर हां, तो उसे किसने पैसे दिए थे? क्या वजह है कि मुंबई पुलिस ने तीन वर्ष पहले राहुल मुखर्जी द्वारा दर्ज की गई शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया? सभी संबंधित पक्षों द्वारा एकाएक मौन धारण करना वास्तव में आश्चर्यजनक है. इंद्राणी के अमीर पति पीटर का कहना है कि उसने इस बकवास पर यकीन कर लिया कि शीना अमेरिका में किसी स्थान पर चली गई है जिसका न कोई पता है और न ही कोई मोबाइल फोन. वह इन तीन वर्ष में अमेरिका तो गया होगा, क्या उसने शीना का पता लगाने की जरूरत भी नहीं समझी? इस पर यकीन करना कठिन है. शीना का दम घोंटने में इंद्राणी की मदद करने वाले उसके दूसरे पति संजीव खन्ना की चुप्पी अधिक स्पष्ट है. उसे पैसे द्वारा खरीद लिया गया था. संजीव किसी समय एक छोटा-मोटा व्यापारी था जो एकाएक ही धनाढ्य सेठ बन गया. पैसा बेशक सब कुछ खरीद सकता है, हत्या भी. लेकिन केवल कुछ समय के लिए. शायद यह मामला दैवीय न्याय को भी सिद्ध करता है. यह चुप्पी ऐसी दुर्घटनाओं में से एक के द्वारा तोड़ी गई जिन्हें केवल किसी प्रकार के दैवी प्रतिकार द्वारा ही समझाया जा सकता है. हम मृत्यु के बाद नर्क को ईश्वर का दंड समझते हैं, लेकिन पृथ्वी पर भी नर्क हो सकता है. इंद्राणी और संजीव वहां पहुंच चुके हैं.    
 
 (यह लेखक के निजी विचार हैं.)