मोदी सरकार के कई शत्रु हैं, इसलिए उन्हें चेन्नई के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के डीन जैसे मित्रों से सबसे अधिक बचाए जाने की आवश्यकता है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उस ‘गुमनाम’ राजनीतिक संदेश को रद्दी की टोकरी के सुपुर्द करने से इंकार कर दिया, जिसमें भीमराव अंबेडकर और पेरियर रामास्वामी नायकर के नाम पर समूह का गठन करने वाले छात्रों के समूह के विचारों के बारे में शिकायत की गई थी. छात्रों के उस समूह ने प्रधानमंत्री की आलोचना करने वाली टिप्पणियां भी की थीं. राहुल गांधी भाग्यशाली हैं कि वह आईआईटी चेन्नई के छात्र नहीं हैं अन्यथा नरेंद्र मोदी पर उनकी नित्य एवं अपमानजनक टिप्पणियों के परिणामस्वरूप निश्चित रूप से मानव संसाधन विकास मंत्रालय में आगे की कार्रवाई के लिए ऐसे ही ‘गुमनाम’ पत्र पहुंच गए होते. इस घटना से यह स्पष्ट है कि मंत्रालय की प्राथमिकताओं में गुमनाम शिकायतों पर कार्रवाई के लिए विशेष स्थान है.

कहीं ऐसा तो नहीं है कि आईआईटी चेन्नई के अंबेडकर-पेरियर समर्थकों के बारे में शिकायत करने वाला ‘गुमनाम’ पत्र वास्तव में गुमनाम नहीं था बल्कि एक ऐसे पहचान योग्य व्यक्ति द्वारा लिखा गया था जिसने संभवत: साहस की कमी के कारण अपनी पहचान बताने से इंकार कर दिया? वह जो कोई भी हो, उस व्यक्ति का स्पष्ट रूप से इतना महत्व तो था कि वह मानव संसाधन विकास मंत्रालय की नौकरशाही को आईआईटी के डीन को यह संकेत देने के लिए प्रेरित कर सके कि, जिसे अधिकांश लोग अनेक विषयों पर कुछ छात्रों द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति के रूप में अप्रासंगिक मामला समझ रहे है, उस पर तात्कालिक कार्रवाई की आवश्यकता है. इन दिनों सीबीआई, सीएजी और सीवीसी की अति-सक्रियता के कारण नौकरशाही के भीतर निर्णय लेने की अनिच्छा विशेष रूप से एक मामला बना हुआ है. इन तीनों सरकारी एजेंसियों ने एक साथ मिलकर सुनिश्चित किया है कि भारत में भ्रष्टाचार लगभग अनुपस्थित है, जैसा कि पिछले कुछ वर्षों में कारावास का सामना करने वाले वरिष्ठ राजनीतिज्ञों एवं नौकरशाह अधिकारियों की अतिसूक्ष्म संख्या द्वारा प्रमाणित है. बेशक, बीते 367 दिनों के दौरान अरुण शौरी ही एकमात्र पूर्व मंत्री रहे हैं जिसके खिलाफ सीबीआई ने स्पष्ट रूप से कार्रवाई की है, जिन्हें आमतौर पर गुणवत्ता और क्षमता के मामले में निम्नतर स्तर का नहीं समझा जाता. मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में ऐसे कई मंत्री हैं जो आश्चर्यजनक रूप से अमीर हैं. इनमें ऐसे मंत्री भी शामिल हैं जिनके खिलाफ विश्वसनीय व्यक्तियों द्वारा गंभीर आरोप लगाए गए हैं. हालांकि, ऐसे प्रभावशाली लोगों में अभी तक सीबीआई द्वारा नगण्य रुचि दिखाई पड़ती है. इसके विपरीत, आईआईटी चेन्नई के प्राधिकारी वर्ग द्वारा परिसर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबा कर रखने के फैसले का कारण बनी शृंखलित प्रतिक्रियाओं की शुरुआत करके मानव संसाधन विकास मंत्रालय के बाबुओं ने नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार की छवि को स्पष्ट रूप से क्षति पहुंचाई है, जिन्हें दुनिया भर में 21वीं सदी के गुणों को समाविष्ट करने वाले राजनीतिज्ञ के रूप में जाना जाता है. अभी भी शासन के औपनिवेशिक तंत्र के गुलाम बने हुए जो नौकरशाहों को अहसास करने की जरूरत है कि 2015 का भारत 1975 का भारत नहीं है, जो लगभग दो वर्षों तक संवैधानिक अधिकारों से वंचित किए जाने के बाद व्यापक रूप से अति दुर्बल बना रहा था. नागरिक 21वीं सदी के लोकतंत्र में निहित स्वतंत्रताओं को संकुचित करने के बजाय उनकी रक्षा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर देखते हैं और सौभाग्य से जैसा कि आईटी अधिनियम के 66ए को निष्फल करने के उदाहरण में देखा गया, न्यायालय ने शायद ही उन्हें कभी निराश किया है.

प्रधानमंत्री मोदी को औपनिवेशिक मानसिकता में अभी भी फंसी हुई नौकरशाही को यह सूचित करने के लिए अपने संचार कौशल का उपयोग करना पड़ेगा कि भारत के लोग राज्य द्वारा अपने अधिकारों के हनन और उनकी स्वायत्तता छीन लेने को अब और अधिक बर्दाश्त नहीं करेंगे. मानव संसाधन विकास मंत्रालय को संस्थानों पर दमघोंटू नियंत्रण रखने के बजाय एक उदार भविष्यवादी प्रवृत्ति का अनुसरण करने की आवश्यकता है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को उसी प्रबल ढंग से दबा कर, जैसा कि 1975-77 के दौरान देखा गया था, आईआईटी चेन्नई ने खुद को शर्मसार किया है. शासनकाल के अपने दूसरे वर्ष में, राजग सरकार को उन स्वतंत्रताओं का विरोध करने के बजाय सख्ती से समर्थन करने की जरूरत है जो भारत के भविष्य का अभिन्न अंग हैं ताकि भारतीयों को भी भारत में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए आवश्यक माहौल मिल सके जिस प्रकार उन्हें अमेरिका जैसे अधिक उदार समाजों में मिलता है.

(यह लेखक के निजी विचार हैं.)