बुधवार को सार्वजनिक स्थान में एक-दूसरे की कटु आलोचना करने की थोड़ी देर बाद ही पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बैठक ने उनके विचार-विमर्श की प्रकृति के बारे अटकलों को शुरू कर दिया है. सबसे पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने यह दावा करके राजधानी को इस चीज से वंचित रखने का प्रयास किया कि मोदी ने मनमोहन सिंह से अर्थव्यवस्था संचालित करने के पाठ सीखे जबकि अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि दोनों की मुलाकात प्रधानमंत्री के आदेश पर हुई ताकि कुछ ऐसे मुद्दों पर आमने-सामने बातचीत हो सके, जिनकी जानकारी लोगों को ही होती है.  

पिछले एक वर्ष के दौरान मनमोहन सिंह शीर्ष भाजपा नेताओं के निशाने पर रहे हैं और मनमोहन सिंह ने भी बुधवार को एनडीए सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना की और साथ ही यह दावा भी कर डाला कि उनके नेतृत्व में केंद्र सरकार का प्रदर्शन कहीं अधिक प्रभावशाली था क्योंकि तब अर्थव्यवस्था की विकास दर 8.5 फीसदी के औसत पर बनी रहे. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मनमोहन सिंह पर एक भ्रष्ट सरकार की अध्यक्षता करने का आरोप लगाते हुए उनकी घोर निन्दा की थी.
मोदी और नेहरु के बीच यह बैठक स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की 51वीं की पुण्यतिथि पर हुई. राहुल गांधी की टिप्पणियों ने संकेत दिया है कि कांग्रेसी आलाकमान इससे खुश नहीं थीं और यद्यपि वह सिंह के खिलाफ कुछ नहीं बोल सकती थीं, उसने पार्टी उपाध्यक्ष की टिप्पणियों के माध्यम से अपनी नाराजगी व्यक्त करवा दी. कांग्रेसी नेतृत्व जो बात आज तक नहीं समझा पाया वो ये कि आखिर क्या कारण था कि मनमोहन सिंह को 2014 लोकसभा चुनावों के प्रचार अभियान का हिस्सा नहीं बनाया गया, विशेष रूप से जब उनकी सरकार को लोगों के सामने इम्तिहान का सामना करना था. उनसे और अधिक सक्रिय होने की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन उन्होंने अपनी सरकार का बचाव करने के लिए, कांग्रेस को पुन: निर्वाचित करने और कारण गिनाने के लिए मुश्किल से किसी चुनावी रैली में भाग लिया. यह सिंह की अनिच्छा थी या आलाकमान का सचेत निर्णय, इसे कभी भी सार्वजनिक तरीके से व्यक्त नहीं किया गया. उनके साथ किया गया उपेक्षापूर्ण व्यवहार लोकसभा में कांग्रेस के केवल 44 सीटों तक सीमित रहने का कारण बना. 

चाहे कोई इसे पसंद करे या न करे, बीते एक वर्ष में मोदी की महानतम उपलब्धि यह रही है कि उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय की पवित्रता और प्रतिष्ठा को सफलतापूर्वक बहाल किया है. उन्होंने स्पष्ट रूप से दिखा दिया है कि अंतिम निर्णय लेने का अधिकार केवल उनके पास है. यूपीए शासनकाल के दौरान ऐसा निश्चित रूप से नहीं हो रहा था और इस तथ्य में सच्चाई है कि 10 जनपथ सरकार का नियंत्रण प्राधिकारी था. मोदी और सिंह की बैठक पर सत्ता के गलियारों में बातें की जा रही हैं. दोनों के बीच बातचीत अत्यधिक विशेषाकृत है, लेकिन इससे लोगों की जुबान पर ताला नहीं लगाया जा सकता. एक अपृष्ट रिपोर्ट जो प्रचारित हो रही है वह यह है कि मनमोहन सिंह मोदी को यह बताने के लिए उत्सुक थे कि उन्होंने उसी दिन सुबह उनकी सरकार की निंदा क्यों की. भले ही यह पूरी तरह से असंभाव्य सुनाई पड़े, अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि जबसे सिंह का नाम कोयला घोटाले में आया है, वह परेशान हैं क्योंकि इससे उनकी साफ-सुथरी छवि को क्षति पहुंची है. ऐसा सुनने में आया है कि सिंह ने मोदी को बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष के एक करीबी सहयोगी के कहने पर ही उन्होंने उनकी सरकार पर हमला बोला, वरना वह ऐसा कभी नहीं बोलते. 

हालांकि मनमोहन सिंह ने मोदी को ऐसा कहा या नहीं, इसकी न सरलता के साथ पुष्टि की जा सकती है और न ही खंडन. कांग्रेसी सूत्रों ने कहा कि उसके शीर्ष नेता मौजूदा सरकार के करीबियों द्वारा सिंह को आलाकमान के खिलाफ बोलने के लिए किए जा रहे प्रयासों के प्रति जागरूक हैं. ऐसे भी कुछ लोग हैं जिन्होंने यह सुझाव दे डाला कि अगर सिंह को खुद को घोटालों से बाहर रखना है तो उसके लिए उन्हें हकीकत में मौजूदा सरकार का समर्थक बनना होगा. ऐसी अटकलेंबाजी तब तक चलती रहेगी जब तक सिंह निष्कलंक साबित नहीं हो जाते और दोनों नेताओं के बीच बैठक में हुई चर्चा के बारे में नहीं बताते. मोदी अपनी चुप्पी बरकरार रखेंगे क्योंकि अफवाह और अटकलों के बाजार का गर्म होना उनके लिए राजनीतिक रूप से उपयुक्त है. इसका परिणाम है कि यह कांग्रेसी आलाकमान को असुविधाजनक स्थिति में डाल देता है. प्रधानमंत्री कार्यालय ने हालांकि इसे केवल ‘एक शिष्टाचारी भेंट’ बताया है. वैसे कांग्रेस में राजनीतिक तत्वों द्वारा हमेशा से सिंह को एक ऐसा अवसरवादी माना गया है जिसने अपने राजनीतिक करियर को आगे बढ़ाने के लिए सोनिया गांधी के अधीन काम किया. पार्टी के भविष्य में उनकी कभी भी कोई भूमिका नहीं थी और अगर स्थिति और परिस्थितियां मांग   करें तो अब भी पार्टी को बीच मंझधार में छोड़ कर जा सकते हैं. 

(यह लेखक के निजी विचार हैं.)