दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र के मामले में जैसे ही हाई कोर्ट का फैसला आया, मीडिया में चारों तरफ अचानक एक खबर पसर गयी. केजरीवाल सरकार को झटका, दिल्ली सरकार को झटका, हाई कोर्ट से झटका, अराजक मुख्यमंत्री को झटका. इस फैसले के आने से हमे रत्ती भर भी हैरानी नही हुई. अगर ये आशानुसार नही होता, तो आम आदमी पार्टी पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं करती. माननीय हाईकोर्ट के इस फैसले से अपनी विनम्र असहमति जताते हुए, लोकतंत्र के रखवालों से हम कुछ  सवाल भी पूछना चाहते हैं कि किसानो की ज़मीन का सर्किल रेट दिल्ली सरकार ने बढ़ाया, अब हाई कोर्ट के फैसले के बाद वह अवैध है. इसके ख़त्म हो जाने से किसे झटका लगा, अरविन्द केजरीवाल या दिल्ली सरकार को या दिल्ली के मेहनतकश किसानों को? दिहाड़ी बढ़ाने का कानून अवैध घोषित करने से किसको झटका लगा? दिल्ली सरकार को या दिल्ली में दिहाड़ी कर अपनी रोज़ी कमाने वाले मेहनती लोगो को? स्कूलों की मनमानी पर रोकने के दिल्ली सरकार के फैसले को ख़ारिज करके, भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम पर रोक लगाकर, बिजली कंपनियों पर कसी नकेल हटाकर इस फैसले ने आखिर किसे झटका दिया है? किसानों, मजदूरों, छात्रों, अभिभावकों, आम आदमी को या दिल्ली सरकार और मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को? दरअसल, इस फैसले का दिल्ली सरकार या अरविन्द केजरीवाल की व्यक्तिगत लाभ-हानि से कोई लेना देना नहीं है. यहाँ प्रश्न बड़ा है – प्रश्न दिल्ली की जनता के हितों को सुरक्षित करने का है.
 
लोकतान्त्रिक मूल्यों में आम आदमी पार्टी की आस्था अडिग है, इसलिए हम अब भी यही मानते हैं संविधान अगर “हम भारत के लोग” की बात करता है तो यह बात लोकतंत्र की आत्मा है. इसे खारिज करना मतलब लोकतंत्र की आत्मा को ख़ारिज करना है. पिछले डेढ़ साल में आम आदमी पार्टी की सरकार जनहित में दर्जन भर से ज़्यादा बिल लायी. इन बिलों में जनलोकपाल बिल, सिटिज़न चार्टर बिल और न्यूनतम मजदूरी बढाने जैसे बेहद अहम् बिल शामिल हैं. ये बिल अगर पास होते तो दिल्ली में आम आदमी का जीवन आसान होता और रोज़मर्रा में होने वाली पिसाई पर लगाम लग जाती. लेकिन केंद्र सरकार द्वारा, चुनी हुई दिल्ली सरकार के सभी बिलों को महीनों तक अपने पास रखकर वापिस लौटा दिया. स्पष्ट है कि कौन संघीय ढांचे के नाम चल रही तानाशाही के खिलाफ है और कौन दिल्ली की जनता के हितों के.
 
दिल्ली चुनावों में इकतरफा फैसला देकर दिल्ली की जनता ने एक सरकार चुनी. पिछली 4 सरकारों से निराश होकर, उन्होंने बड़े बड़े सपनों के पीछे भागना नहीं चुना, बल्कि अपनी दैनिक और आधारभूत ज़रूरतों को पूरा करने वाले लोग चुने. लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार के पास संविधान द्वारा दी हुई शक्ति होती है कि वो बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य पर जनता के हित में फैसले लें. किसान और व्यापारी के हित में फैसले लें, महिलाओं की सुरक्षा पर फैसले लें, भ्रष्टाचार रोकें. लेकिन दिल्ली में शायद किसी और के “मन के संविधान” की धाराओं को लागू किया जा रहा है. यहां मुख्यमंत्री को रबड़ स्टैम्प तक नहीं माना जा रहा. शक्तियां एक कठपुतली के हाथों में सौंप कर, सब अधिकार उसके पास निहित करके, बस शिकायती रजिस्टर के रूप में चुने हुए मुख्यमंत्री को बिठा दिया गया है. एक ऐसा मुख्यमंत्री जिसके हाथ बांधकर तैरने के लिए कहा जा रहा है. देश का संविधान केंद्र सरकार, राज्य सरकार, यूनियन टेरिटरी, और यूनियन टेरिटरी + विधानसभा, इन चारों प्रकारों की व्ययस्थाओं का उल्लेख करती है, सम्मान करता है. वरना चंडीगढ़ जो विशुद्ध रूप से यूनियन टेरिटरी है, और दिल्ली जो राष्ट्रिय राजधानी क्षेत्र है, में क्या अंतर रह जायेगा? जब देश के संविधान को तीसरी बार पढ़ा जा रहा था, संविधान सभा में तब यह प्रश्न उठा था क़ि राज्यपाल चुने जाएँ, या नियुक्त हों? और तभी यह सर्वसम्मति से तय हुआ कि चुनी हुई सरकार को सर्वोच्च रखने के लिए राज्यपाल नियुक्त किया जाय, न कि चुना जाए. संविधान के 69वें संशोधन का मज़ाक न बने इसलिए उच्च न्यायलय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देना आवश्यक है. आज संविधान के प्रपितामहों द्वारा दी गयी परिभाषाओं को केंद्र सरकार अपने अहंकार की बलि चढ़ा रही है, इसे रोकने के लिए दिल्ली सरकार को आगे बढ़ना होगा. वरना ऐसा क्यों होता कि जिस एसीबी को आज कहा जा रहा है क़ि वह केंद्र सरकार के कर्मियों के भ्रष्टाचार की जाँच क्यों करेगी, उसी दिल्ली एसीबी का एक विज्ञापन जो 2010 में प्रकाशित हुआ था वह ऐसा क्यों कहता कि “दिल्ली में घटित हर अपराध की शिकायत हमसे करें”? ज़ाहिर है तब की बीजेपी कांग्रेस की सरकारों के बीच कोई अंतर्द्वंद नहीं थी, विसंगतियां नहीं थी, एक दुसरे के हितों को सुरक्षित रखना सर्वोपरि था.
 
अगर चुनी हुई सरकार जनहित के मुद्दों पर फैसला नहीं ले पायेगी, तो फिर चुनाव कराने का फ़ायदा ही क्या? लोकतंत्र में चुनाव को तो सबसे बड़े पर्व के रूप में मनाया जाता है, उस पर्व की क्या प्रासंगिकता है? संविधान में दिल्ली विधानसभा की क्या भूमिका है? क्या संविधान ने जनहित से जुड़े कार्यों के के किए ही दिल्ली विधानसभा नहीं बनाई है? क्या यहां विधानसभा में बैठे 67 विधायक सिर्फ इसलिए हैं कि वो केंद्र सरकार के अहम् की चक्की में पिसते रहें? हमें लगता है कि उच्च न्यायालयात का ये फैसला चुनी हुई सरकार के चुने हुए प्रतिनिधियों के अस्तित्व पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा रहा है. सुखद सत्य यह है कि हमारे देश में सर्वोच्च न्यायालय इस असहमति का सम्मान करता है. और अब ही शायद वो सही समय है जब आम आदमी पार्टी दिल्ली की जनता के हितों को साधने के लिए चल रहे अपने अधिकारों के संघर्ष को माननीय उच्चतम न्यायालय तक ले जाये. शायद, यहाँ कुछ और बड़े सवालों के जवाब भी मिल जायें, जैसे कि बीजेपी कांग्रेस का दिल्ली के हित में देखा गया पूर्ण राज्य का सपना!
 
जनता ने वोट मांगते वक़्त हमसे वादे लिए थे, उनकी आँखों में उम्मीद की किरणों की तपिश को हमने महसूस किया था, अपने बच्चों के भविष्य को लेकर पाले गए सपने दिल्ली का हर आम आदमी हमारी आँखों में साकार होता देख रहा है, कोई भी केंद्र की कठपुतली उन आशाओं, उम्मीदों, सपनों और वादों के महत्त्व को न समझ सकती है और न पूरे कर सकती है. दिल्ली सरकार दिल्ली की 2 करोड़ जनता की अभिलाषाओं की प्रतीक है. इसे ख़ारिज करना, दिल्लीवालों के सपनो को भी ख़ारिज करने जैसा होगा. संवैधानिक तरीके से चुनी गयी विधानसभा अधिकारविहीन हो ही नहीं सकती, वरना देश में लोकतंत्र की परिभाषा का भी संकट होगा.
 
जनता के बीच उनका पक्ष सुनने और अपना समाधान रखने एलजी साहब नहीं मंत्री और विधायक जाते हैं. जनता बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य की छोटी बड़ी सभी समस्याएँ लेकर एलजी साहब के पास नहीं अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के पास जाती है. जनता और उनके जनप्रतिनिधियों के बीच के संबंध ही लोकतंत्र की मजबूत आधारशिला का काम करते हैं. सुप्रीम कोर्ट को तय करना होगा कि दिल्ली की जनता क्या करे? अगर उसे कोई समस्या हो तो  जनता कहा जाए? एलजी साहब के पास या विधायक और मंत्री के पास. अब दिल्ली की जनता के प्रति जवाबदेही किसकी होगी? अगर मुख्यमंत्री और विधायकों का कोई महत्त्व नहीं है, तो सचिवालय और विधानसभा का भी कोई महत्त्व है या नहीं? लोकतंत्र में चुनाव जैसी सबसे बड़ी प्रक्रिया से जो सरकार दिल्ली में चुनी गयी है वो क्या सिर्फ इसलिए निरर्थक और अप्रासंगिक हो गयी है, क्योंकि उसने केंद्र की मनमानी और तानाशाही के सामने घुटने नहीं टेके?
 
हम ये जानना चाहते हैं कि क्या अरविन्द केजरीवाल को निरर्थक साबित करने के लिए लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया को भी अर्थहीन साबित कर दिया जायेगा? एलजी को जनता नहीं केंद्र सरकार चुनती है. ये सब सवाल सुप्रीम कोर्ट के सामने हम रखेंगे.
 
लोकतंत्र में दोहरे मापदंड जनता सदैव याद रखती है. आज के फैसले पर एक दूसरे की पीठ ठोकने वाले कांग्रेस भाजपा अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में इसी राज्यपाल और केंद्र की कुंडली में फंसकर गुत्थमगुत्था हो चुकी है. लोकतंत्र के लिए वो एक शर्मनाक दौर था, जिसका आम आदमी पार्टी ने पुरजोर विरोध किया था. आज की लड़ाई में हम अकेले नहीं है. दिल्ली की जनता हमारे साथ है और साथ ही देश भर के वो लोग भी केंद्र सरकार की विकृत राजनीति को देख रहे हैं, जिन्हें साफ तौर पर ये ईमानदारी और बेईमानी के बीच की लड़ाई नज़र आ रही है. श्रेष्ठतंत्र और लोकतंत्र के संघर्ष की राजनीति में सत्य संविधान के आसरे है.
 
सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह लोकतंत्र के मान सम्मान को अरुणाचल और उत्तरांचल में बचाया था, हमे भरोसा है कि दिल्ली की जनता के हक़ की लड़ाई में भी निष्पक्ष फैसला आएगा.
 

(यह लेखक के निजी विचार हैं)