नई दिल्ली. सार्वजनिक बहस और कथाओं से व्यक्तियों से नहीं, बल्कि मुद्दों और विचारधाराओं से निपटने की उम्मीद की जाती है, लेकिन नई राजनीति के लेखक, प्रतिपालक और विक्रेता, और यहां तक कि नए ज़माने की पत्रकारिता भी अब सार्वजनिक आचरण के नए मानकों की स्थापना कर रहे हैं. भले ही उनमें बौद्धिक क्षमता और आत्म-पहचान का अभाव है, यह कृत्रिम बुद्धिजीवी और नव नैतिकतावादी न्यायपालिका, कार्यपालिका, पत्रकारिता और राजनीति जैसे अत्यावश्यक संस्थानों की भूमिका और संचालन को परिभाषित कर रहे हैं. 

निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों को संग्रहित करने की बजाय, वे अपने निष्कर्षों को सहारा देने के लिए चयनात्मक जानकारी या कोरी कल्पनाओं पर आश्रित रहते हैं. भारतीय राजनीति में ढिठाई से कुछ विचित्र घटित हो रहा है. पूर्व आईपीएल चीफ ललित मोदी पर चल रहा शब्दों का कटु युद्ध शासन अथवा नीति से संबंधित किसी मुद्दे तक सीमित नहीं है. यह बस ललित मोदी द्वारा सुबह के समय कुछ व्यक्तियों के बारे में किए गए ट्वीटर संदेशों के ईर्द-गिर्द घूमता है. सभी राजनीतिक दल और मीडियाकर्मी मोदी के शरारतपूर्ण ट्वीटर संदेशों पर आंखे जमाए बैठे रहते हैं ताकि उसके द्वारा उल्लिखित व्यक्तियों की छवि को बनाया अथवा बिगाड़ा जा सके. 

धनशोधन, मैच-फिक्सिंग या राजनीतिक अनौचित्य पर सवाल नहीं उठाए जाते, लेकिन ललित गाथा पर समर्थकों और विरोधियों की सत्यनिष्ठा पर सवाल उठाए जाते हैं. यहां तक कि नाटक के पात्रों के नामों का भी चुन कर रहस्योद्घाटन किया जाता है और उसके बाद उन पर तब तक चर्चा की जाती है जब तक उनसे घृणा न हो जाए. ललित मोदी के करीबी सूत्रों के अनुसार, कॉरपोरेट और कानूनी जगत, बॉलीवुड, खेल और संस्कृति से 50 से भी अधिक प्रमुख हस्तियों ने लंदन की अदालतों की कार्यवाही में भाग लिया जहां ललित मोदी के खिलाफ केस की सुनवाई हो रही है. रहस्यपूर्ण ढंग से, संवाद सूची पर केवल कुछ ही नाम हैं जबकि अन्य नामों को अज्ञात कारणों से छुपा कर रखा जा रहा है.
  
एक मुद्दे पर रुख लेने में कुछ भी गलत नहीं है. आखिरकार हर कहानी के दो पहलू होते हैं मैं उन गवाहों में से एक था जो अपनी व्यक्तिगत क्षमता में, और अपने खर्चे पर, सुनवाई में भाग लेने के लिए आज से तीन वर्ष पूर्व लंदन गया था. मेरा रुख एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध के सवाल तक सीमित था जिसने विश्व की सबसे बेहतरीन स्पोर्टज लीग बनाई, जिसने वर्ष 2014 में 7.2 अरब अमेरिकी डॉलर का राजस्व उत्पन्न किया और कई खिलाड़ियों, खेल प्रशासकों और टीम मालिकों को मालामाल और शक्तिशाली बना दिया. लेकिन जो कोई भी सफलता के नशे में चूर हो जाता है उसे अहंकार और अभिमान अपनी गिरफ्त में ले ही लेते हैं. ललित मोदी के साथ भी ऐसा ही हुआ. वह अभिमानी बन गया और उसने बीसीसीआई के शक्तिशाली पदाधिकारियों से मुकाबला करना शुरू कर दिया. 

अदालत में मेरा अभिसाक्ष्य इस आम धारणा तक सीमित था कि ललित मोदी को कथित वित्तीय अपराधों के लिए विशेष रूप से चुना गया जबकि फैसले लेने वालों में शामिल आईपीएल और बीसीसीआई के अन्य शक्तिशाली सदस्यों को जांच एजेंसियों ने बख्श दिया. ब्रिटेन की शीर्ष न्यायपालिका ने सभी लिखित अभिसाक्ष्यों और गवाहों को विश्वसनीय पाया. लेकिन भारतीय न्यायदाताओं ने उन लिखित अभिसाक्ष्यों और गवाहों को संदिग्ध पाया. वे ललित मोदी और शाह जैसे लोगों पर सतर्क फैसले देने में खुश हैं लेकिन जब बात गांधियों की आती है तब वे पीछे की ओर मुड़ जाते हैं. सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी के वर्तमान व्यवसायिक ठेकेदार, जस्टिस जीवन रेड्डी सहित हर उस व्यक्ति को कलंकित करने का प्रयास कर रहे हैं जो बयां करते हैं कि कानूनी तौर पर सही क्या है. 

इस तरह के अप्रासंगिक दोषारोपण लोकतंत्र के सत्य पर एक अन्य मौलिक सवाल उठाते हैं. क्या केवल इसलिए कि एक व्यक्ति न्यायाधीश, मंत्री या संपादक रह चुका है, उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई मौलिक अधिकार नहीं है? क्या एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश या प्रमुख पत्रकार द्वारा दी गई एक ईमानदार राय या तथ्यात्मक गवाही को बिना किसी सबूत के प्रतिकारी कृत्य के रूप में माना जा सकता है? लेकिन त्वरित न्याय देने वाली बेकायदा भीड़ का मानना है कि कोई भी अपना विचार नहीं व्यक्त कर सकता. चूंकि सत्ता और मीडिया का नियंत्रण उनके हाथों में है, वे अपने खुद के लज्जाजनक अतीत को भूल कर अन्य लोगों द्वारा किए गए कथित अनुचित कार्यों को लेकर दिन प्रतिदिन हल्ला मचा सकते हैं. 

भारतीय मीडिया और ईमानदारी के अन्य स्वयंभू देवता कई दागी कॉरपोरेट घरानों को क्लीन चिट देते हैं या वो जानकारी छुपाते हैं जो उनके मित्रों को प्रभावित कर सकती है, लेकिन पक्षपात के किसी भी आरोप से उन्मुक्ति का दावा करते हैं. दुर्भाग्य से, लोगों की नैतिकता के बारे में भाषण देने वाले वही लोग हैं जिन्हें सरकार से निदेशक पदों, विदेशी कार्यभारों और विशेषज्ञ समूह पदों के रूप में संरक्षण प्राप्त हुआ है. यह काफी हद तक स्पष्ट है कि ललित मोदी प्रकरण, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को हानि पहुंचाने का और उनके साथ व्यक्तिगत हिसाब बराबर करने का एक कुटिल प्रयास है.

भाजपा बीते एक वर्ष से सही दावा करती आ रही है कि उसने एक घोटाला-मुक्त सरकार प्रदान की है. विपक्ष किसी भाजपा नेता अथवा केंद्रीय मंत्री के खिलाफ वित्तीय भ्रष्टाचार का कोई विश्वसनीय सबूत पेश करने में असमर्थ रहा है. अगर भाजपाई सूत्रों पर यकीन किया जाए तो नीच क्रिकेट राजनीति के लिए राष्ट्रीय राजनीति एक पिच बन चुकी है. चूंकि विपक्ष एवं राजग सरकार के कुछ शीर्ष नेता इस अरबों डॉलर के क्रिकेट-मनोरंजन उद्योग में सक्रिय भागीदार हैं, वे खेल एवं पार्टी के निर्णय लेने वाले न्यायाधिकरण पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण बनाए रखने के लिए अपने ही सहयोगियों पर कीचड़ उछाल रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों से, किसी भी क्रिकेट घोटाले में किसी भी शक्तिशाली हस्ती के खिलाफ कोई भी प्रकट कार्रवाई नहीं की गई है. यहां तक कि भाजपा के सांसद भी एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं. 

इसने विशेष रूप से प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि को आनुषंगिक क्षति पहुंचाई है जो विशेष रूप से शासन पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. नरेंद्र मोदी के आलोचक उनकी छवि को धूमिल करने के लिए हरसंभव प्रयास करते हुए दिखाई पड़ते हैं. यह एक प्रधानमंत्री के रूप में उनके अधिकार को धीरे-धीरे नष्ट करने का प्रयास भी है. कांग्रेस मोदी की छवि को धूमिल करने के लिए ललितगेट को एक स्वर्णिम अवसर के रूप में देखते हैं. जब भाजपा मंत्री एक-दूसरे से खुद को साफ-सुथरा एवं ईमानदार सिद्ध करने की होड़ में लगे हैं, कांग्रेस का उद्देश्य है कि ललितगेट में शामिल नेताओं में से कम से कम एक को झूठा सिद्ध किया जाए ताकि नरेंद्र मोदी अपने शेष कार्यकाल के लिए पंगु बने रहें. 

अगर एक 44 सांसदों वाली पार्टी उनके कार्यकाल के 14 माह के भीतर ही प्रधानमंत्री की 56 इंच की छाती पर एक कटु राजनीतिक घाव दे सकेगी, तो उनके जैसे राष्ट्रवादी नेता के लिए इससे बुरी बात क्या होगी. इसके अलावा, वामदलों से लेकर कांग्रेस तक, गैर-भाजपा नेतृत्व का पूरा जत्था महत्वपूर्ण बिहार चुनावों के अभियान के दौरान एक बेहद हतोत्साहित प्रधानमंत्री और विभाजित भाजपा का स्वागत करेगा. नरेंद्र मोदी को बेहद सर्तकता के साथ अपने शत्रुओं को निशाना बनाना होगा और बुद्धिमत्ता के साथ अपने मित्रों का चयन करना होगा, इसके अलावा उनके पास और कोई विकल्प नहीं है. उन्हें पता लगाना होगा कि उनकी विफलताओं के लाभकर्ता कौन हैं.