पिछले साल हुए आम चुनावों में देश की सबसे पुरानीराजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने जनाधार खो दिया था. निश्चित रूप से अब उसका सबसे बड़ा काम उस खोए हुए जनाधार को पुन: प्राप्त करना है. वह इसके लिए कोई भी मुद्दा जो जनहित में है, नहीं छोड़ेगी. भाजपा कहें या आज की मोदी सरकार पर जनता ने उस समय पूरा भरोसा जताया था. ऐसा भरोसा कि एक लंबे अरसे बाद कोई राजनीतिक दल अपने बूते सत्ता संभाल सका. इस हालात में भाजपा और मोदी, दोनों की यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह न सिर्फ जनता के भरोसे को सही साबित करें बल्कि उनके हित में ऐसा कुछ करें कि यह जनाधार स्थाई रूप से उनसे जुड़ जाए.

हम उम्मीद करते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कैबिनेट इस दिशा में काम कर रही है. हालांकि अभी हालात मई 2014 से अच्छे नहीं बल्कि बदतर हुए हैं. देश की जनता उन सभी समस्याओं से आज भी रोज रू-ब-रू हो रही है जिनसे वह पहले भी हो रही थी. वहीं कांग्रेस अपनी खोई जमीन पाने के लिए इन समस्याओं को अपना हथियार बनाने की लगातार कोशिश कर रही है मगर जनता अभी भी मोदी सरकार से उम्मीद संजोए बैठी है. भले ही देश के हालात बदलने के लिए मोदी सरकार ने अभी तक कोई ऐसा कदम नहीं उठाया है जो बिल्कुल नया और आमजन के लिए सुखद हो, मगर यह सच है कि उन्होंने अरसे बाद 2013 में भाजपा के सहयोग से किसान हित में बने ‘भूमि अधिग्रहण अधिनियम’ को बदलने की शपथ उठा रखी है. मोदी सरकार ने यूपीए सरकार में बने भूमि अधिग्रहण कानून को सिर्फ इसलिए बदलने का फैसला किया क्योंकि इससे वह मनमाफिक जमीन अधिगृहीत नहीं कर पा रहे. यह भी वजह हो सकती है कि जिन्हें मोदी सरकार भूमि देना चाहती है, उनको 2013 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम की शर्तों के पालन से नुकसान होता दिख रहा है. मोदी खुद मान चुके हैं कि यूपीए सरकार में बने भूमि अधिग्रहण अधिनियम से जमीनें हासिल करना मुश्किल है और यह विकास में बाधक है. वजह चाहे जो भी हो मगर यह सच है कि मोदी 2013 के इस अधिनियम को खारिज कर रहे हैं.

हमने नरेंद्र मोदी पर यकीन किया और उन्हें सक्षम सरकार बनाने का जनादेश दिया था. वह जब देश की संसद में अपना भूमि अधिग्रहण विधेयक पास नहीं करवा पाए तो उन्होंने अध्यादेश के जरिए उसे लागू कर रखा है. हर बार यह विधेयक पास नहीं हो पाता और मोदी इसे अध्यादेश के जरिए लागू करवा देते हैं. ऐसे में सिर्फ यही सवाल उठता है कि आखिर मोदी इतनी हठधर्मिता क्यों दिखा रहे हैं? जब उन्हें इतना जनादेश और समर्थन हासिल हो जाए कि वह विधेयक पास करवा सकें तब तक इंतजार करें जबकि ऐसा हो नहीं रहा है जिससे शंकाएं पैदा होना लाजिमी हैं. मोदी जब यह कहते हैं कि 2013 के यूपीए सरकार के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के जरिए भूमि अधिग्रहण नहीं हो सकती और यह विकास में बाधक है. हम उनकी बात पर भी यकीन कर लें तो देखते हैं कि यूपी की अखिलेश यादव सरकार ने 302 किमी. के ‘लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे’ के लिए इसी अधिनियम के जरिए किसानों से जमीन हासिल की है. यही नहीं किसानों को मूल कीमत से चार गुना मुआवजा भी दिया. मोदी जी अभी स्मार्ट सिटी की सिर्फ बात करते हैं जबकि समाजवादी सरकार ने ‘ट्रांस गंगा हाईटेक सिटी’ के लिए भूमि अधिग्रहण करके उसे तेजी से विकसित करना शुरू कर दिया है. यही नहीं अखिलेश सरकार ने ‘लखनऊ इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी’ बनाकर लखनऊ-कानपुर हाईवे पर ‘इंडस्ट्रियल कॉरिडोर’ पर काम शुरू कर दिया है. इसके लिए भी किसानों ने खुशी-खुशी जमीनें सरकार को दे दी हैं. लखनऊ-वाराणसी मार्ग पर इसी सरकार ने आईटी सिटी बनाने का काम भी शुरू कर दिया है जिसके लिए भूमि अधिगृहीत कर ली गई है. यह उदाहरण उस राज्य के हैं जिसने किसी भी भूमि अधिग्रहण विधेयक पर बहुत आक्रामक रुख नहीं अपनाया है.

मोदी सरकार को अखिलेश सरकार से सीखने की जरूरत है जहां सांप्रदायिक और जातीय समीकरण विपरीत होने के साथ ही केंद्र सरकार का सहयोग न मिलने की स्थिति में भी विकास कार्यों को रोका नहीं जा रहा है.यह ऐसा राज्य है जो देश में सबसे पिछड़े राज्यों में शुमार होता है जबकि राजनीतिक दृष्टि से यह राज्य सबसे ज्यादा सजग और समृद्ध है. 2014 के आम चुनावों से इस राज्य की सरकार ने सबक लिया है और जिस तरह से तेजी से विकास की दिशा में बढ़ना शुरू किया है, वह मोदी सरकार के लिए चुनौती है. अखिलेश सरकार ने 2014 में लखनऊ मैट्रो पर काम करना शुरू किया था, वह इतनी तेजी से आगे बढ़ा कि अब पूर्ण होने की दिशा में पहुंच रहा है. यही नहीं यूपी में दिल्ली मैट्रो दिलशाद गार्डेन से गाजियाबाद के लालकुआं तक और नोएडा से ग्रेटर नोएडा तक पहुंचने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है. जबकि केंद्र शासित क्षेत्रों में विकास और मेगा प्रोजेक्ट ठप हो रहे हैं. चंडीगढ़ (इसके जरिए पंजाब और हरियाणा के साथ ही हिमाचल को जोड़ना था) में दिल्ली मैट्रो द्वारा यूपीए सरकार में ही पूरे हो चुके सर्वे पर काम बंद कर दिया गया है. हमें सिर्फ यही कहना है कि लोकतांत्रिक तरीके से बने कानून के जरिए ही भूमि अधिगृहीत की जाए और ध्यान रखा जाए कि उपजाऊ जमीन को विकास या दूसरे कार्यों के लिए अधिगृहीत न किया जाए. अध्यादेश लाकर भूमि अधिगृहीत करने की नीति तानाशाहीपूर्ण है जो लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है.

विकास के लिए भूमि की जरूरत है तो संसद में पास कानून के जरिए हो या भविष्य में पास होने वाले कानून के जरिए, लेकिन लोकतंत्र की भावना की हत्या करके ऐसा करना निहायत गलत बात है. मोदी सरकार को यह समझना चाहिए कि केंद्र सरकार के अधीन राज्यों की कानून-व्यवस्था उन राज्यों से मात खा रही है जो पिछड़े और अराजक माने जाते थे. प्रति व्यक्ति और प्रति किमी. किसी भी दृष्टि से केंद्र शासित क्षेत्रों-राज्यों में पुलिस बल और प्रशासनिक अमला सबसे ज्यादा है मगर हालात वहां लगातार बिगड़ रहे हैं. नरेंद्र मोदी का ध्येय वाक्य था ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ मगर हो इसके विपरीत रहा है. ऐसे में मोदी को हठधर्मिता अगर अपनानी है तो अपने ध्येय वाक्य से पूरा करना चाहिए न कि तानाशाहीपूर्ण आचरण दिखाने वाले अध्यादेशों के जरिए. जब लोकतंत्र की भावना का मान रखा जाएगा और जनता के लिए सरकार काम करेगी तब सभी मोदी का गुणगान करेंगे नहीं तो मिला जनाधार उनके पास से कब खिसक जाएगा, इसका उन्हें पता भी नहीं चलेगा. जब तक कांग्रेस सकारात्मक दिशा में चलना नहीं सीखेगी, मोदी या भाजपा का विरोध करने से उसे खोई जमीन वापस नहीं मिलेगी, क्योंकि मोदी को जनता ने चुना है कांग्रेस ने नहीं. जनहित, जनसमस्याओं और बेरोजगारी का सम्मानजनक हल निकालने की राजनीति ही कांग्रेस को सत्ता की राह दिखा सकती है न कि भूमि अधिग्रहण बिल का विरोध करके.

(यह लेखक के निजी विचार हैं.)