नई दिल्ली. अगर आप संसदीय गतिरोध के उज्ज्वल पहलू की तरफ देखने में समर्थ हैं तो आप को शुक्र मनाना चाहिए कि इसने अगर और कुछ नहीं तो कम से कम यह तो प्रमाणित कर दिया है कि राहुल गांधी का नया अवतार उनके अघोषित अवकाश-पूर्व अवतार से किसी भी हाल में बेहतर नहीं है. यह शख्स उद्धार से परे है. राहुल द्वारा संसद को कार्य करने की अनुमति देने से पहले भाजपा मंत्रियों के इस्तीफे की अपरक्राम्य मांग के अलावा लोकसभा में भाषण देने के लिए उनके लिए विशेष रूप से बनाए गए नोट्स की आकस्मिक खोज ने निर्णायक रूप से इसकी पुष्टि की कि वह अपने संपूर्ण जीवनकाल में एक औसत दर्जे के राजनीतिज्ञ से ऊपर नहीं उठ पाएंगे. 
 
सोशल मीडिया में चर्चाओं का केंद्र बनी यह ‘चीट शीट’ खुलासा करती है कि अपनी मां की तरह, वह भी, अपनी पंक्तियां मोटे अक्षरों वाली रोमन लिपि में लिखी गई हिंदी से तोते की तरह रटते हुए बोलते हैं. तब भी, हाथों में आलेख की प्रति होने के बावजूद राहुल गांधी उच्चारण में गड़बड़ी करते हैं और वाक्यों का क्रम अस्त-व्यस्त कर देते हैं. 
 
गांधी परिवार के वारिस का मलिन प्रदर्शन और समझौता करने की किसी भी संभावना से उनका इंकार अवश्य ही इस तर्क को नष्ट करेगा कि सरकार को समझौता करने के लिए विपक्ष की ओर हाथ बढ़ाना चाहिए था. जब एक 44 सदस्यीय पार्टी के नेता पर ‘आर या पार’ का भूत चढ़ा हुआ हो, तब उसके सामने समझौते का प्रस्ताव रखने से किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती. गांधी वंशज समझौते के बजाय एक पूर्ण रूप से विकसित टकराव पर अड़ा हुआ था. अगर इस प्रकिया में उसकी पार्टी अलग-थलग पड़ गई तो उसे इसकी कोई चिंता नहीं थी. ‘शहजादे’ को किसी के सामने जवाब नहीं देना पड़ता.  
 
बीते दो सप्ताह में, संसद में द्वेषपूर्ण भर्त्सना के कारण नैतिक राजनीति का क्षरण हुआ है. प्रतिद्वंदी सांसद लोकसभा में एक-दूसरे पर लात-घूंसों की बौछार करने के बेहद करीब आ गए थे. ललितगेट पर चर्चा के दौरान, सोनिया गांधी ने क्रोध में आकर सदन की वेल में पहुंचकर ऐसा अकल्पनीय कृत्य किया जिसकी सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष से उम्मीद नहीं की जाती. आप वाजपेयी अथवा लालकृष्ण अडवाणी द्वारा ऐसे निर्लज्ज कृत्य किए जाने की कल्पना भी नहीं कर सकते. 
 
राजनीतिक संवाद ने उस समय और कुरूप रूप ले लिया जब यह स्पष्ट हो गया कि जब राहुल ने यह दावा किया कि ‘सुषमाजी ने पैसे खाए हैं.’ भाजपाई सांसदों को भी राहुल को यह याद दिलाने में देर नहीं लगी कि हकीकत में किसने कितने पैसे खाए हैं. भारतीय संसद पहले कभी  ऐसे निम्न स्तरीय आरोप-प्रत्यारोप की साक्षी नहीं बनी है. फिर भी, दांव पर बहुत कुछ लगा हुआ था. आर्थिक विशेषज्ञ जोर देते हैं कि जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) का कार्यान्वयन अतिरिक्त सकल घरेलू उत्पाद में 1 से 2 प्रतिशत का इजाफा करेगा. सरकार अगले वित्त वर्ष से इस ऐतिहासिक सुधार को लागू करना चाहती है. लेकिन उससे पहले, जीएसटी विधेयक को राज्यसभा की स्वीकृति लेनी होगी और उसके बाद राज्य विधानसभाओं की. 
 
जब तक ऐसा शीघ्र नहीं किया जाता, 1 अप्रैल 2016 से इसे लागू करना शायद संभव न हो सके. हालांकि, सामान्य रूप से नवंबर के अंतिम सप्ताह में शुरू होने वाले संसद के प्रथागत शीत सत्र से पहले संसद के दो-तीन दिवसीय विशेष सत्र की बातें हो रही हैं, इसकी कोई गारंटी नहीं है कि अड़ियल कांग्रेस इस दिशा में होने वाली किसी सकारात्मक प्रगति में सहयोग देगी. ऐसा प्रतीत होता है उसे इस की कोई चिंता नहीं है कि एक प्रतिशत अतिरिक्त सकल घरेलू उत्पाद कम से कम एक लाख करोड़ की अतिरिक्त वृद्धि में तब्दील होता है. 
 
जिन्होंने अपने जीवन में कभी संघर्ष नहीं किया, एक दिन भी कड़ी मेहनत नहीं की, विलासिता के साधनों का भरपूर उपभोग किया, उनके लिए सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि अप्रसांगिक हो सकती है. लेकिन औरों के लिए यह बेहद अहमियत रखता है. लोकलुभावन वितरण योजनाओं की तुलना में उच्च विकास दर वास्तव में उन सभी लाखों नागरिकों को गरीबी के गर्त से मुक्ति दिला सकता है. भारत का अगले 15 वर्ष तक लगातार 9-10 फीसदी विकास दर के साथ आगे बढ़ना गरीबी उन्मूलन के लिए सबसे अच्छी गारंटी है. 
 
इस बीच, जो सवाल हर कोई पूछ रहा है लेकिन जिसका जवाब केवल गांधी वंशज दे सकता है वो यह कि क्या सदन की अगली बैठक में भी ‘इस्तीफा नहीं, संसदीय कार्यवाही नहीं’ का पुराना राग अलापा जाएगा? केवल कांग्रेसी आका ही इसका जवाब दे सकते हैं कि शीतकालीन सत्र में पार्टी का रुख क्या रहेगा. बाकी लोग केवल कयास ही लगा सकते हैं. 
 
अगर भाजपा आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में अपना परचत लहराने में सफल रहती है, तो राहुल गांधी पर भरोसा किया जा सकता है कि वह एकबार फिर किसी अज्ञात विदेशी गंतव्य पर लंबी छुट्टी बिताने के लिए चले जाएंगे और इस प्रकार कांग्रेस को एकबार फिर उसकी पुरानी सामान्य अवस्था में वापस लौटने के लिए आजाद छोड़ देंगे.