टीवी पत्रकारों की बिरादरी में कविता या ग़ज़ल रहती है, इसके बारे में इत्मीनान शब्दोत्सव में हुआ. मेरे सहपाठी और मित्र विजय शर्मा की डेढ महीने की मेहनत ने शब्दोत्सव की शाम सजाई और पूरी सजधज के साथ. खबरिया चैनलों में काम करने वाले रिपोर्टर, प्रोड्यूसर और एंकर अपनी अपनी रचनाओं को लेकर फिल्म सिटी के मारवाह स्टूडियो में जमा हुए. 
 
इस जमात में देश की सोच, समझ और चिंता मजबूती से जगह बनाए हुए है, इसकी तस्दीक कई मित्रों की कविताओं, नज़्मों, गीतों और ग़जलों ने की. अभिषेक उपाध्याय, दीपक डोभाल, मनु पवार की कविताएं उन तमाम शर्तों पर खरी थीं जिनकी मांग कविता करती है. हिंदी के किसी भी स्थापित कवि की कविता से होड़ कर सकती हैं वे कविताएं.
 
ऐसे ही रवि पाराशर और मोइन शादाब की ग़ज़लें बेहद उम्दा थीं. रवि मेरे पुराने मित्र हैं और उनकी कलम में ग़ज़ब की ताक़त है, रवानगी है. ज़ी न्यूज़ में नौकरी के दिनों में आधी रात से लेकर उसके ढल जाने तक, कई दफा रवि की ग़ज़लें सुनी हैं. सधी, संवरी और सवालों से भरी. अब वे किताब की शक्ल में आ गई हैं- हरा पत्ता. 
 
 
आलोक श्रीवास्तव हमारे दौर के ऐसे शायर हैं जिन्होंने अपनी ग़ज़लों के ज़रिए मज़बूत पहचान बनाई है. हरीश बर्णवाल की कहानियों ने हिंदी साहित्य में विषय के स्तर पर कुछ नयापन दिए हैं. ये सारे नाम टीवी पत्रकारिता के हैं. इन सबका होना पत्रकारों की बिरादरी में भाषा और ख़ासकर हिंदी को लेकर बढती चिंता को कमज़ोर करता है.
 
लेकिन ऐसा नहीं है कि संकट नहीं है. जब मैं भाषा की बात कर रहा हूं तो उसके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ के साथ कर रहा हूं. हिंदी के पत्रकार या देश की दूसरी भाषाओं के पत्रकार को भारत के बनने या फिर उसे बनाए रखने की चेतना को लेकर सजग ज़रुर होना चाहिए. देश के बारे में जानना है तो उनलोगों को ज़रुर जानें जो देश बनाने या फिर बचाए रखने की साधना में लगे रहते हैं.
 
जिनको देश का धर्म और मर्म पता होते हैं, वे लगातार उसके बुनियादी ढांचे की मरम्मत और उसको नुकसान पहुंचा रही ताकतों की मज़म्मत में लगे रहते हैं. यही लोग किसी देश की चेतना होते हैं और इनमें साहित्यकारों, कलाकारों, इतिहासकारों का स्थान सबसे ऊपर होता है.
 
 
 
शब्दोत्सव में हिंदी के प्रतिष्ठित हास्य कवि अशोक चक्रधर और ऊर्दू के नामचीन शायर नवाज़ देवबंदी की मौजूदगी उस चेतना का अनुभव बार-बार करा रही थी. देश – सड़क, इमारतों, संसद, पंचायतों में नहीं होता है, बल्कि उस सोच में जो बताती है कि कई खांचों-खानों, मज़हब-पंथों में बंटे इस मुल्क का भला क्या करने से होगा और क्या करने से नुकसान. 
 
नवाज़ भाई कहते हैं कि- उसके कत्ल पर मैं भी चुप था, मेरा नंबर अब आया है, मेरे कत्ल पे आप भी चुप हैं, अगला नंबर आपका है. इस अपाहिजपन में लगातार बढते एक खतरे को सुना जा सकता है. ऐसे ही अशोक चक्रधर कहते हैं कि गोधरा में लाल है–  भाप रे, भाप रे, भाप रे.
 
खैर, देश की चेतना वाली बात मैंने इसलिए कही क्योंकि मेरे करियर की दो-तीन घटनाएं सबक की तरह रहीं हैं. सन दो हज़ार में अली सरदार जाफरी साहब का निधन हुआ. मैं तब ज़ी न्यूज में हुआ करता था. मेरे शिफ्ट इंचार्ज को मैंने कहा कि इस खबर को हमें उठाना चाहिए, इससे पहले कि आजतक उठा ले. उन्होंने मुझसे कहा कि यार ये था कौन. मैं अवाक रह गया.
 
एक और वाकया 2005 का है- मृणाल सेन को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिला. मैं आजतक में सीनियर प्रोड्यूसर था और शिफ्ट इंचार्ज भी. मैंने अपने एक सहयोगी को कहा कि मृणाल सेन का प्रोफाइल लिखकर मुझे दे दो- फिर मैं उसे अपने मुताबिक करके पैकेजिंग को दे दूंगा. थोड़ी देर बाद वो मेरे पास आया और कहा कि बॉस ये क्या करती हैं. मैंने कहा आप छोड़ दो, मैं देख लूंगा. जब करते हैं या करती हैं का ही संकट हो तो आगे कुछ और कहने की गुंज़ाइश खत्म हो जाती है. हो भी गई.
 
मैंने करियर की शुरुआत की थी तो धर्मवीर भारती का निधन हुआ था. 1997 में. तब ज़ी न्यूज और स्टार न्यूज (एनडीटीवी के जरिए चल रहा था) ही थे और दोनों जगहों पर बस ज़िक्र भर ही हुआ था. 6 साल बाद जब हरिवंश राय बच्चन का निधन हुआ तो लगा कि देश में साहित्यकार की अंतिम यात्रा ऐसी ही होनी चाहिए. सभी चैनलों पर लगातार उसकी रिपोर्टिंग चलती रही. लेकिन, वह सबकुछ बच्चन साहब के किए के चलते कम, अमिताभ बच्चन का उनका बेटा होने के कारण ज़्यादा था. यही सच है. 
 
मैं इन घटनाओं को गिनाने नहीं आया बल्कि मुझे हमेशा यह लगता रहा है कि हम पढ़-लिख कर जिस सोच-संस्कार-स्वभाव को अपनाते हैं, उनमें भारत होता है और उसको बनाने में ऐसे लोगों की बड़ी भूमिका होती है. इसलिए इनको जानना जरुर चाहिए. 
 
 
 
पत्रकारिता ने ही अज्ञेय, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, गिरिजाकुमार माथुर, जगदीश चंद्र माथुर जैसे साहित्याकार दिए. आज भी मंगलेश डबराल और वीरेन डंगवाल जैसे कवि इसी पत्रकारिता की देन हैं. ऐसे नाम की फेहरिस्त लंबी है. इनलोगों में भाषाई संस्कार और राष्ट्रीय चिंता गहरे बैठी रही. उनकी रचनाओं को या फिर उनके लेखों को पढिए. हम टीवी पत्रकारों को इस स्तर पर अभी बहुत काम करने की ज़रुरत है.
 
शब्दोत्सव जैसी कोशिशें ना सिर्फ कुछ लिखने-रचने को प्रेरित करती हैं बल्कि वो भाषा और भाषा से जुड़े साहित्यिक-सांस्कृतिक समझ को ठीक करने में भी मदद करती हैं. चीख-चीत्कार और उन्माद पैदा करने या किसी तबके का झंडाबरदार बनकर नारा लगाने वाली स्थितियां साहित्य, समाज दोनों के लिये ख़तरनाक होती हैं. इसीलिए इन्हें दोनों जगहों से ख़ारिज कर दिया गया.
 
अतिवाद, लकीर के किसी तरफ हो नुकसान देता है, उससे बचना जरुरी है. दुनिया जितनी तेजी से बदल रही है- प्रश्न, परिस्थिति और प्राथमिकताएं भी बदल रहे हैं. शब्दोत्सव में कुछ पत्रकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से ये बताया कि ऐसी चिंताओं पर उनकी समझ अच्छी है. विजय की कोशिशों का हासिल यही है.
 
शीतल राजपूत और दुर्गानाथ स्वर्णकार ने जिस तरीके से मंच का संचालन किया, उसने ये बताया कि एंकर चाहे कहीं भी हो, मंच उसी का होता है. परवेज अहमद, सतीश के सिंह और राजेश बादल जैसे दिग्गज टीवी पत्रकार आए और घंटों बैठे रहे- इसे आप ऐसे आयोजनों के पीछे के मकसद को उनका मजबूत समर्थन मानिए.
 
माहौल तैयार करने में ऐसे हौसलों की बहुत ज़रुरत होती है और जो लोग इस ज़िम्मेदारी को उठाते हैं, वे लीक से हटकर सोचने-करने वाले लोग होते हैं. शब्दोत्सव एक बेहतर कोशिश है जिसे जारी रखा जाना चाहिए- टीवी पत्रकारिता में हिंदी (समूचे संदर्भ के साथ) को बचाए रखने के लिये, उसके ज़रिए पूरी बिरादरी का एक साझा मंच बनाए रखने के लिए.