देश की राजधानी में कई राजनीतिक पंडितों के पूर्वानुमान के विपरीत, भाजपा एक मजबूत जाति समर्थन पर सवार होकर बिहार में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव जीतने के लिए तैयार है. वास्तव में राज्य की राजनीति को देखने के दो तरीके हैं, जिसका राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर निश्चित रूप से व्यापक असर होगा. इस प्रकार कई प्रमुख खिलाड़ियों के भविष्य की दिशा का निर्धारण करेगा. पहला तरीका है बिहार में जाति परिदृश्य के चश्मे के आर-पार चीजों को देखना, जो पूर्वानुमान करने का यथार्थवादी ढंग है और दूसरा तरीका है नई दिल्ली में बैठे राजनीतिक पंडितों की आंखों से चीजों को देखना. जो लोग विकसित होते घटनाक्रमों को निष्पक्ष रूप से देख रहे हैं उन्हें यह बिलकुल स्पष्ट हो चुका है कि बिहार में केवल दो राजनीतिक हस्तियां प्रासंगिक हैं, नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव. इन दोनों के अलावा और कोई नहीं. लोग या तो उनके साथ व्यक्तिगत रूप से जुड़े हुए हैं या फिर उनके खिलाफ हैं. जैसा कि मौजूदा हालात दर्शाते हैं, इन दोनों की राजनीति की आलोचना करने वालों की संख्या इनका समर्थन करने वालों से अधिक है. जब चुनाव होंगे यह कड़वा सच जनता के सामने आंकड़ों के रूप में प्रकट होगा. 
 
बिहार की दूसरी वास्तविकता यह है कि वहां विकास को कभी मुद्दा बनाया ही नहीं जा सकता. यह केवल एक सरल इच्छाकल्पित चिंतन है. राज्य की दिशा का निर्धारण केवल और केवल जाति द्वारा ही किया जाता है. इस मान्यता का स्पष्ट परिणाम यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सर्वोच्च नेता होने के बावजूद बिहार में कुछ अधिक लोकप्रिय नहीं है. भाजपा उसे प्राप्त जाति समर्थन के आधार पर अच्छा प्रदर्शन करने के लिए तैयार है. अग्रिम जातियां भाजपा के समर्थन में एकजुट होकर खड़ी हैं. लेकिन, पिछड़ी जातियों में एकजुटता का स्पष्ट अभाव है और उनमें विभाजन बना हुआ है और घोटालों में उनकी कथित संलिप्तता के बावजूद लालू प्रसाद यादव, निसंदेह, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से अधिक लोकप्रिय हैं, जिनका अपना ‘कुर्मी ’ समुदाय पूरी तरह से उनके साथ नहीं है. सभी उपलब्ध संकेतों को देखते हुए लालू प्रसाद यादव की पार्टी आसानी से नीतीश कुमार से अधिक सीटें बटोर सकती है. अपने दो नेताओं, उपेन्द्र कुशवाहा और शकुनी चौधरी द्वारा जनता दल-राष्ट्रीय जनता दल-कांग्रेस संयोजन का कड़े शब्दों में विरोध करने के साथ, राज्य में काफी बड़ी उपस्थिति रखने वाले ‘कोयरी’ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को समर्थन दे रहे हैं.
 
नीतीश कुमार की समस्याओं में इस तथ्य ने और बढ़ोतरी कर दी है कि मुख्यमंत्री के रूप में उनके पिछले कार्यकाल के दौरान, वह राज्य के सबसे पिछड़े हुए वर्गों को विभाजित करने में सफल रहे थे. ‘मुसाहर’ जो महादलितों का हिस्सा हैं और जिनका प्रतिनिधित्व पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी द्वारा किया जाता है ने अभी से नीतीश और लालू के प्रति अपने विरोध की घोषणा कर दी है. ऐसे ही अन्य समूह हैं जो यह महसूस करते हैं कि उन्हें अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए और लालू-नीतीश संयोजन से भयभीत नहीं होना चाहिए. राम बिलास पासवान की अगुआई वाले ‘दुसध’ पहले से ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ हैं और शुद्ध अंक गणितीय गणना पर आधारित स्थिति के सरल पठन के कारण राज्य में सत्तारूढ़ गठबंधन द्वारा सत्ता बरकरार रखने की संभावनाएं बेहद कमजोर हैं. नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव मुस्लिम वोट बैंक पर बहुत अधिक भरोसा दिखा रहे हैं, जो लोग आंतरिक रूप से बिहार की राजनीति के अर्थ-विज्ञान को समझते हैं, उनका मानना है कि राज्य में मुस्लिम आबादी भी जाति-रुग्ण्ता से अछूती नहीं रही है. वे भी जातीय आधार पर विभाजित हैं, हालांकि नई दिल्ली में कई लोग शायद इस तर्क से सहमत न हों जिनके लिए ऐसा विभाजन शायद भ्रामक प्रतीत हो सकता है. राज्य में हुए पिछले चुनावों में देखा गया है कि मुसलमानों ने जातीय आधार पर मतदान किया है. इन चुनावों में भी कुछ अलग होने की संभावना नहीं है. ओसादुद्दीन ओवैसी द्वारा कुछ क्षेत्रों में चुनाव लड़ने की घोषणा भाजपा को लाभ पहुंचा सकती है, क्योंकि मुस्लिम मतदाता का एक बड़ा वर्ग लालू-नीतीश के पीछे चलने के बजाय ओवैसी के पक्ष में मतदान कर सकता है. 
 
नीतीश कुमार के खिलाफ प्रमुख दोषारोपण यह है कि उन्होंने अपने अनुयायियों के एक बड़े वर्ग को विमुख कर दिया है और अपनी सरकार को नौकरशाहों के माध्यम से चलाया है, जिनमें से अधिकांश बिहार के नहीं हैं और इस प्रकार जमीनी हकीकत से पूरी तरह अंजान हैं. खुद का प्रचार करने के लिए नीतीश ने उन लोगों को नाराज कर दिया जिन्होंने उनकी संकट की घड़ी में उनका साथ निभाया था जब भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया था. उनकी अपनी पार्टी में कई लोगों का मानना है कि उन्होंने भाजपा से संबंध-विच्छेद इसलिए नहीं किया था क्योंकि उन्हें भाजपा के साथ काम करने में समस्या आ रहा थी, अपितु उन्होंने ऐसा लालकृष्ण अडवाणी के कुछ समर्थकों के आग्रह पर किया था जो नहीं चाहते थे कि नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उभर कर सामने आएं. यह एक जुआ था जो नाकामयाब साबित हुआ. फरवरी 2002 में हुई साबरमती एक्सप्रेस-गोधरा घटना के समय रेलमंत्री रह चुके नीतीश ने उस समय अनिवार्य जांच का आदेश तक नहीं दिया. अगर उन्हें कोई समस्या नहीं थी, तो बाद में समस्या पैदा होने की क्या वजह थी? यह भी स्पष्ट रूप से विदित है कि राज्य की राजनीति में नरेंद्र मोदी एक प्रमुख कारक नहीं हैं. उन्हें तस्वीर में लाने के लिए किए जा रहे प्रयास वास्तविकता चित्रित करने का सही तरीका नहीं है. औरों की तरह, चुनाव परिणाम का उनके राजनीतिक भविष्य पर शायद असर पड़ सकता है, लेकिन जहां तक बिहार का संबंध है, भाजपा अपने जाति-समर्थन के कारण वहां विजयी होगी. मोदी की एकमात्र भूमिका होगी नए मुख्यमंत्री का चुनाव करना. 
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)