एक ऐसे देश में जहां वास्तुशास्त्र, ज्योतिष शास्त्र और पौराणिक कथाएं अधिकांश लोगों की जीवनशैलियों और व्यापार-उद्यम को निर्धारित करते हैं, प्रधानमंत्री के आधिकारिक निवास 7 रेसकोर्स रोड (आरसीआर) का अंक-शास्त्र लगभग नक्षत्रीय महत्ता का रूप धारण कर लेती है. भारत-पाक वार्ता की उम्मीद लगाने वाले अब इस सोच में पड़ गए हैं कि कहीं 7 रेसकोर्स की हवा में कोई रहस्यमयी शक्ति तो नहीं, जो पाकिस्तान के साथ बातचीत के संबंध में इसके अधिभोगी की सोच को प्रभावित करती है? 
 
 
12 एकड़ की मनमोहक प्राकृतिक हरियाली में फैला हुआ आरसीआर कॉम्पलेक्स प्रधानमंत्री की शख्सियत पर अपने सात्विक प्रभाव के प्रयोग लिए मशहूर हो चुका है. पाकिस्तान जैसे आक्रामक और विश्वास न करने योग्य पड़ोसी राष्ट्र के साथ बर्ताव करते हुए यह और अधिक स्पष्ट हो जाता है. आतंकवादियों की शरणस्थली बन चुके पाकिस्तान को सबक सिखाने का वायदा करके सत्ता में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आज एक विनम्र कबूतर (दूत) के रूप में देखा जाता है. 
 
 
 
2014 में चुनावी अभियान के दौरान, नरेंद्र मोदी पाकिस्तान के खिलाफ आग और जहर उगल रहे थे, लेकिन लोकसभा चुनाव में विजयी परचम लहराने के शीघ्र बाद वह ऐसे पहले भारतीय प्रधानमंत्री बन गए जिन्होंने अपने शपथ-ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी समकक्ष को आमंत्रित किया. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने के उनके प्रयासों का अंत वहीं नहीं हुआ, विभिन्न अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियों में नवाज शरीफ के साथ सम्मानजनक एवं मिलनसार व्यवहार करके प्रधानमंत्री मोदी ने इस दिशा में अतिरिक्त कदम उठाए.
 
 
7 आरसीआर में जाने के बाद से मोदी ने पाकिस्तान के खिलाफ एक भी आक्रमाक एवं शत्रुतापूर्ण शब्द नहीं बोला है और न ही सीमा पार से लगातार हो रही आतंकियों की घुसपैठ को लेकर उसे कोई चेतावनी दी है. कांग्रेस ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर रोजाना हताहत हो रहे भारतीय नागरिकों और सैनिकों पर चुप्पी साधने और बैंकाक बम विस्फोट पीड़ितों के प्रति सहानुभूति प्रकट करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आड़े हाथ लिया है. जो प्रधानमंत्री को व्यक्तिरूप से जानते हैं वे एक क्षण के लिए भी यह सोचने की भूल नहीं करेंगे कि उन्होंने अपने राष्ट्रवादी जड़ों का परित्याग कर दिया है. तो फिर क्या पाकिस्तान को एक आतंक-प्रेरित बहिष्कृत राष्ट्र के रूप में अलग-थलग करने के बजाय उसे संबद्ध करने का मोदी सरकार का फैसला आरसीआर पर कुछ ग्रहों के प्रभाव से प्रभावित है? 
 
 
 
लेकिन, हमारे 1947 की विश्वासघाती शाखा के प्रति दृष्टिकोण बदलने वाले मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री नहीं हैं. कुछ भारतीय ज्योतिष और वास्तु विशेषज्ञ मजाक करते हैं कि रेस कोर्स के प्रधानमंत्री का आधिकारिक निवास बनने के शीघ्र बाद ही भारतीय प्रधानमंत्रियों के व्यवहार में पाकिस्तान के प्रति नर्मी आनी शुरू हो गई थी. स्वर्गीय राजीव गांधी आरसीआर में जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे. तीन मूर्ति रोड पर आलीशान बंगले में रहने वाले स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भले ही 1962 में चीन से युद्ध हार गए हों, लेकिन उन्होंने चीन के खिलाफ आक्रामक  सैन्य नीति को जारी रखा और गोवा को भी पुर्तगाल से मुक्त कराया.
 
 
10 जनपथ में रहने वाले लाल बहादुर शास्त्री पाकिस्तान को भारत का सबसे बड़ा शत्रु मानते थे और 1965 में लाहौर पर लगभग कब्जा कर ही लिया था. 1 सफदरजंग रोड में 15 वर्ष निवास करने के दौरान इंदिरा गांधी की नीति थी पाकिस्तान को सबसे बड़े खतरे के रूप में देखना. चूंकि पाकिस्तान अमेरिका का करीबी सहयोगी राष्ट्र था, इंदिरा गांधी ने अमेरिका के प्रति भी टकरावपूर्ण रवैया अपना लिया. इंदिरा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री, दोनों ने पाकिस्तान को पूर्ण-विकसित युद्धों में संलग्न करने में कोई संकोच नहीं किया. 
 
 
 लेकिन एक बार राजीव गांधी के आरसीआर में जाने के बाद, पाकिस्तान के प्रति सरकार का रवैया बदल गया. राजीव गांधी ने पाकिस्तान के साथ मैत्री बढ़ाने के अथक प्रयास किए. राजीव गांधी और बेनजीर भुट्टो में अच्छी बनती थी और बेनजीर भुट्टो अक्सर नई दिल्ली की यात्रा करती रहती थी. राजीव गांधी के शासन के पांच वर्ष के दौरान, पाकिस्तान ने खुद के लिए सबसे कृपापात्र राष्ट्र का दर्जा लगभग पा ही लिया था. राजीव नहीं जानते थे कि उनकी सरकार का पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंधों का अत्यधिक जुनून पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ करने का सुनहरी मौका प्रदान कर रहा था. जब तक मतदाताओं ने राजीव को अपदस्थ किया, तब तक पाकिस्तान ने भारत को अस्थिर करने के लिए घाटी में पहले से ही शक्तिशाली आधार बना लिया था.
 
 
 
ऐसा लगता है कि आक्रामकता का ग्रह (मंगल) 7 रेसकोर्स रोड के ऊपर के आसमान से दूर चला गया है. शत्रुतापूर्ण पड़ोसी का मुकाबला करने के लिए प्रधानमंत्री की स्वाभाविक आक्रामक प्रवृत्ति शांत कर दी गई है. 7 आरसीआर में प्रवेश करने के बाद, पीवी नरसिंह राव पाकिस्तान के साथ बातचीत के मजबूत प्रस्तावक बन गए. सफदरजंग रोड में रहने वाले उनके पुराने मित्र अटल बिहारी वाजपेयी हमेशा आतंक-विषाक्त पाकिस्तान के साथ टकराव के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे. वास्तव में, यह राव ही थे जिन्होंने सीमा पार बातचीत के लिए   बुनियादी सिद्धांतों को निर्धारित करने के लिए एक अलग कूटनीति को संगठित किया था. लेकिन जब अटल बिहारी वाजपेयी ने आरसीआर में प्रवेश किया तब ग्रहों ने स्थिति बदली और वाजपेयी को मित्रतापूर्ण पाकिस्तान के विचार के साथ लगाव हो गया.
 
 
 
फरवरी 1999 में वाजपेयी लाहौर जाने वाली बस में चढ़ गए, लेकिन उन्हें बदले में कारगिल युद्ध भेंट में मिला. बाद में वाजपेयी ने मुशर्रफ को 2001 आगरा शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया. क्या वाजपेयी और उनकी टीम पाकिस्तानी जादूगर के जाल में फंस गए थे और पाकिस्तान के प्रति अपने पहले की विचारधारा भुला बैठे थे? उनके उत्तराधिकारी मनमोहन सिंह एक शांति के दूत थे जिन्होंने आरसीआर के शांतिकुंड में चुपचाप डुबकी लगा दी. वह भारत-पाक वार्ता के सबसे मुखर और सक्रिय पक्षधर थे. दोनों देशों के संबंध सुधारने को लेकर मनमोहन सिंह इतने आसक्त हो गए थे कि एक समय तो वह एलओसी (नियंत्रण रेखा) को अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर में तब्दील करने पर विचार करने लगे थे. 
 
 
अगर मनमोहन सिंह एक कबूतर थे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक गिद्ध होने की उम्मीद की जा रही थी. क्या आरसीआर के मंत्रमुग्ध माहौल ने हर भारतीय प्रधानमंत्री की पाकिस्तान के प्रति सोच में बदलाव ला दिया है? चूंकि 7 आरसीआर प्रधानमंत्री के निवास स्थान के रूप में कम और कार्यालय के रूप में अधिक कार्य करता है, क्या आरसीआर के कूटनीतिक काला जादू ने प्रधानमंत्री के दिलो-दिमाग को अपने वश में कर लिया है? साऊथ ब्लॉक, जिसे अभी भी प्रधानमंत्री कार्यालय कहा जाता है(पीएमओ), अब केवल नौकरशाहों की अनियमित बैठकें  आयोजित करने वाला उपभवन बन कर रह गया है.
 
 
 
पिछले 25 वर्ष से, हमारे किसी भी प्रधानमंत्री ने साऊथ ब्लॉक में एक सप्ताह में कुछ घंटों से अधिक नहीं बिताए हैं. राव के लिए तो विशेष रूप से लिफ्ट भी लगवाई गई थी जिसका उन्होंने कभी इस्तेमाल ही नहीं किया. नरेंद्र मोदी के आरसीआर में जाने के बाद से, वह केवल उन्हीं लोगों के विचार सुन सकते हैं जिन्हें आरसीआर में अप्रतिबंधित प्रविष्टि का विशेषाधिकार प्राप्त है. शेष संस्थापन से 7 आरसीआर की शाही पृथकता ने इसे प्रीमियम राजनीतिक रियल इस्टेट का भारत का सबसे शक्तिशाली भूखंड बना दिया है. मोदी को वहां रहते अभी केवल 15 माह ही हुए हैं. हो सकता है कि प्रचलित पाक-मोहित मनोदशा में ग्रह-नक्षत्र एकबार फिर बदलाव लाएं और उन कार्यों के प्रति मोदी के लक्ष्य और प्रतिबद्धता में वर्धन करें जो उन्हें एक कर्मठ राष्ट्रवादी के रूप में परिभाषित करते हैं. तब, प्रधानमंत्री के घर में मंगल के प्रभाव से अंतत: 7 आरसीआर की सीमाओं के भीतर से उत्पन्न होने वाली प्रतिकूल और परस्पर-विरोधी कूटनीतिक गामा किरणें शायद दूर हो जाएं.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं)