नई दिल्ली. लोकतंत्र के तहत, एक पार्टी हमेशा यह सिद्ध करने में अपनी प्रमुख ऊर्जाएं समर्पित कर देती है कि दूसरी पार्टी शासन करने के अयोग्य है, और दोनों आमतौर पर सफल रहते हैं व सही होते हैं. एक जीवंत लोकतंत्र में, सत्तारूढ़ पार्टी वह होती है जो जानती है कि शासन किस प्रकार किया जाता है और एक प्रभावशाली विपक्ष वह है जो जानता है कि अफसोस प्रकट किस प्रकार किया जाता है. 
 
पिछले कुछ माह की घटनाओं ने सिद्ध किया है सत्तारूढ़ दल और विपक्ष, दोनों, अपने-अपने कार्यों को सही तरीके से अंजाम देने में असमर्थ रहे हैं. संख्यात्मक संदर्भ में, यह असमान पक्षों के बीच की लड़ाई रही है. लोकसभा में 310 सदस्यीय राजग सरकार का मुकाबला 55 सदस्यीय यूपीए गठबंधन के साथ है. चार सप्ताह तक चली इस कोलाहलपूर्ण प्रतियोगिता में, दोनों ने सदन को अपनी शर्तों पर न चलने की अनुमति देकर अपनी जीत की घोषणा की. 
 
भारतीय संसद किसी सार्थक विधायी कार्य के संचालन करने का मंच नहीं रह गई है. पिछले सत्र की घृणित हरकतों ने जनता की इस धारणा को और मजबूत किया है कि भारत को इस कठोर हकीकत के साथ जीना होगा कि लोकतंत्र का प्रमुख स्तंभ उन्हीं लोगों की सनकपन के बोझिल वजन तले धराशायी हो रहा है जिनसे इसका उचित संचालन सुनिश्चित करने की उम्मीद की जाती है. लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी की हतोत्साहित अवस्था सभी को हैरान करती है जिसका नेतृत्व इस देश के सबसे लोकप्रिय और शक्तिशाली प्रधानमंत्रियों में से एक के द्वारा किया जा रहा है. 
 
स्वतंत्रता के बाद से ऐसा शायद पहली बार हुआ है कि लोकसभा में 44 सदस्यीय कांग्रेस के अलोकतांत्रिक व्यवहार का विरोध प्रकट करने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी के एक दर्जन से अधिक मंत्री सड़कों पर उतर आए. करुणा-रंजित इस जुलूस का नेतृत्व और किसी द्वारा नहीं बल्कि प्रशासन द्वारा प्रदर्शित तानाशाही प्रवृत्तियों के विरोध के खिलाफ कई झड़पों के अनुभवी, भाजपा के भीष्म पितामाह, लालकृष्ण अडवाणी द्वारा अपने अन्य सहयोगियों जैसे गृहमंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और नितिन गडकरी के साथ किया जा रहा था. 
 
भाजपा नेतृत्व ने उन सभी 44 निर्वाचन क्षेत्रों में चार सांसदों के साथ एक केंद्रीय मंत्री को रवाना करने का भी फैसला किया है, जहां से कांग्रेसी प्रत्याशी निर्वाचित होकर लोकसभा तक पहुंचे हैं. इस कार्यनीतिक दल का उद्देश्य विकास के प्रति विपक्ष के नकारात्मक दृष्टिकोण को बेनकाब करना था. यह और बात है कि अधिकांश कांग्रेसी सांसद ऐसे राज्यों से हैं जिनमें भाजपा को अधिक अहमियत नहीं दी जाती, लेकिन जब सत्तारूढ़ पार्टी विपक्ष बनने का चयन कर ले, यह हमारे लोकतांत्रिक संस्थानों की बढ़ती हुई प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े करता है. 
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के साथ भविष्य में होने वाले सभी टकरावों का लहजा निर्धारित कर दिया है. उन्होंने भाजपा संसदीय दल को बताया कि कांग्रेस एक परिवार को बचाना चाहती है जबकि भाजपा इस देश का बचाना चाहता है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने तुरंत इसका जवाब देते हुए कहा कि मैं यहां इस देश के नागरिकों की आजादी की रक्षा करने के लिए आया हूं, मैं यहा देश को नरेंद्र मोदी से बचाने के लिए आया हूं. यह साफ हो चुका है कि गांधी परिवार को ध्यान में रखते हुए, एकबार फिर, युद्ध की रेखाओं को रेखांकित किया जा रहा है. 
 
मोदी के आह्वान से 1971 की यादें ताजा हो उठती हैं जब एकजुट विपक्ष ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को निशाना बनाया था. तब इंदिरा गांधी की पार्टी ने ‘वो कहते हैं इंदिरा हटाओ, हम कहते हैं गरीबी हटाओ’ का एक जबर्दस्त नारा गढ़ा. धरने और प्रदर्शन लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करने का अभिन्न हिस्सा हैं, लेकिन यह विपक्ष ही है जो इन दांव-पेंचों का ज्यादातर इस्तेमाल करता है. पिछले 68 वर्ष के दौरान, यह मुख्य तौर पर गैर-कांग्रेसी पार्टियां ही हैं जिन्होंने सत्तारूढ़ कांग्रेस को सदन में कठिनाई में डालने पर असफल रहने के बाद इन दांव-पेंचों का इस्तेमाल किया है. 
 
जब भाजपा 1998 से लेकर 2004 तक सत्ता में रही तब कांग्रेस ने भी ऐसा ही व्यवहार अपनाया, लेकिन जब कांग्रेस सत्ता में थी, उसके मंत्रियों और नेताओं ने कभी भी विपक्ष के खिलाफ विरोध प्रकट करने के लिए सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन नहीं किया. कांग्रेस को संसद जैसे लोकतांत्रिक संस्थानों के लिए सबसे राक्षसी खतरे के रूप में चित्रित करना राजग सरकार के विरोध मार्च की सबसे अनोखी बात थी. केवल 15 माह पहले ही, देश ने कांग्रेस को सदन में एक वैध विपक्ष के दर्जे से भी वंचित रखते हुए इसे खारिज कर दिया था. 
 
उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, गुजरात और हरियाणा जैसे प्रमुख राज्यों में कांग्रेस को लगभग जड़ से ही उखाड़ दिया गया. मतदाताओं ने न ही सोनिया गांधी और न ही राहुल गांधी को गंभीरता से लिया. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी चुनावी जनसभाओं में 1 हजार लोग भी जुटा नहीं पाए. एक वर्ष बाद, मां-पुत्र की जोड़ी में जैसे एकाएक नए साहस का संचार हो गया है और संसद की कार्यवाही पर दबाव पाने के लिए गैर-भाजपा विपक्षी दलों में कृत्रिम एकता भी बना दी है. गांधियों के लिए, उनका निजी वर्चस्व किसी अन्य चीज की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. 
 
ऐसा प्रतीत होता है कि राजग नेतृत्व इस विनाशकारी जत्थे की हानिकारक क्षमता को मापने में नाकाम रही है. कई मोर्चों पर विश्वसनीय प्रदर्शन के उत्कृष्ट रिकॉर्ड के साथ, प्रधानमंत्री और उनकी टीम सरकार के प्रदर्शन का ठोस सबूत पेश करने आलोचकों का मुंह बंद कर सकती थी. स्वतंत्रता दिवस पर मोदी के दूसरे भाषण में सरकार की कई महत्वपूर्ण उपलब्धियों को सूचीबद्ध किया गया. यह समझा जा सकता है कि कांग्रेस जैसी पार्टी के साथ निपटना कठिन है जो भाजपा द्वारा प्रस्तावित किसी भी कानून को पारित कराने की राह में अवरोध उत्पन्न करने के लिए प्रतिबद्ध है.  
 
फिर भी, राजग सरकार के रणनीतिकार विपक्ष को विभाजित करने और कांग्रेस को समझौता करने के लिए मजबूर करने के लिए कोई भव्य राजनीतिक योजना या मीडिया रणनीति ईजाद न कर सके. सत्र के अंतिम भाग में भाजपा ने कुछ रियायतें जरूर दीं लेकिन कांग्रेस, जिसे विजय की सुगंध आ चुकी थी, ने संसद में कार्य होने के हर प्रयास को नाकाम कर दिया. जैसा कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने कहा था कि लोकतंत्र का अर्थ है सरकार के जरिए विचार-विमर्श, लेकिन यह तभी प्रभावी है जब आप लोगों को बातें करने से रोक सकें. 
 
मोदी के समक्ष इन दोनों सिद्धांतों की दोनों पक्षों द्वारा अनुपालना सुनिश्चित कराने की चुनौती है. कांग्रेस अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही है. मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को 2014 में मतदाताओं से किए गए वायदों को एक-एक करके पूरा करना होगा. विरोध मार्च सुशासन के विकल्प नहीं हो सकते. नरेंद्र मोदी की सफलता राजनीति के वर्तमान सत्ता के खेल को एकबार फिर ‘नमो बनाम गांधी’ मुद्दा न बनने देने में निहित है. आखिरकार, उन्होंने ऐसे ही 2014 में भारतीय मतदाता का अभूतपूर्व जनादेश प्राप्त किया था.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)