आम आदमी पार्टी की सरकार और कार्यकारी प्रमुख, लेफ्टिनेंट गवर्नर के बीच टकराव ने जनता के ध्यान में लाया है कि किस प्रकार भारतीय लोकतंत्र में जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों की तुलना में नौकरशाही अधिक मजबूत बनी हुई है. इस पर केंद्र ने लेफ्टिनेंट गर्वनर और निर्वाचित सरकार की शक्तियों को परिभाषित करने के लिए एक अधिसूचना जारी की थी और राजधानी में गतिरोध के जवाब में कुछ लक्ष्मण रेखाएं भी नियत की गई.गृह मंत्रालय की अधिसूचना पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यह घोषणा करके प्रतिक्रिया दी कि लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग केंद्र के राज प्रतिनिधि हैं, यानी दिल्ली के सीएम ने यह संकेत दिया कि वह ऐसी राय से सहमत नहीं हैं. लेकिन केजरीवाल- जंग के बीच जो सवाल उठता है, वो ये कि क्या नौकरशाही को विधिवत निर्वाचित सरकार को उसकी पसंद के अधिकारियों के माध्यम से कार्य करवाने से वंचित रखने के लिए संवैधानिक प्रावधानों की आड़ में शरण लेनी चाहिए? नकारात्मक उद्देश्यों के लिए संवैधानिक सदर्भ नहीं दिए जाने चाहिए और अगर ऐसे प्रावधान हैं, जो लेफ्टिनेंट गर्वनर के लिए कुछ शक्तियां निर्धारित करते हैं, फिर भी निर्वाचित सरकार को उसके चयन के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाना चाहिए. 

दिल्ली में संपूर्ण मुद्दे को बहुत खराब तरीके से नियंत्रित किया गया. केजरीवाल व जंग के बीच टकराव को आसानी से टाला जा सकता था. राजधानी में जो कुछ भी हो रहा है उसे इसके साथ संयोजन के रूप में देखा जाना चाहिए कि निर्वाचित सरकारों की शक्तियों को सीमित करने वाला वर्तमान कानून किस प्रकार अस्तित्व में आया. भारतीय नौकरशाही, किसी न किसी बहाने पर, राष्ट्रीय राजधानी पर अपनी पकड़ छोड़ देने के विचार के साथ कभी भी सुखी नहीं रही और दिल्ली के लोगों को उनके अधिकारों से वंचित रखने के लिए राजनीतिक नेतृत्व को प्रभावित करने में सफल रही है.वर्ष 1989 में महानगर परिषद और नगर निगम को भंग करने के बाद, उपयुक्त विकल्प खोजने के लिए और इसके साथ ही राजधानी में प्राधिकरण की बहुलता को समाप्त करने के लिए न्यायमूर्ति आरएस सरकारिया आयोग का गठन किया गया था. न्यायमूर्ति सरकारिया से ज्यादा मेहनत करवाई गई और बाद में बालाकृष्णन द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया था, एक नौकरशाह, जिसने आखिरकार अंतिम रिपोर्ट तैयार की. पीवी नरसिंह राव की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार द्वारा स्वीकार की गई सिफरिश ने प्राधिकरण की बहुलता को समाप्त नहीं किया, लेकिन वास्तव में नौकरशाही के अधिकारों मे बढ़ोत्तरी की. नागरिक निकाय में, कमिश्नर महापौर से अधिक महत्वपूर्ण बन गया. इसके साथ ही, सिफारिशों ने निर्वाचित निकायों की शक्तियों को मंद कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप एक खंडित नगर निगम और एक अप्रभावी विधानसभा का गठन हुआ. कुछ वर्ष पहले नौकरशाही की सक्रिय मिलीभगत के जरिए दिल्ली का नगर निगम तीन शाखाओं में विभाजित हो गया था.

कानून के प्रभाव में आने के बाद दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना, वर्षों के आंदोलनों और सड़कों पर संघर्षों से अर्जित अपनी महता के कारण कुछ शक्तियों को हड़पने में सफल रहे. राव सरकार ने पीके डेव को लेफ्टिनेंट गवर्नर के रूप में नियुक्त किया, लेकिन वह खुराना को वश में नहीं कर सके, जिनका दिल्ली के लिए अपना एक अलग सपना था. खुराना मुख्यमंत्री कार्यालय को और अधिक शक्तिशाली बना सकते थे, लेकिन उनके इस्तीफ ने उनके कार्यकाल को समय से पहले समाप्त कर दिया और जो उनके बाद आए, उनकी प्रशासन पर खुराना जैसी पकड़ नहीं थी. वहीं एक नौकरशाह की पत्नी होने के नाते, शीला दीक्षित ने हमेशा यह प्रभाव छोड़ा और निर्वाचित विधायकों को निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रखा गया. यह अभिलेख की बात है कि बेहद मुखर और आलोचनात्मक उमेश सहगल को छोड़कर दिल्ली सरकार का कोई भी मुख्य सचिव कभी भी सेवानिवृत्त नहीं हुआ और इसके बजाय किसी दूसरे पद में समायोजित कर दिया जाता था. दीक्षित के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर विजय कपूर के साथ कुछ मतभेद जरूर रहे, लेकिन वे जनता के उपभोग के लिए अधिक थे, क्योंकि उन दोनों में अच्छी बनती थी. अब केजरीवाल एक बिलकुल भिन्न पृष्ठभूमि से आए हैं और ऐसा जनादेश जीता है, जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अभूतपूर्व है इसलिए लोगों की इच्छा को सम्मानित करने के लिए उन्हें वह आदर देना ही होगा.

(यह लेखक के निजी विचार हैं.)