जो लोग वर्ष 2001 या इससे भी पहले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक करियर पर नजर रखते आ रहे हैं, उनमें से अधिकतर प्रधानमंत्री की विदेशी नीति की पहलों और अर्थव्यवस्था की घरेलू समस्या से निपटने के उनके ढंग के बीच के अंतर से हैरान हैं. वर्ष 2022 के आते-आते भारत में चीन जितने नागरिक होंगे, लेकिन सकल घरेलू उत्पादन के मामले में चीन से बहुत पिछड़ चुका होगा. बेरोजगारी एक ऐसी बीमारी है जो एक व्यक्ति के दृढ़-संकल्प पर व्यवस्थित व घातक रूप से कार्य करती है और लंबी अवधि तक बेरोजगार रहने से व्यक्ति का आत्मविश्वास डगमगा जाता है. उसमें हीन भावना घर कर जाती है. जैसा कि जर्मनी में 1930 में हुए घटनाक्रम से अनुमान लगाया जा सकता है. समाज का बेरोजगार वर्ग किसी भी धर्म के कट्टरपंथी समूहों के लिए एक आसान शिकार रहा है. दुनिया को बेहतरीन संगीतकार और दार्शनिक देने वाला यह देश अब एक ऐसे निर्मम व अराजक राष्ट्र के रूप में तब्दील हो गया जहां लाखों की संख्या में मासूम लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया.
 
अगर हम इस पर विचार करें कि यहूदी बुद्धिजीवियों द्वारा मानवजाति के लिए कितनी संख्या में उपयोगी आविष्कार विकसित किए गए हैं, क्षति की व्यापकता स्पष्ट हो जाती है. जिन 60 लाख यहूदियों की हत्या हिटलर व उसकी पार्टी द्वारा की गई, अगर वे जीवित होते तो उन्होंने दुनिया को समृद्ध करने के लिए कला, साहित्य और विज्ञान के अनगिनत अतिरिक्त कार्यों का सृजन किया होता. प्रधानमंत्री मोदी के लिए बेरोजगारी को दूर करना और अधिक से अधिक नौकरियों के अवसर बनाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए. देश के युवा वर्ग ने 2014 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी पर भरोसा दिखाते हुए उन्हें अपना कीमती वोट दिया, अब उसी युवा वर्ग की उम्मीदों पर खरा उतरने का समय आ गया है. विधानसभाओं, संसद व अन्य स्थानों में प्रदत्त पद धारण करने वाले राजनीतिज्ञों सहित सरकार में निर्णयकर्ताओं की सबसे ऊपर की परत पर गहनता से और सूक्ष्म रूप से निगरानी रखने की आवश्यकता है और दोषियों को उनके पद पर जारी रहने की अनुमति देने के बजाय दंडित किया जाना चाहिए.
 
आईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवाएं) एक ऐसा संगठन है जिसके पास ऐसे कई सत्यनिष्ठ एवं कर्मठ अधिकारी हैं जिनके पास जनता के लिए लाभकारी सिद्ध होने वाले बदलाव लागू करने की इच्छाशक्ति है. हालांकि, इसका वर्तमान रूप बदलने की आवश्यकता है जिसमें पदोन्नतियां पद्धति का एक विषय बन गई हैं और नागरिक समाज से तत्वों के समस्तरीय प्रवेश को बंद कर दिया गया है. यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री ने विदेश नीति में अधिकारियों के निर्देशों की पालना करने के बजाय अपने खुद की सूझबूझ से काम लिया, हालांकि राजकोषीय और मौद्रिक मुद्दों के मामले पर प्रधानमंत्री अधिकारियों द्वारा विकसित आम राय के अनुसार चलते हुए प्रतीत होते हैं. इसलिए मोदी सरकार का विरोधाभास उसके पूर्ववर्ती के उच्च कर, विनियमन और ब्याज दर व्यवस्था के साथ जारी है. औपचारिक कर के दायरे में पड़ते करदाताओं की संख्या को दोगुना व चौगुना करने का श्रेष्ठ तरीका दरों को कम करना है, जबकि दरों में बढ़ोतरी करने के बजाय उनमें कटौती करना सेवा क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का प्रभावी तरीका है. न केवल उच्च ब्याज दरें बल्कि कर दरें भी भारतीय कारोबार के उत्पादों को गैर-प्रतिस्पर्धी बना रहे हैं. जैसा कि वित्तीय स्थिति विवरण पर एक नजर उद्घाटित करती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी विशेष व्यापारिक घराने को अन्यों की तुलना में विशेष तवज्जो नहीं दी है, लेकिन उन्हें और अधिक प्रयास करने होंगे. 
 
उदाहरण के लिए, सरकारी बैंकों को चुनिंदा कंपनियों में लंबे समय से बकाया ऋणों को इक्विटी में तब्दील करने के लिए कहना और कीमतों में मंदी से बचने के लिए इन्हें बाजार में मुक्त कर देना. जबकि वित्त मंत्रालय के बाबू अभी भी पी चिदंबरम (पूर्व वित्त मंत्री) के आर्थिक मॉडल में विश्वास करते हैं, गृह मंत्रालय में उनके समकक्षी इस देश को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का कम स्वागतकर्ता बनाने का प्रयास कर रहे हैं. क्या कोई समझा सकता है कि ऐसे समय पर जब कई वेबसाइट युवाओं को आईएसआईएस और समान विचारधाराओं की ओर आकर्षित कर रही हैं, तब पॉर्न साइटों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करने का क्या औचित्य है? जहां तक दूरसंचार मंत्रालय की बात है, सर्वोच्च न्यायालय में इसे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के 66 ए का बचाव करते देखना चौंकाने वाला था, इसलिए नेट न्यूट्रेलिटी को मंद करने के प्रयासों के खिलाफ सार्वजनिक हो-हल्ले की अनुपस्थिति में इससे नेट न्यूट्रेलिटी का बचाव करने की उम्मीद करना अवास्तविक होगा. 
 
जहां तक कानून मंत्रालय का संबंध है, उसके अधिकारियों को भारतीय संविधान पढ़ने की जरूरत है और इसके मुख्य विषय का आपराधिक मानहानि जैसे औपनिवेशिक कानूनों के उनके यूपीए-शैली समर्थन के साथ मेल कराने की आवश्यकता है. भाजपा शासित महाराष्ट्र का क्या मतलब निकाला जाए जहां आहार को भी राज्य की उतनी ही बढ़ी जिम्मेदारी समझा जाता है जितना कि अफगानिस्तान और सोमालिया में समझा जाता है, और जहां शादीशुदा लोगों को भी सार्वजनिक स्थानों में एक-दूसरे का हाथ थामने के लिए पुलिस द्वारा अवांछनीय ध्यान का विषय बनाया जा सकता है? जबकि कट्टरपंथी शांतिपूर्ण और गैर-हस्तक्षेप करने वाले प्रबोधन के माध्यम से भारत के 125 करोड़ लोगों को संत में बदलने का प्रयास कर सकते हैं. प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को मुख्यत: उनकी आर्थिक नीतियों की सफलता या विफलता के आधार पर आंका जाएगा इसलिए, नरेंद्र मोदी को अपनी मूल आर्थिक नीतियों में नवीनता की वही भावना दिखाने की आवश्यकता है जिसका प्रदर्शन उन्होंने विदेश नीति के मामलों में किया है.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)