नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भारतीय जनता की असाधारण उम्मीदों का इतना अधिक बोझ है जितना किसी अन्य भारतीय राजनीतिज्ञ को नहीं झेलना पड़ता. प्रधानमंत्री के रूप में उनके प्रथम स्वतंत्रता दिवस भाषण में उन्होंने स्वच्छ भारत, मेक इन इंडिया, योजना आयोग के उन्मूलन जैसी सारभूत घोषणाएं की थीं. लाल किले की प्राचीर से दिया गया उनका दूसरा भाषण कभी भी पहले भाषण की बराबरी नहीं कर सकता था और वास्तव में बराबरी की भी नहीं जानी चाहिए थी. अब भव्य नई योजनाओं और बड़ी घोषणाओं की आवश्यकता भी नहीं है. उनके द्वारा निर्धारित की गई योजनाओं पर अमल करने का समय आ गया है. 
 
एक भाषण कभी भी कार्यान्वयन के लिए एक मंच नहीं बन सकता. यह संदेश प्रेषित करने का मंच है. भले ही सरकार द्वारा उनकी योजनाओं का क्रियान्वयन पिछले 15 माह में अनियमित रहा हो, मोदी के पास सौभाग्य से देने के लिए अभी भी सही संदेश हैं. मोदी ने बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए, जनधन योजना और स्वच्छ भारत अभियान सहित उनकी कुछ सर्वोत्कृष्ट योजनाओं का रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत करने को चुना. जाहिर है उन्होंने ऐसे कार्यक्रमों को चुना जहां ठोस प्रगति हासिल की गई है, लेकिन वह यह सूचित करने में समर्थ रहे कि वह अपनी भव्य घोषणाओं का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. मुमकिन है कि उनकी समीक्षा ‘मेक इन इंडिया’ जैसे कम सफल उद्यमों पर भी लागू होती है. 
 
मोदी ने अपने पसंदीदा नारे ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ का उल्लेख नहीं किया, लेकिन वह प्राइवेट सेक्टर के लिए एक बड़ी भूमिका के लिए प्रतिबद्ध बने हुए हैं. उद्यमशीलता और ‘स्टार्ट-अप इंडिया’ के उनके संबोधन ने दर्शाया कि नौकरियां केवल प्राइवेट सेक्टर में ही उत्पन्न की जा सकती हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि अकेले बड़े उद्यमों में ही ऐसा हो सकता है. प्राइवेट सेक्टर के लिए वित्तीय प्रोत्साहन का उनका सुझाव मुक्त बाजार के अर्थशास्त्रियों के लिए शायद एक अभिशाप हो सकता है, लेकिन मोदी कभी भी रोनाल्ड रीगन अथवा मार्गरेट थैचर की तरह नैतिकतावादी विचारक नहीं होने वाले थे. 
 
एक बेकार और भ्रष्ट राज्य के तंत्र में सुधार करने की उनकी प्रतिबद्धता, सामान्य रूप में, विस्तारपूर्वक कम स्पष्टवादी रही है. इस संदर्भ में, निचले स्तर की सरकारी नौकरियों के लिए साक्षात्कार को रद करने का उनका निर्णय दिलचस्प है. सच्चाई यह है कि साक्षात्कार स्वनिर्णय और सरकार में भ्रष्टाचार के लिए बहाना बन गए हैं. कुछ नौकरियों में साक्षात्कारों की भूमिका केवल दिखावटी होती है. एक पारदर्शी और आनलाइन सिस्टम की ओर बढ़ना समझदारी भरा कदम है. 
 
स्वाभाविक रूप से आलोचकों द्वारा उनके भाषण में अनकही बातों की ओर ध्यान दिलाया जाएगा. उन्होंने संसदीय अवरोध पर कोई टिप्पणी नहीं की. उन्होंने संशोधित भूमि विधेयक के पक्ष में भी कोई तर्क नहीं दिया, लेकिन वह अन्य मंचों पर इन मुद्दों को संबोधित कर चुके हैं. इस स्तंभकार के लिए यह तथ्य प्रशंसनीय है कि प्रधानमंत्री ने जाहिर तौर पर विपक्ष द्वारा चारों ओर से घिरा होने के बावजूद किसी तरह की लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा नहीं की (जैसा कि यूपीए प्रधानमंत्री ने किया होता). उसी समय वह बुनियादी ढांचे के विकास के प्रति भी समर्पित हैं, 1 हजार दिन में सभी गांवों का विद्युतीकरण करना एक सुयोग्य प्रयोजन है. 
 
सरकार की क्रूरता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चमक को शायद कुछ कम भले ही कर दिया हो. लेकिन ऐसा अधिकांश राजनीतिज्ञों के साथ होता है. हालांकि, सौभाग्य से प्रधानमंत्री 2014 की अपनी दृष्टि से भटके नहीं हैं. माइक्रोफोन से दूर रहते हुए, उन्हें उस दृष्टि को शीघ्रता के साथ कार्यान्वित करने के लिए अपने मंत्रियों और नौकरशाहों पर अधिक दबाव डालने की आवश्यकता है.