नई दिल्ली. सरकार के कामकाज में रुकावट के भय से देश के लाखों-करोड़ों मतदाताओं को यूपीए के तीसरे कार्यकाल के बजाय नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की ओर रुख करने को प्रेरित किया. इसके परिणामस्वरूप भाजपा को 2014 लोकसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए. लेकिन, 16 मई 2014 के बाद भाजपा के प्रदर्शन में खामियों का औचित्य सिद्ध करने के लिए गठबंधन बाध्यताओं का बहाना नहीं बनाया जा सकता. 
 
महत्वपूर्ण विधायी कानूनों को पारित कराने में विलंब के लिए लोकसभा में कांग्रेस की नाममात्र मौजूदगी को मतदाताओं द्वारा एक महत्वपूर्ण कारण के रूप में कतई स्वीकार नहीं किया जाएगा, जिनमें जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर), भूमि विधेयक, रियल इस्टेट विधेयक , व्ह्सिलब्लोअर एक्ट और कई अन्य विधेयक शामिल हैं. पक्षाघात की धारणा के विपरीत, वास्तविकता यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कई मंत्रालयों में कई प्रशासनिक पहलें की जा चुकी हैं. हालांकि, धारणाओं में भिन्नता है और सबसे आम राय यह है कि यूपीए और राजग के बीच शासन के गुणधर्म और क्रियाविधि का अंतर गैर-मामूली है. 
 
वास्तविकता में, प्रधानमंत्री मोदी ने यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त प्रयास किए हैं कि उनके पूर्ववर्ती की तुलना में प्रशासनिक मशीनरी दक्षता के उच्चतम स्तर पर कार्य करे. लेकिन, सरकार के बाहर के लोगों को इन में से बहुत कम बदलाव दिखाई दे रहे हैं जिसका परिणाम यह हुआ है कि भाजपा के पक्ष में मतदान करने वाले लोग निराशा महसूस कर रहे हैं. नई सरकार से अपेक्षित परिवर्तनकारी प्रशासनिक बदलाव लाने के प्रति भारतीय जनता पार्टी के सतर्क रुख ने प्रधानमंत्री मोदी के प्रशंसकों में इस धारणा को जन्म दिया है कि प्रधानमंत्री अखिल भारतीय शासन के मॉडल को तैयार करने की प्रक्रिया पर उसी तरीके से काम कर रहे हैं जैसा उन्होंने गुजरात प्रशासन का कार्यभार संभालने के दो वर्ष के भीतर किया था. 
 
इसके विपरीत, प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने उद्योग मंत्री के रूप में 1990 की सुधार प्रक्रिया को शुरू करने के लिए उद्योग व अन्य मंत्रालयों की शक्तियों को घटाना शुरू कर दिया, हालांकि इसका श्रेय मनमोहन सिंह को दिया गया, जिनकी एक सुधारक की छवि को प्रधानमंत्री के रूप में एक नम्र अर्थशास्त्री के उत्साहहीन प्रदर्शन के कारण कुछ हद तक क्षति पहुंची थी. इसका बहाना यह दिया गया कि सोनिया गांधी इसकी अनुमति नहीं देगी, जैसे भारत के प्रधानमंत्री के पास अपनी इच्छा को लागू करने के लिए साधनों का अभाव हो. 
 
दिलचस्प बात यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव तक आते-आते लगातार दो वर्ष तक सोनिया गांधी और उनके करीबी सहयोगियों पर लगाए गए आपराधिक आरोपों की झड़ी के बावजूद, वे अभी तक टीम मोदी के हाथों कानूनी प्रतिकार से बचते आ रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप कांग्रेस को एकबार फिर से पलटवार करने और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भ्रष्टाचार का मुकाबला करने के लिए कुछ न करने का आरोप लगाने का मौका तोहफे में दिया गया है. स्पष्ट रूप से, नई सरकार की नौकरशाही पर न केवल नीति-कार्यान्वयन में बल्कि नीति-निर्माण के लिए भी निर्भरता मोदी से अपेक्षित शासनात्मक परिवर्तन की प्रक्रिया में मददगार साबित नहीं हुई है, क्योंकि नौकरशाही को दोहरी गलती के प्रति सतर्क रहने और परिवर्तन के प्रति संकुचित दृष्टिकोण के लिए जाना जाता है. 
 
हालांकि ऐसा माना जाता है कि प्रधानमंत्री कम करों, कम विनियम और राज्य पहल की तुलना में निजी पहल पर निर्भरता में विश्वास करते हैं, ऐसा सिद्धांत अभी तक उनकी सरकार के कामकाज में प्रतिबिंबित होता दिखाई नहीं पड़ता है. समय आ गया है कि इसमें बदलाव हो. भाजपा का बिहार पर ध्यान केंद्रित है और यह तय है कि बिहार में पराजय परिवर्तन लागू करने की केंद्र सरकार की छवि को ही नहीं बल्कि उसकी क्षमता को भी नुकसान पहुंचाएगी. प्रगति के लिए प्रणाली का प्रेरणा के उच्च स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है और जब तक अधिकारी नरेंद्र मोदी की परिवर्तनकारी इच्छाशक्ति में विश्वास नहीं करते, वे अर्थव्यवस्था को दोहरे अंकों के ट्रैक पर ले लाने के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं करेंगे. 
 
मोदी को परिवर्तन-प्रतिरोधी नौकरशाहों को उन्हें धीमा करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए. एक शुरुआत के लिए, जो महत्वपूर्ण विधेयक एक वर्ष से अधिक समय तक स्थगित पड़े हैं उन्हें पारित किए जाने के लिए महीने के अंत में संसद का विशेष सत्र बुलाया जाना चाहिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रणाली में परिवर्तन करने के लिए निर्वाचित किया गया था और नरसिंह राव की तुलना में कहीं अधिक व्यापक रूप से राज्य की कई एजेंसियों की शक्तियों को घटाना इसे प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका होगा. 
 
जाति के नाम पर लालू प्रसाद यादव को खदेड़ने का प्रयास करने के बजाय भाजपा को यह आवश्यक रूप से दिखाना चाहिए कि यह वो बदलाव ला रही है जिसकी मतदाताओं ने इससे अपेक्षा की थी. उदाहरण के लिए, भूमि विधेयक को पारित न करना, केवल इस धारणा की पुष्टि करेगा कि यह किसान विरोधी था, जबकि वास्तव में, यह इस संदर्भ में विकास-समर्थक है जहां खेतों में काम कर रहे 20 करोड़ श्रमिकों को दरिद्रता के शिकंजे से बचने के लिए अन्य व्यवसायों की ओर बढ़ने की जरूरत है. मोदी को ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ की विचारधारा को सफल करना होगा. 
 
बिहार के मतदाताओं ने 2014 में दिखाया था कि वे ऐसे नेता को चुनने में जाति और समुदाय के पार जा सकते हैं जो कुछ करने का संकल्प रखता हो और राज्य को संप्रदाय प्रेरित राजनीति से बाहर निकालकर आधुनिक दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की ओर ले जाने का वायदा करता हो. अब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत है, उन्हें दिखाना होगा कि वह केंद्र में परिणाम दे सकते हैं, ताकि बिहार के मतदाता उनकी पार्टी को शासन करने के लिए जनादेश दे सकें. आखिरकार, यह उनके मंत्रिमंडल का दिल्ली में प्रदर्शन ही है जिसे भारतीय इतिहास और परंपराओं में शानदार जड़ों वाले राज्य में मतदाताओं द्वारा गिना जाएगा. 
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)