एनएसजी (परमाणु आपूतिकर्ता समूह) में भागीदार बनने के हमारे प्रयास में एक महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है. सवाल यह नहीं है कि भारत इस समूह का सदस्य बन पाएगा या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि भारत इस समूह का सदस्य कब बनेगा? पिछले एक वर्ष के दौरान भारत की सदस्यता की प्रभावशाली हिमायत करने वाले अमेरिका का मानना है कि इस वर्ष के अंत तक भारत इस प्रतिष्ठित समूह का सदस्य बन जाएगा. इस सप्ताह सियोल में भारत की सदस्यता पर विचार-विमर्श के लिए विस्तृत बैठक के बाद व्हाइट हाउस ने यह बात कही. भारत के मामले में अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा उत्सुकता के साथ की जा रही है.
 
इस एनएसजी बैठक की पूर्वसंध्या पर भारत के परमाणु कार्यक्रम के प्रति किसी समय चौकस रहने वाले कनाडा जैसे देशों ने भी प्राथमिकता के आधार पर हमारी प्रविष्टि के लिए सार्वजनिक रूप से वाद-विवाद किया है. केवल चीन के अपवाद को छोड़कर वाशिंगटन, लंदन, पेरिस और मॉस्को जैसी महाशक्तियों ने जल्द से जल्द एनएसजी में भारत के प्रवेश की वकालत की है. ऐसा महज संयोग से नहीं हुआ है. यह हमारे लोकतंत्र में एक नए विकास का लाभांश है. निरंतर जोश और आत्म-आश्वासन के साथ हमारे हितों द्वारा निर्धारित स्पष्ट उद्देश्यों की खोज की जा रही है. जिन बहुपक्षीय निकायों को ऐसे मुद्दों पर आम सहमति की आवश्यकता होती है, उन्होंने पारंपरिक रूप से ऐसी समस्याओं को अनिश्चित समय के खुले स्थान में धकेल दिया है. यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि राजनयिक शांति स्थिति के लिए यथा-स्थिति से बेहतर कुछ और नहीं हो सकता. हमें एमटीसीआर (मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था) में भी संस्थागत निष्क्रियता का सामना करना पड़ा था और इस माह के प्रारंभ में मित्रों के सहयोग से इससे पार पा सके थे. 
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत वर्ष पेरिस में जलवायु परिवर्तन के प्रति हमारी प्रतिबद्धता पर एक चिंताशील तर्क के साथ एनएसजी की यथा-स्थिति को चुनौती दी थी. प्रधानमंत्री ने इस भाषण में 2030 के अंत तक 40 प्रतिशत गैर-जीवाश्म बिजली उत्पादन क्षमता का वायदा किया था. इस तर्क ने शक्तिशाली मित्रों को सहयोगी राष्ट्रों में तब्दील कर दिया. वे इस तर्क को समझ पाए कि भारत जलवायु परिवर्तन के लिए पुरजोर प्रयास करने के लिए तैयार है, लेकिन विश्व को भी परमाणु व्यापार में भारत की भागीदारी का समर्थन करना चाहिए. दूसरी ओर हम जानते हैं कि ‘प्रक्रियात्मक बाधाओं’ के रूप में वर्णित चीन का प्रतिरोध पाकिस्तान के साथ उसकी सामरिक मित्रता की रक्षा करने के लिए है. हालांकि, बीजिंग का औपचारिक तर्क यह था कि भारत को एनएसजी का सदस्य बनने से पहले परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर जरूर करना चाहिए. अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन जैसी अन्य परमाणु शक्तियों ने चीन के इस तर्क से असहमति क्यों जताई?
 
इसलिए क्योंकि परमाणु अप्रसार के मामले में भारत का ट्रैक रिकार्ड शानदार रहा है. 1950 के दशक में परमाणु क्षमता का निर्माण शुरू करने वाले देशों ने भारत के खिलाफ आज तक एक बार भी विरोध नहीं किया है. इसके विपरीत पाकिस्तान का इतिहास परमाणु प्रसार का रहा है. 2002 में राष्ट्रपति जार्ज बुश ने अपने भाषण में पाकिस्तान को न्यूक्लियर हॉट-स्पॉट का नाम दिया था. इस विषय पर ‘डिसेप्शन: पाकिस्तान, द युनाइटेड स्टेट्स एंड ग्लोबल न्यूक्लियर वेपन थ्योरी’ नामक एक निर्णायक किताब भी लिखी गई है. इस किताब में जिक्र किया गया है कि किस प्रकार पाकिस्तान ने अमेरिकी आर्थिक सहायता के बल पर विशाल परमाणु शस्त्रागार का निर्माण कर पश्चिमी जगत के साथ धोखा किया है और वह तालिबान और अल-कायदा को पनाह देकर इस तकनीक को अन्य देशों को बेच रहा है.
 
पाकिस्तान के सबसे प्रसिद्ध परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान ने मोटी धनराशि के बदले अपने परमाणु ज्ञान की सौदेबाजी की. गौरतलब है कि खान ने 4 फरवरी 2004 को सार्वजनिक रूप से अपने अपराधों को स्वीकार किया था. वह लीबिया और उत्तरी कोरिया जैसे विभिन्न ग्राहकों के लिए परमाणु प्रौद्योगिकी की कालाबाजारी कर रहे थे. जाहिर था कि उन्होंने अकेले यह कार्य नहीं किया था, लेकिन सेना ने फिर भी उन्हें प्रमुख दोषी करार दिया. राष्ट्रपति बुश ने कहा था कि खान ने अपने अपराधों में उसके शीर्ष सहयोगियों की संलिप्तता को स्वीकार किया है.
 
राष्ट्रपति बुश का यह बयान इस तथ्य की पुष्टि करता है कि इस काम में खान के सहयोगी उसके साथ थे. बुश ने आगे कहा कि राष्ट्रपति मुशर्रफ ने वादा किया था कि खान नेटवर्क से जुड़ी सभी जानकारी वे साझा करेंगे और उन्होंने इस बात की गारंटी दी थी कि उनका देश फिर कभी भी परमाणु अप्रसार के खिलाफ नहीं जाएगा। यहां तक कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने अपने देश की गलतियों को भी स्वीकार कर लिया था. खान को इसका ईनाम शाब्दिक और शारीरिक तौर पर मिला, उन्हें दूसरे तरीकों से बनाए पैसे रखने की अनुमति दे दी गई. साथ ही जेल जाने के बजाय चुपचाप सेवानिवृत्ति लेने के लिए कह दिया गया. 2008 में एनएसजी की ओर से दिया गया एक बयान विरोधाभाषी लगता है जहां इस संस्था ने स्वीकार किया था कि भारत ने परमाणु हथियारों के अप्रसार संधि के प्रावधानों और उद्देश्यों के कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. विशेष रूप से एनएसजी के बारे में इससे ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है.
 
उन सभी के लिए जो पाकिस्तान को बचाने के लिए भारत के खिलाफ परमाणु अप्रसार के मुद्दे को उठा रहे हैं. एक विडंबना ही है, नहीं तो एक मजाक तो है ही और तथ्य यह है कि पात्रता के बजाय प्रक्रिया की आड़ में चीन की आपत्ति इस बात का सबूत है कि भारत की साख पर कोई दाग नहीं है. कूटनीति एक सतत प्रक्रिया है. हमने मिसाइल प्रौद्योगिकी जैसे मामलों में त्वरित परिणाम दिए हैं. एनएसजी की सदस्यता महज समयाधारित खेल है, इससे ज्यादा और कुछ नहीं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)