कश्मीर की घाटियों में खुलेआम भारत विरोधी गतिविधियों में लोग संलिप्त हो रहे हैं. एक आतंकी के जनाजे में हजारों लोग जमा हो जाते हैं. सरेआम आईएस और पाकिस्तान के झंडे लहराए जाते हैं. पुलिस और सेना पर पत्थर और ग्रेनेड फेंके जाते हैं. खुलेआम गोलियां और गालियां बरसाई जाती हैं. बावजूद इसके सुरक्षाबलों से अपेक्षा की जाती है कि वो शांति बनाए रखें. धैर्य से काम लें. हद है इस राजनीति की. वह तो ऊपरवाले की मेहरबानी है कि जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों को आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (अफस्पा) के रूप में बड़ा हथियार मिला हुआ है, नहीं तो न जाने अब तक कितने जवान और अधिकारी कानून के दायरे में फंसकर अपनी जिंदगी गंवा बैठते और न जाने कितने कोर्ट मार्शल हो गए होते. यह कहने में कतई गुरेज नहीं होना चाहिए कि इसी स्पेशल एक्ट के दम पर आज तक कश्मीर की घाटियों में थोड़ी बहुत शांति है. नहीं तो वहां के अलगाववादी ताकतों को जरा भी भय न होता और वे अपने मनमानी और मंसूबों में कामयाब होते. पर मणिपुर के मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय ने कश्मीर को बड़ा संदेश दे दिया है. कश्मीर में हाल की घटनाओं को देखते हुए अफस्पा पर एक बड़ी बहस शुरू हो गई है.
 
दरअसल, इसी शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने अफस्पा के संबंध में एक नई व्यवस्था दी है. अब तक यह प्रावधान था कि जिन क्षेत्रों में अफस्पा लागू है, वहां तैनात सुरक्षाबलों के खिलाफ अगर शिकायत मिलती है तो बिना केंद्र की अनुमति के उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है. हर हाल में किसी भी सैनिक या अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई से पहले केंद्र की मंजूरी जरूरी थी. पर शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय की डबल बेंच ने संविधान के अनुच्छेद-32 का उपयोग करते हुए नई व्यवस्था कायम की है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सुरक्षाकर्मी अत्यधिक अथवा प्रतिशोध की भावना से अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकते. इस तरह की शिकायतों पर सर्वोच्च न्यायालय सुनवाई करने में सक्षम है. इसके लिए केंद्र से किसी तरह की अनुमति की जरूरत किसी अदालत को नहीं है. यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद-32 में वर्णित मौलिक अधिकारों से संबंधित है. इसके तहत कोई भी भारतीय अपने बुनियादी हकों और सुरक्षा के लिए न्यायपालिका की शरण ले सकता है. यह उसका मौलिक अधिकार है.
 
कोर्ट का यह निर्णय मणिपुर में हुई कई मुठभेड़ों के संदर्भ में है. मणिपुर के लोगों ने करीब 1,528 मामलों की शिकायत की थी और कहा था कि यह सभी मुठभेड़ फर्जी थे. मामले की सुनवाई के दौरान वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जांच के लिए पूर्व जज संतोष हेगड़े की अध्यक्षता में एक समिति बनाई. समिति ने 62 मामलों में फर्जी मुठभेड़ की पुष्टि की समिति की रिपोर्ट के बावजूद कोर्ट आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पा रही थी, क्योंकि वहां अफस्पा लागू है. केंद्र की अनुमति के बिना उन मामलों के आरोपियों पर मुकदमा नहीं चल सकता. पर अब कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद-32 का हवाला देते हुए 13 अगस्त को सुनवाई का फैसला किया है. उम्मीद जताई जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट कोई बड़ा निर्णय ले सकती है. अगर 13 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने अफस्पा के मौजूदा प्रावधानों के खिलाफ कोई बड़ा फैसला दिया तो आने वाले समय में कश्मीर के लोगों और वहां के संगठनों को भी एक बड़ा हथियार मिल जाएगा. साथ ही इस बात की प्रबल संभावनाएं बन जाएंगी कि कहीं यह स्पेशल एक्ट भविष्य में खत्म ही न हो जाए.
 
अफस्पा एक ऐसा मुद्दा है जिस पर कश्मीर में लंबे समय से विवाद होता रहा है. साल 1958 में भारतीय संसद ने इस सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को पारित किया था. उस वक्त अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा जैसे राज्य काफी अशांत थे. ऐसे में सेना को विशेषाधिकार दिए गए थे. इसी विशेषाधिकार के दम पर लंबे समय तक वहां शांति बनी रही. धीरे-धीरे जरूरतों के मुताबिक कई राज्यों से यह कानून उठा लिया गया. इसी बीच अस्सी के दशक में जम्मू-कश्मीर में आतंक ने अपने पांव पसार लिए. बड़ी ही शिद्दत के साथ वहां अफस्पा को लागू करने की जरूरत महसूस हुई. वर्ष 1990 में जम्मू-कश्मीर को भी अशांत क्षेत्र घोषित करते हुए पूरे राज्य में अफस्पा लागू कर दिया गया. सिर्फ राज्य के लेह-लद्दाख इलाके इस कानून के दायरे से बाहर रखे गए. इस कानून के तहत जम्मू-कश्मीर की सेना को किसी भी व्यक्ति को बिना कोई वारंट के तलाशी या गिरफ्तार करने का विशेषाधिकार है. किसी भी व्यक्ति की तलाशी केवल संदेह के आधार पर लेने का पूरा अधिकार प्राप्त है. यहां तक कि कानून तोड़ने वालों पर बिना किसी अनुमति के फायरिंग का भी अधिकार सुरक्षाबलों को प्राप्त है. अगर इस दौरान उस व्यक्ति की मौत भी हो जाती है तो उसकी जवाबदेही फायरिंग करने या आदेश देने वाले अधिकारी पर नहीं होगी. जम्मू-कश्मीर में सेना को यह अधिकार मिलते ही वहां फैल रहे आतंक के कारखानों पर जबर्दस्त तरीके से लगाम लगी. हालांकि, बीच-बीच में सेना के खिलाफ भी आवाज उठी. सेना पर कई गंभीर आरोप लगे. कश्मीर की आवाम पूरी तरह से दो हिस्सों में बंट गई. एक वो थे जिन्होंने सेना को सिर आंखों पर बिठाया, जबकि दूसरा तबका हमेशा सेना और उसकी कार्रवाई के खिलाफ रहा.
 
बावजूद इसके सेना ने चुन-चुनकर वहां मौजूद आतंकियों और उनके पनाहगारों को खत्म किया. कई बार मानवाधिकार संगठनों ने सेना की कड़ी कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाई. पहली बार अंतरराष्टीय स्तर पर वर्ष 2009 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग के कमिश्नर नवीनतम पिल्लई ने इस कानून के खिलाफ आवाज उठाई. उन्होंने इसे औपनिवेशिक कानून की संज्ञा दी थी. पर कश्मीर में सेना पर हर समय मौजूद खतरे को देखते हुए यह कानून आज तक लागू है.  
 
अब एक बार फिर से आतंकी बुरहान के बहाने घाटी का माहौल अशांत है. एक बार फिर से सेना की कार्रवाई के खिलाफ अलगाववादियों ने अपनी सोच को वहां की आवाम के भीतर डालने का प्रयास किया है. यह सोच फिलहाल क्या रंग लाएगी यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अगर कड़ा निर्णय दे दिया तो यह बात तय हो जाएगी कि मणिपुर के बहाने कश्मीर के अलगाववादियों को एक नया हथियार जरूर मिल जाएगा. फिलहाल, केंद्र सरकार भी जरूर मंथन करे कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद क्या जरूरी कदम कश्मीर के लिए उठाए जाएंगे.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं)