नई दिल्ली. राजनीति और धर्म दोनों ही ऐसे विषय हैं जिन्हें कभी भी अलग नहीं किया जा सकता है. चिंतन इस बात पर होना चाहिए कि राजनीति की दिशा और दशा क्या है क्योंकि ये दोनों ही विषय हर वर्ग के जीवन को प्रभावित करते हैं. राजनीति और धर्म का संबंध आदिकाल से है. बस हमें धर्म का अभिप्राय समझने की जरूरत है. इस वक्त धर्म की राजनीति को लेकर तमाम सवाल, आरोप-प्रत्यारोप उठ रहे हैं. हमें इन आरोप-प्रत्यारोपों से कोई सरोकार नहीं है, बल्कि यही कहना है कि धर्म के बिना समर्थ और सार्थक राजनीति नहीं हो सकती है.  

वैदिक काल में जब हम जाते हैं तो यही देखने को मिलता है कि धर्म हमें जोड़ने और जनहित में काम करने का पाठ पढ़ाता था. यह इतना सशक्त था कि राजा भी इसके विरुद्ध कोई आचरण नहीं कर सकता था. ऐसा होने पर धर्म संगत निर्णय लेकर राजा को भी दंडित किए जाने की व्यवस्था थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सबसे प्राचीन वैदिक ज्ञान से उत्पन्न हुए योगासन का महत्व समझा और उसको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थान दिलाने के लिए प्रयास किया. 
वैश्विक स्तर पर योग का महत्व समझा गया और ‘विश्व योग दिवस’ को मान्यता प्रदान की गई. 

यह हमारे देश, समाज, राजनीति और योगियों के लिए सम्मान का विषय था मगर कतिपय दलों ने यहां भी इस गर्व को अंगीकृत करने के बजाय उसकी कोरी आलोचना करने का मार्ग अपनाया. सिर्फ तुष्टीकरण की कोशिशों और मोदी के प्रयास को नीचा दिखाने के लिए. विश्व समाज ने धर्म के नामपर होने वाले तुष्टीकरण से ऊपर उठकर इसे स्वीकारा और पहले ही दिन योग ने गिनीज बुक में अपने दो रिकॉर्ड बना लिए. मुस्लिम राष्ट्रों में भी योग को न सिर्फ सराहा गया बल्कि योगासन भी किए गए. 

यह उन लोगों और दलों के लिए एक संदेश है कि गलत और भ्रमित करने वाली राजनीति के साथ आमजन नहीं खड़ा होता है. हमें 19 जून को श्री आनंदपुर साहिब जाने का अवसर मिला. 9वें गुरु श्री तेगबहादुर सिंह ने 350 साल पहले श्री आनंदपुर साहिब बनाया था. गुरुओं की इस धरती पर यह पावन अवसर था और इसे बड़े उत्सव के रूप में मनाया जा रहा था.  हमने भी माथा टेकने का फैसला किया था. जब यहां पहुंचा तो आयोजन की व्यवस्था देखकर सुखद अनुभूति हुई मगर जब यह धार्मिक आयोजन राजनीति चमकाने का माध्यम बना और गुरुओं को मत्था टेकने आये लोग पीछे रह गए, राजनीतिक लोग आगे हो गए. दुख हुआ कि धर्म और उसकी मान्यताओं को बढ़ावा देने के प्रयास के रूप में देखे जाने वाले पवित्र गुरुद्वारा परिसर में राजनीतिक मैदान बन गया था. 

सत्तारूढ़ दो राजनीतिक दल ही सिख विरासत के ठेकेदार बने दिखाई दिए. अन्य दलों से जुड़े लोगों का सिख धर्म से कोई वास्ता ही न हो? उस वक्त सवाल वहीं आकर खड़ा हो गया कि प्रथम गुरु श्री नानक देव जी से लेकर दशम गुरु श्री गोविंद सिंह जी ने क्या यह शिक्षा दी थी कि हमारे नाम पर तुम अपनी सत्ता और राजनीतिक मैदान तैयार करो. गुरुओं ने जो शिक्षा दी थी, वह तो पीछे रह गई. ऐसे में सवाल उठना लाजमी था कि राजनीति धर्म के लिए हो रही है या राजनीति के लिए धर्म की आड़ ली जा रही है ? सवाल वहीं खड़ा है और सिख धर्म को मानने वाले खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं क्योंकि धर्म के कार्यों के प्रबंधन करने वाली शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटियों द्वारा यह आयोजन किया गया था मगर वह सिर्फ नाम के लिए थी. प्रबंधन तो राजनीतिक लोगों के इशारे पर हो रहा था, धर्म के लिए नहीं बल्कि राजनीति के लिए. 

सबसे प्राचीन भारतीय पद्धति योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली. इसके महत्व को समझा गया और वैश्विक स्तर पर अंगीकृत किया गया मगर देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने इसका बायकॉट किया. उसके साथ ही कुछ उन दलों ने भी बायकॉट किया जो खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने से नहीं चूकते. उन्हें यह बात समझनी चाहिए कि उनके सबसे बड़े नेता महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी सभी योग करते थे और योग के समर्थक थे. पंडित नेहरू ने ही देश में पहले आयुष विभाग की स्थापना की थी और योग को मान्यता दी थी. 

बात साफ है यदि धर्म निरपेक्ष है तो किसी भी धर्म का पक्ष लेना गलत है, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, सिख या ईसाई. उनकी नजर में सभी धर्म और उनकी मान्यताएं समान होनी चाहिए. ऐसे में योग को किसी धर्म के तुष्टीकरण के चश्मे से देखना निहायत निंदनीय है. अब कांग्रेस सहित कथित अन्य धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल यही कर रहे हैं. वह सही बात को सही तरीके से लेने के बजाय धार्मिक तुष्टीकरण की राजनीति के जरिए अपना आधार बनाना चाहते हैं जो निहायत गलत और निंदनीय है. 

हमारा देश करीब 800 साल तक मुस्लिम शासकों के अधीन रहा मगर तब भी हिंदू, सिख, ईसाई और बौद्ध धर्म फला-फूला. कुछ मुस्लिम शासकों ने क्रूर व्यवाहर किया तो वह भी नष्ट हुए और उनका राज्य भी. धर्म और राजनीति का संबंध सिर्फ भारतवर्ष में ही नहीं रहा बल्कि विश्व अधिकतर देशों में देखने को मिलता है. कहीं ईसाइयत के साथ राजनीति का नाता है तो कहीं यहुदियों और इस्लामिक कट्टरता से इसका नाता है. कहीं बौद्ध और अन्य धर्म के अनुयायी राजनीतिक संबंध बनाते हैं. इसका यह मतलब कतई नहीं कि हम सही और सार्थक बातों को स्वीकार न करें. धर्म का अर्थ है ‘नैतिकता, मूल्यों, प्रतीकों, अनुष्ठानों और मिथकों’ से. उच्च स्तर की नैतिकता धर्म है. 

मूल्यों यानी आदर्शों पर आधारित कर्तव्य धर्म हैं. आदर्श गुरुओं, ईष्ठों के प्रतीकों का सम्मान करना धर्म है और लोकहित के लिए अनुष्ठान करना धर्म है. मिथकों को समझना और उनको उचित स्थान देना धर्म है. हमने सभी धर्मों का मंतव्य समझा है मगर किसी भी धर्म में हमें वैमनस्यता और असहिष्णुता का पाठ नहीं मिला. वैसे हम वैदिक धर्म का पालन करते हैं मगर सभी धर्मों के तीर्थों पर जाते और उनका उचित सम्मान करते हैं. वहां के मुताबिक आचरण भी करते हैं इससे हमारा न तो धर्म बदलता है और न हमारे धर्म का सम्मान कम होता है. देश के कुछ राजनीतिक दल जिस तरह से कुछ जातियों और धर्मों के नाम पर राजनीति करके खुद को कथित ‘सेकुलर यानी धर्मनिरपेक्ष’ होने का स्वांग रचते हैं वह दुखद है. 

बीजेपी हो या कांग्रेस दोनों को ही धर्मनिरपेक्ष राजनीति करनी चाहिए, जिसमें हिंदू धर्म को भी वही सम्मान मिले जो इस्लाम, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन धर्म को मिलता है. सभी धर्मों की लोकहित की नीतियों और पद्धितियों को अंगीकृत किया जाए. सिर्फ इस कारण से किसी से दूरी बनाने की कोशिश न की जाए कि यह दूसरे धर्म की किताब में लिखी है. हमारा मानना है कि धर्म के अंतरनिहित सिद्धांतों और लोकहित की पद्धतियों को अपनाने के लिए राजनीति होनी चाहिए न कि राजनीति को चमकाने के लिए तुष्टीकरण और भेदभाव की राजनीति. यदि योगासन हमारे लिए हितकर है तो उसे अपनायें और जो चीजें हितकर नहीं हैं उन्हें त्यागें. हम सार्थक दिशा में चलें और सभी को जोड़ने के लिए धर्म का सदुपयोग करें न कि तोड़ने के लिए. योग हमें स्वस्थ्य बनाता है तो उसे स्वीकारने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए. 

जय हिंद !