सन् 1858 में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर को एक दिन के लिए भारत की राजधानी बनाया गया था. बीते रविवार को कुछ ऐसा ही नजारा पवित्र प्रयाग नगरी में फिर से दिखने को मिला. यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के अलावा अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ यूपी विस चुनाव के निर्णायक संघर्ष से पैदा होने वाले समीकरणों, पार्टी के संचालन, उसकी विचारधारा और राष्टीय भावना को धार देने के लिए इकट्ठा हुए हैं. दरअसल, सम्मेलनों और सभाओं के भरोसे चुनाव नहीं जीते जाते है, लेकिन यह अग्रिम लड़ाई के लिए संघर्ष के मिजाज, समय और भावी रणनीति को जरूर निर्धारित करते हैं.
 
एक मंझे हुए राजनीतिक खिलाड़ी और चुनावी रणनीतिकार की तरह अमित शाह ने लखनऊ पर नजर टिकाते हुए अपने पराक्रम के प्रदर्शन के लिए इलाहाबाद को चुना है. यूपी के 73 सांसदों की ही बदौलत उनकी पार्टी और नेताओं ने दिल्ली में किला फतह किया है. पीएम मोदी और अमित शाह ने यूपी को 7 रेसकोर्स रोड से जोड़ने की शुरुआत भी इलाहाबाद से की है. वैदिक काल से ही एक शहर के रूप में इलाहाबाद शायद विकास और हिंदुत्व को आगे बढ़ाने के लिए सबसे सम्मानित स्थल है. यहीं से अब अमित शाह की दूसरी महत्वपूर्ण राजनीतिक लड़ाई शुरू होने जा रही है. 2013 के चुनावों के दौरान, राज्य प्रभारी के रूप में उन्होंने अकेले दम पर एक अभूतपूर्व सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल का प्रसार किया था.
 
करीब दो दशक बाद भाजपा ने उत्तर प्रदेश के किसी शहर में अपनी राष्टीय कार्यकारिणी का आयोजन किया है. एक समय था जब इलाहाबाद को गांधी-नेहरू खानदान का गढ़ माना जाता था. लेकिन, आज गांधी परिवार का वही शहर भगवा रंग के ध्वज और होर्डिंग्स से पटा हुआ है. यह पहली बार है कि भारत के लगभग सभी राजनीतिक तंत्र अपने प्रतिद्वंदियों के खिलाफ शंखनाद के लिए इलाहाबाद में डेरा डाले हुए हैं. ऊपरी तौर पर देखें तो राष्टीय कार्यकारिणी का एजेंडा शायद अपने अतीत से भटक गया है. अब यहां नेता मौजूदा राजनीतिक, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय स्थितियों पर बहस और विमर्श करेंगे. पार्टी नेता विरोधियों के पहले से तय प्रस्तावों की निंदा और प्रधानमंत्री व उनकी सरकार के चमकदार प्रदर्शन का बखान करेंगे. लेकिन, धूमधड़ाके के बीच भारतीय जनता पार्टी यूपी में 250 सीटें जीतने की योजना को धार भी देंगे. भाजपा के पास 404 सदस्यीय यूपी विधानसभा में मुश्किल से 42 सीटें हैं. अमित शाह और उनकी टीम असम में मिली भाजपा की जीत से भले उत्साहित हो सकती है लेकिन राज्य के प्रमुख पार्टी नेता यहां की गंभीर चुनौतियों से जरूर चिंतित हैं.
 
उत्तर प्रदेश में भाजपा के पास एक विश्वसनीय मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का अभाव है. यहां दो जाति आधारित संगठनों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का प्रभुत्व है. यूपी में भाजपा के सामने एक ऐसे नेता की खोज करने की कठिन चुनौती है जो मायावती व मुलायम सिंह यादव के जाति और धर्म आधारित वोट बैंक पर पकड़ को कमजोर कर सके. एक विवादित पिछड़े समुदाय के नेता के रूप में केशव प्रसाद मौर्या को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर अमित शाह ने एक उपयुक्त जोखिम लिया है. लेकिन, मौर्या के पास कार्यकर्ताओं के बीच विशेष लगाव का अभाव है. हालांकि, प्रदेश के दर्जन भर से अधिक केंद्रीय मंत्रियों के बीच अकेले गृहमंत्री राजनाथ सिंह भाजपा के विरोधियों पर भारी पड़ सकते हैं.
 
राजनाथ सिंह एक ठाकुर और किसान भी हैं, जिन्हें लगभग एक दशक से प्रदेश की राजनीति से बाहर कर दिया गया है. गैर राजनीतिक कारणों से हालांकि, केंद्रीय नेतृत्व का एक धड़ा उन्हें यूपी की कप्तानी सौंपना चाहता है, क्योंकि उनकी पहचान प्रदेश के ऐसे चेहरे के रूप में है जो सबसे ज्यादा उपलब्ध रहता है. मोदी और शाह दिल्ली और बिहार में भाजपा के निराशाजनक अनुभव के बाद बिना मुख्यमंत्री चेहरे के चुनाव में उतरने के लिए तैयार नहीं हैं. उन्हें उम्मीद है कि यूपी चुनाव में बहुमत भले ही न हासिल हो सके लेकिन अपने शत्रुओं के खिलाफ संगम के तट से एक शक्तिशाली व्यक्तित्व जरूर उभर सकता है.
 
भाजपा के लिए एक और विकट चुनौती शासन के लिए एक दमदार एजेंडे के साथ जिताऊ नारे की खोज करना भी है. पार्टी यूपी में बिगड़ती कानून व्यवस्था को चुनावी मुद्दा बना सकती है, ऐसी उम्मीद है. लेकिन, बसपा को राज्य में अपराध से निपटने के लिए बेहतर प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता प्राप्त है. मायावती ने न केवल खतरनाक सरगनाओं को गिरफ्तार किया, बल्कि अपनी पार्टी के सांसदों और विधायकों को भी आपराधिक संलिप्तताओं पर जेल भेजा है. भगवा पार्टी समाजवादी पार्टी की सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने की फिराक में है. लेकिन, भाजपा के विरोधी अपने निर्वाचन क्षेत्र में विभिन्न विकास योजनाओं के लिए केंद्रीय धन आपूर्ति की कमी का आरोप लगाकर सांसदों को निशाना बनाने में कामयाब रहे हैं. 
 
शाह के लिए ऐसे 400 उम्मीदवारों के चयन का चुनौतीपूर्ण काम है जो चुनाव जीत सकते हैं या प्रतिद्वंदी को कठिन चुनौती दे सकते हैं. इलाहाबाद सम्मेलन के दौरान शाह को प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में पार्टी की जमीनी स्तर की रिपोर्ट सौंपे जाने की उम्मीद है. पिछले दो साल के उपचुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा है. पार्टी के सांसद जो मंत्री बन गए वे अपनी खाली सीट को भरने के लिए उपयुक्त प्रतिस्थापन को सुनिश्चित नहीं कर पाए. पिछले कुछ महीनों में यूपी में चुनाव जीत सकने वाले उम्मीदवारों की छवि का अंदाजा लगाने के लिए स्पेशल टीमें तैनात तैनात की गई हैं. वाबजूद इसके यहां सही जातीय और सांप्रदायिक दृष्टिकोण को भांपकर उनका तोड़ निकालना पार्टी नेतृत्व के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है.
 
अमित शाह 2014 में मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता के कारण छोटे क्षेत्रीय संगठनों व स्थानीय क्षत्रपों के साथ समझौता करके यूपी की 73 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रहे थे. अब वही क्षेत्रीय संगठन अपना जनाधार खोने के डर से भाजपा के साथ तालमेल करने के लिए लालायित हैं. अपना दल ने पहले से ही राज्यसभा चुनाव में अपने पूर्व सहयोगी दल के खिलाफ वोट दिया है. अजित सिंह के नेतृत्व वाली राष्टीय लोक दल पार्टी ने भाजपा से गठजोड़ में असफल रहने पर समाजवादी पार्टी का दामन थामने का फैसला कर लिया है. 
 
इसके अलावा, भाजपा वोटों के सांप्रदायिक धु्रवीकरण के संभावित परिणामों को लेकर भी अनिश्चित है. राम मंदिर का एजेंडा बीते दिनों की बात हो गई है इसके अलावा भगवा तत्वों द्वारा सांप्रदायिक तनाव का दांव भी यहां उल्टा पड़ सकता है. यहां अल्पसंख्यक मतदाताओं के पास लगभग 100 सीटों पर परिणाम तय करने की शक्ति है और मुस्लिम वोटों के विभाजन का भी भाजपा के पास कोई समाधान भी नहीं है. बावजूद इसके इलाहाबाद में होने वाली घोषणा देश के सबसे बड़े राज्य में भाजपा के लिए कई बुनियादी मुद्दों का समाधान खोजने में मदद करेगी. इलाहाबाद प्राचीन भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक राजधानी थी. इसके अलावा 15 भारतीय प्रधानमंत्रियों में से 7 का या तो इस शहर में जन्म हुआ या उन्होंने यहां से शिक्षा हासिल की. प्रयाग के तट पर  ही विभिन्न राजनीतिक कथानक लिखे गए या उनका प्रदर्शन हुआ, जिसने मुगलों, अंगे्रजों और कांगे्रस के साथ ही संपूर्ण भारत की नियति का फैसला किया. अब सवाल यह है कि क्या इस साल इलाहाबाद से भाजपा अपनी 2019 की नियति लिखने में सक्षम हो पाएगी.    
(ये लेखक के निजी विचार हैं)